*असहमति बनाम धमकी:NALSAR विवाद और एक ज़बरदस्त यू-टर्न*/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई
*असहमति बनाम धमकी:NALSAR विवाद और एक ज़बरदस्त यू-टर्न*/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई
(मुंबई/रिपोर्ट स्पर्श देसाई) NALSAR यानि एनएएलएसएआर विवाद ने भारत के राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों (एनएलयू) के संचालन में बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) की भूमिका और सीमा पर एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया? विवाद की शुरुआत के मद्देनजर यह विवाद तब शुरू हुआ जब एनएएलएसएआर के कुछ छात्रों ने दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्य कांत को आमंत्रित किए जाने का विरोध किया था ।इसके जवाब में बीसीआई ने कथित तौर पर विरोध के पीछे के लोगों की जांच की मांग की और साल 2026 के स्नातक बैच के नामांकन को रोकने की धमकी दी थी।
मुख्य प्रश्न जाने तो बीसीआई की अधिकारिता इस मामले ने एक बड़ी बहस को जन्म दिया। क्या बीसीआई जो कानूनी पेशे को विनियमित करता है। किसी विश्वविद्यालय के आंतरिक मामलों और छात्रों के विरोध प्रदर्शन में हस्तक्षेप कर सकता है?सीजेआई सूर्य कांत ने स्वयं सवाल किया कि बीसीआई का इससे कोई लेना- देना नहीं है। छात्रों और मेरे बीच यह एक संवाद है। उन्होंने स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन छात्रों का अधिकार है। सत्ता का उलझा हुआ ढांचा है इसलिए मुद्दा और गहरा हो जाता है क्योंकि बीसीआई की एनएलयू के शासन में सीधी भूमिका है। कई एनएलयू के गठन के दौरान बीसीआई या उसके ट्रस्ट ने उन्हें स्थापित करने में मदद की थी नतीजतन बीसीआई के प्रतिनिधि कई एनएलयू की कार्यकारी परिषद या शैक्षणिक परिषद जैसे सर्वोच्च निर्णय लेने वाले निकायों का हिस्सा हैं। उदाहरण के लिए एनएएलएसएआर के कार्यकारी परिषद में एक सदस्य बीसीआई अध्यक्ष द्वारा नामित किया जाता है।
यह विवाद एनएलयू की शासी संरचना में एक अंतर्निहित विसंगति को उजागर करता है। जहां बीसीआई विश्वविद्यालयों के संचालन में एक कानूनी रूप से स्थापित आवाज रखता है। वहीं उसकी शक्तियों की सीमा विशेष रूप से विश्वविद्यालय की स्वायत्तता और छात्रों के अधिकारों के संबंध में एक जटिल और विवादास्पद मुद्दा है। जिसे अब सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है। CJI की बातों पर एक स्टूडेंट के विरोध प्रदर्शन ने कैसे बार काउंसिल पर बैन लगा दिया?आधी रात को विरोध हुआ और फिर नाटकीय तरीके से पीछे हटना पड़ा था। इस हफ़्ते कानूनी बिरादरी और देश एक ज़बरदस्त ड्रामा में डूबा रहा। जिसमें देश के टॉप ज्यूडिशियल ऑफिसर उसके बार रेगुलेटर और लॉ स्टूडेंट्स के एक ग्रुप शामिल थे। जिन्होंने अपनी असहमति ज़ाहिर करने की हिम्मत की। इस तूफ़ान के केंद्र में बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया (BCI) का वह आदेश था। जो पहले कभी नहीं हुआ था। जिसमें लॉ स्टूडेंट्स के पूरे ग्रेजुएट हो रहे बैच के एनरोलमेंट पर रोक लगा दी गई थी। यह फ़ैसला कुछ ही घंटों में भारी विरोध और सुप्रीम कोर्ट के एक दुर्लभ दखल के बाद शानदार ढंग से पलट दिया गया।
द फ्लैशपॉइंट के मद्देनजर एक कॉन्वोकेशन विवाद देखें तो यह विवाद तब शुरू हुआ। जब हैदराबाद की NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ़ लॉ के 2026 बैच के स्टूडेंट्स के एक ग्रुप ने यूनिवर्सिटी से अपने कॉन्वोकेशन में चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया सूर्यकांत को चीफ़ गेस्ट के तौर पर बुलाने पर फिर से सोचने की अपील की। यह कोई आम आपत्ति नहीं थी बल्कि 20 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान CJI की बातों से उपजी थी। उस सुनवाई के दौरान CJI कांत ने स्टूडेंट प्रोटेस्टर्स के खिलाफ कथित पुलिस बर्बरता के वीडियो सबूत देखने से मना कर दिया और कहा जाता है कि उन्होंने कहा कि "हमें वीडियो में कोई दिलचस्पी नहीं है। हमारे पास उन्हें देखने का समय नहीं है"और"हमारा समय बर्बाद मत करो"। लगभग 450 स्टूडेंट्स को लगा कि एक ऐसे बड़े आदमी को बुलाना जो"पुलिस बर्बरता के गंभीर आरोपों को खारिज करता हुआ"लग रहा था। उनके इंस्टीट्यूशन में सिखाए गए कॉन्स्टिट्यूशनल वैल्यूज़ के खिलाफ था। उनके रिप्रेजेंटेशन में कहा गया कि उनसे डिग्री लेना उनके उसूलों के साथ"असहज"होगा। अदालत का हथौड़ा गिरा और BCI का बैन लग गया था।
13 अगस्त को स्थिति बहुत ज़्यादा बिगड़ गई जब BCI चेयरमैन और BJP के राज्यसभा MP मनन कुमार मिश्रा ने सभी स्टेट बार काउंसिल्स को एक निर्देश जारी किया। उन्होंने आदेश दिया कि 2026 में NALSAR से लॉ की डिग्री लेने वाले किसी भी स्टूडेंट को अगले आदेश तक एडवोकेट के तौर पर एनरोल नहीं किया जाना चाहिए। BCI का आदेश बहुत बड़ा और सख्त था। इसने न सिर्फ़ सौ से ज़्यादा स्टूडेंट्स के करियर को खतरे में डाल दिया बल्कि यह भी आरोप लगाया कि NALSAR के कुछ एकेडमिक स्टाफ़ "ग्रुपिज़्म और गंदी पॉलिटिक्स" में शामिल थे और उन्होंने स्टूडेंट्स को "गुमराह करने, भड़काने और गुमराह करने" में भूमिका निभाई थी। काउंसिल ने तर्क दिया कि सबसे बड़े ज्यूडिशियल ऑफ़िस का अपमान करने वाला स्टूडेंट"ज़िम्मेदार वकील"होने के लायक नहीं है। बैकलैश और यू-टर्न का मामला देखें तो इस ऑर्डर से तुरंत और बड़े पैमाने पर गुस्सा फैल गया। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के प्रेसिडेंट विकास सिंह समेत आलोचकों ने इसे "गैर-कानूनी,बेहिसाब और असल में टिकने लायक नहीं" बताया और इसे स्टूडेंट्स को उनकी बोलने की आज़ादी का इस्तेमाल करने से डराने की कोशिश बताया। कुछ ही घंटों में BCI को पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा। सबसे पहले इसने स्टूडेंट्स को एनरोलमेंट लेने की इजाज़त देने के लिए ऑर्डर में बदलाव किया और कहा कि"ज़्यादातर"स्टूडेंट्स बेगुनाह हैं। आधी रात तक चेयरमैन मिश्रा ने यह कहते हुए कार्रवाई पूरी तरह से वापस ले ली कि काउंसिल इस बात से संतुष्ट है कि 2026 बैच का"किसी भी गड़बड़ी या आंदोलन में कोई रोल नहीं था"।
सुप्रीम कोर्ट की फटकार के हिसाब से वे दखल देने वाले कौन होते हैं?यह नाटकीय यू-टर्न शायद सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख की वजह से हुआ। खुद चीफ जस्टिस सूर्यकांत जस्टिस जॉयमाल्या बागची और वी मोहना के साथ की अगुवाई वाली बेंच ने BCI के एक्शन को "बिल्कुल गैर-ज़रूरी" बताया। CJI ने ज़ोर देकर कहा कि यह "मेरे और स्टूडेंट्स के बीच बातचीत" थी और उन्होंने मामले में दखल देने के BCI के अधिकार पर सवाल उठाया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि स्टूडेंट्स या फैकल्टी के खिलाफ कोई सज़ा देने वाली कार्रवाई न की जाए। मतभेद के लोकतंत्र के मद्देनजर NALSAR (NALSAR का फुल फॉर्म National Academy of Legal Studies and Research है। यह हैदराबाद, तेलंगाना में स्थित एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय है। जिसकी स्थापना साल 1998 में आंध्र प्रदेश राज्य विधानमंडल के एक अधिनियम द्वारा की गई थी।
विवाद ने लोकतंत्र में मतभेद की सीमाओं पर एक ज़रूरी बहस छेड़ दी है। जबकि BCI चेयरमैन मिश्रा ने शुरू में कहा था कि स्टूडेंट्स को अपने विचार रखने के लिए परेशान नहीं किया जाना चाहिए। उनके कामों ने एक अलग कहानी बताई। यह पूरा मामला एक स्टूडेंट के विरोध करने के अधिकार,तानाशाही के दखल के खतरों और उन संवैधानिक मूल्यों को बनाए रखने वाले संस्थानों के महत्व की एक मज़बूत याद दिलाता है जिनकी वे रक्षा करने का दावा करते हैं।(Photos Courtesy Social media and AI)
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