*पहला विश्व युद्ध: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का निर्णायक मोड़,विश्व इतिहास की वह भीषण त्रासदी जिसने भारत के स्वतंत्रता संघर्ष को नई दिशा दी*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
*पहला विश्व युद्ध: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का निर्णायक मोड़,विश्व इतिहास की वह भीषण त्रासदी जिसने भारत के स्वतंत्रता संघर्ष को नई दिशा दी*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
(मुंबई रिपोर्ट स्पर्श देसाई) पहले युद्ध ने बदल दी थी भारतीय राजनीति की दिशा। प्रथम विश्व युद्ध का भारतीय राष्ट्रवाद पर प्रभाव के मद्देनजर प्रथम विश्व युद्ध ने राजनीतिक मोहभंग,आर्थिक कठिनाई और सामाजिक जागृति के माध्यम से भारतीय राष्ट्रवाद को काफी प्रभावित किया था। युद्ध में भारत के महत्वपूर्ण योगदान के बावजूद वादे के मुताबिक राजनीतिक रियायतें न मिलने से व्यापक असंतोष फैल गया था। इस अवधि ने जन लामबंदी और अधिक उग्र उपनिवेश- विरोधी आंदोलन की ओर एक बदलाव को चिह्नित किया था। जिससे राष्ट्रीय संघर्ष को नया स्वरूप मिला था।
पहला विश्व युद्ध (1914-1918) यद्यपि मुख्यतः यूरोपीय संघर्ष था। भारतीय राष्ट्रवाद के लिए उत्प्रेरक सिद्ध हुआ था। साम्राज्य की युद्धकालीन आवश्यकता ओं ने भारत की सामरिक महत्ता को उजागर किया और औपनिवेशिक शासन के अंतर्निहित विरोधाभासों को उद्घाटित कर दिया था। इस युद्ध ने भारत को वैश्विक मंच पर स्थापित किया था और स्वशासन की माँगों को तीव्र गति प्रदान की थी । जिससे शाही युद्ध प्रयासों को स्वतंत्रता आंदोलन से सीधे जोड़ दिया गया था। भारत का प्रत्यक्ष योगदान को देखते हुए साम्राज्य के लिए बलिदान और सैन्य सहयोग देखें तो लगभग 13 लाख भारतीय सैनिकों ने ब्रिटिश सेना में सेवा की। ये वीर योद्धा पश्चिमी मोर्चा,मेसोपोटामिया, पूर्वी अफ्रीका, फिलिस्तीन और गैलीपोली जैसे दूर-दराज़ युद्ध क्षेत्रों में लड़े थे। भारतीय सैनिकों ने ब्रिटिश साम्राज्य के लिए अद्वितीय वीरता और बलिदान का परिचय दिया था। आर्थिक सहायता को लेकर भारत ने खाद्यान्न,कच्चा माल और विशाल धनराशि युद्ध प्रयासों के लिए प्रदान की थी। ब्रिटिश सरकार को युद्ध ऋण एवं आपूर्ति में भारत ने महत्वपूर्ण योगदान दिया था।
राजनीतिक वादे का असर देखें तो युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं को आश्वस्त किया था। साल 1917 की ''वार पॉलिसी''में भारत को ''ब्रिटिश कॉमनवेल्थ के भीतर स्वशासन''का वादा किया गया था। जबकि 1919 के''मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार''ने प्रशासनिक ढाँचे में आंशिक परिवर्तन का संकेत दिया था। भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव के मद्देनजर आर्थिक दबाव को लेकर युद्ध ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर अभूतपूर्व बोझ डाला था। भयावह मुद्रास्फीति, आवश्यक वस्तुओं की चरम कमी और युद्ध-राजस्व अधिनियमों के तहत कठोर कराधान ने जनता को त्रस्त कर दिया था। सामान्य नागरिक की दिनचर्या अस्त- व्यस्त हो गई थी।
सामाजिक परिणाम के मुताबिक युद्धोपरांत मजदूर अशांति का व्यापक प्रकोप हुआ था। रॉलेट एक्ट (साल 1919) के विरोध ने पूरे देश में आक्रोश की लहर दौड़ा दी थी। टूटे वादों के प्रत्यक्ष परिणाम के रूप में साल 1920-22 का असहयोग आंदोलन उभरा था। जिसने भारतीय जनमानस को नई राह दिखाई थी। राजनीतिक चेतना के मद्देनजर युद्ध से लौटे भारतीय सैनिक नए विचारों,आधुनिक विश्वदृष्टि और स्वतंत्रता की नई परिभाषाओं के साथ लौटे थे। इन्हीं पूर्व सैनिकों ने क्रांतिकारी समूहों गदर पार्टी, हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) और अन्य संगठनों की रीढ़ बनकर राष्ट्रवाद को चरम स्वरूप प्रदान किया था।
स्वतंत्रता संग्राम से सीधा संबंध किस से? वह देखें तो भ्रम और निराशा में ब्रिटिश सरकार द्वारा युद्धकालीन वादों को पूरा न करना नरमपंथी नेताओं बाल गंगाधर तिलक,एनी बेसेंट और गोपाल कृष्ण गोखले के लिए भी अस्वीकार्य हो गया था। इस विश्वासघात ने उन्हें अधिक मुखर माँगों की ओर मोड़ दिया था। जन आंदोलन के मद्देनजर जलियांवाला बाग नरसंहार (साल1919) और खिलाफत आंदोलन ने हिंदू-मुस्लिम एकता को नई ऊँचाई दी थी। दोनों समुदाय औपनिवेशिक विरोधी भावना के सूत्र में बँधकर एकजुट हो गए थे।
यह साम्प्रदायिक सद्भाव का स्वर्णिम काल था। जो राष्ट्रीय एकता के लिए अनुकरणीय बना था। आंदोलनों के हिसाब से विकास युद्ध ने संवैधानिक याचिकाओं से जन-आधारित अहिंसक प्रतिरोध की ओर परिवर्तन को गति दी थी। असहयोग आंदोलन ने सविनय अवज्ञा और पूर्ण स्वराज की माँग को जन-जन तक पहुँचाया था। यह वह बीजारोपण था। जो बाद में साल1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के रूप में विशाल वृक्ष बना था। परिवर्तन के वह प्रकाश-स्तंभ के मद्देनजर पहले विश्व युद्ध ने साम्राज्य में भारत की अनिवार्य भूमिका को पूरे विश्व के सम्मुख प्रस्तुत किया था परंतु साथ ही उस दमनकारी व्यवस्था के अंतर्विरोधों को भी उजागर किया था। जो भारत को दासता की बेड़ियों में जकड़े थी।
इसने स्वतंत्रता संग्राम को जन-आन्दोलन का स्वरूप दिया। जिसमें करोड़ों भारतीयों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एकजुट होकर आवाज़ उठाई थी। इस प्रकार प्रथम विश्व युद्ध केवल एक वैश्विक संघर्ष नहीं था अपितु भारत के स्वतंत्रता संग्राम का एक अनिवार्य अध्याय बन गया था। जिसने भारत को मजबूत राष्ट्रवाद,सामूहिक चेतना और अंततःपूर्ण स्वतंत्रता की ओर अग्रसर किया था। इसके लेखक के बारे में जाने तो यह विश्लेषण UPSC मेन्स परीक्षा के जीएस-1 पेपर के लिए तैयार किया गया है।
जिसमें इतिहास,राजनीति,अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र के अंतःसंबंधों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया है। यहां जब पहला विश्व युद्ध भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का निर्णायक मोड़ बन गया था तब विश्व इतिहास की वह भीषण त्रासदी जिसने भारत के स्वतंत्रता संघर्ष को नई दिशा दी थी। भारत के प्रत्यक्ष योगदान ने साम्राज्य के लिए अभूतपूर्व बलिदान दिए थे।
लगभग 14.4 लाख भारतीय सैनिकों ने ब्रिटिश सेना में भर्ती होकर सेवा की थी । जिनमें से 13.8 लाख को विदेशी युद्ध क्षेत्रों में भेजा गया । ये वीर योद्धा पश्चिमी मोर्चा, मेसोपोटामिया,पूर्वी अफ्रीका,फिलिस्तीन, गैलीपोली,मिस्र,फारस,रूस और यहाँ तक कि चीन तक के युद्ध क्षेत्रों में लड़े थे। फ्रांस और बेल्जियम में तैनात भारतीय कोर की 90,000 सैनिकों ने फ्रंट-लाइन पर युद्ध किया था।
जबकि 50,000 सहायक बटालियनों में थे । युद्ध के मात्र एक माह के भीतर अक्टूबर1914 में इप्रेस के प्रथम युद्ध में सेपॉय ख़ुदादाद ख़ान ( सन 129वीं बलूच रेजिमेंट) ने अद्वितीय वीरता दिखाई थी। जब उनकी मशीन-गन टीम के सभी साथी मारे गए तो घायल अवस्था में भी उन्होंने जर्मन सेना को रोके रखा था । जिससे ब्रिटिश सुदृढ़ीकरण पहुँच सका था। इसके लिए वे विक्टोरिया क्रॉस पाने वाले प्रथम भारतीय बने था । युद्ध के अंत तक कुल 47,746 भारतीय सैनिक मारे गए या लापता हो गए और 65,126 घायल हुए थे । भारतीय सैनिकों ने 13,000 से अधिक पदक प्राप्त किए थे। जिनमें 12 विक्टोरिया क्रॉस शामिल थे । राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के अनुसार"भारतीय सैनिकों ने लगभग हर युद्ध मोर्चे पर सक्रिय सेवा दी और युद्ध के परिणाम को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई" थी। भारत ने खाद्यान्न,कच्चा माल और विशाल धनराशि युद्ध प्रयासों के लिए प्रदान की थी। साल 1917 में भारत ने युद्ध की लागत के लिए £100 मिलियन का सीधा अनुदान दिया था। इसके अतिरिक्त 170,000 से अधिक पशु और 3.7 मिलियन टन आपूर्ति एवं सामग्री भी प्रदान की गई थी ।
युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं को आश्वस्त किया था। 20 अगस्त 1917 की घोषणा में सेक्रेटरी ऑफ स्टेट एडविन मोंटेग्यू ने हाउस ऑफ कॉमन्स में स्पष्ट किया कि ब्रिटिश सरकार का लक्ष्य भारत में "स्वशासन" की प्राप्ति के लिए स्वशासी संस्थाओं का विकास करना है । इस घोषणा ने भारतीय अपेक्षाओं को चरम पर पहुँचा दिया था। भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव देखें तो युद्ध ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर अभूतपूर्व बोझ डाला था।
भयावह मुद्रास्फीति,आवश्यक वस्तुओं की चरम कमी और कठोर कराधान ने जनता को त्रस्त कर दिया था। युद्ध के दौरान भारतीय उद्योगों का अभूतपूर्व विकास हुआ था। जिसने स्वदेशी और संरक्षणवाद की माँगों को पुनः जीवित किया था। स्वदेशी आंदोलन और ब्रिटिश आयातों के बहिष्कार ने आर्थिक राष्ट्रवाद को बल दिया था। युद्धोपरांत मजदूर अशांति का व्यापक प्रकोप हुआ था। हड़तालें,बड़ी सूती मिलों,जूट मिलों, रेलवे, ट्राम और यहाँ तक कि नगर निगम के कर्मचारियों तक में फैल गईं थीं। रॉलेट एक्ट (सन1919) के विरोध ने पूरे देश में आक्रोश की लहर दौड़ा दी थी। रॉलेट एक्ट और जलियांवाला बाग के मद्देनजर देखें तो फरवरी 1919 में ब्रिटिश सरकार ने रॉलेट एक्ट पारित किया था। जो युद्धकालीन रक्षा अधिनियम के दमनकारी प्रावधानों को स्थायी बना रहा था। इस अधिनियम ने संदिग्ध स्वतंत्रता कार्यकर्ताओं को बिना मुकदमे के कैद करने और राजनीतिक मामलों में जूरी के बिना सुनवाई की अनुमति दी ।
13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन कर्नल रेजिनाल्ड डायर के नेतृत्व में ब्रिटिश सैनिकों ने अमृतसर के जलियांवाला बाग में निहत्थे नागरिकों पर गोलियाँ बरसाईं थी। जहाँ कम से कम 10,000 लोग एकत्रित थे और केवल एक निकासी मार्ग था। आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार 379 लोग मारे गए और लगभग1,200 घायल हुए,जबकि कांग्रेस ने लगभग 1,000 मृत और 1,500 से अधिक घायल होने का अनुमान लगाया था। ब्रिटेन ने अपने सैनिकों की स्मृति को सम्मानित किया था परंतु भारतीय सैनिकों के साथ भेदभाव किया था। मेसोपोटामिया के बसरा स्थित स्मारक में प्रत्येक ब्रिटिश सैनिक (लगभग 8,000) और 665 भारतीय अधिकारियों का नाम अंकित है परंतु 33,222 अन्य भारतीय सैनिकों को केवल संख्याओं के रूप में दर्ज किया गया। मदन मोहन मालवीय ने साल 1917 में इम्पीरियल विधान परिषद में घोषित किया कि युद्ध ने "घड़ी को... पचास वर्ष आगे" बढ़ा दिया है परंतु ब्रिटिश सरकार की वास्तविक मंशा भिन्न थी। "ब्रिटेन ने कभी स्वीकार नहीं किया कि उसका सब कुछ इस आधार पर था कि स्वतंत्रता यदि हुई भी तो भारतीयों की सोच से 100 वर्ष अधिक दूर होगी"। साल 1919 के मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों ने द्विसदनीय केंद्रीय विधानमंडल की स्थापना की परंतु वायसराय की शक्तियाँ इतनी व्यापक थीं कि इसकी भूमिका "नगण्य" रही थी। ब्रिटेन की "ओटोमन साम्राज्य" के विरुद्ध लड़ाई ने भारतीय मुस्लिम भावनाओं को आहत किया था। "खिलाफत आंदोलन"ने हिंदू-मुस्लिम एकता को नई ऊँचाई दी और साम्प्रदायिक सद्भाव का स्वर्णिम काल बनाया था। रॉलेट एक्ट ने गांधी को उनके प्रथम सत्याग्रह आंदोलन की घोषणा करने के लिए प्रेरित किया था । युद्ध और उसके बाद की दमनकारी नीतियों ने संवैधानिक याचिकाओं से जन-आधारित अहिंसक प्रतिरोध की ओर परिवर्तन को गति दी थी। सन 1920-22 के असहयोग आंदोलन की नींव यहीं पड़ी थी। युद्ध के बाद भी भारतीय सेना में उच्च पदों पर भारतीयों की नियुक्ति अत्यंत धीमी रही थी। साल 1930 तक भी कैप्टन से उच्च रैंक का कोई भारतीय अधिकारी नहीं था। पहले विश्व युद्ध ने साम्राज्य में भारत की अनिवार्य भूमिका को पूरे विश्व के सम्मुख प्रस्तुत किया परंतु साथ ही उस दमनकारी व्यवस्था के अंतर्विरोधों को भी उजागर किया था। एक ओर 13.8 लाख सैनिकों ने विदेशी धरती पर ब्रिटेन के लिए प्राण न्योछावर किए तो दूसरी ओर £100 मिलियन का अनुदान और 3.7 मिलियन टन आपूर्ति ने साम्राज्य की रीढ़ को मजबूती दी थी।
इसके प्रत्युत्तर में भारत को दमनकारी रॉलेट एक्ट, जलियांवाला बाग की त्रासदी और नाममात्र के सुधार मिले थे । 33,222 भारतीय सैनिक बसरा के स्मारक में केवल संख्याएँ बनकर रह गए थे। जबकि उनके ब्रिटिश साथियों के नाम अंकित हैं। इस विश्वासघात ने भारतीय राष्ट्रवाद को संवैधानिक याचिकाओं से जन-आन्दोलन का स्वरूप दिया था। जिसमें करोड़ों भारतीयों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एकजुट होकर आवाज़ उठाई थी। इस प्रकार प्रथम विश्व युद्ध केवल एक वैश्विक संघर्ष नहीं था लेकिन भारत के स्वतंत्रता संग्राम का वह अनिवार्य अध्याय बन गया था। जिसने भारत को मजबूत राष्ट्रवाद, सामूहिक चेतना और अंततःपूर्ण स्वतंत्रता की ओर अग्रसर किया था। (Photos Courtesy Social media and AI)
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