*साल1971 का वह रहस्य:जब PNS गाजी की ट्रैकिंग ने बदल दी थी जंग की दिशा,जानिए कैसे हुआ था विक्रांत का बचाव?*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई

*साल1971 का वह रहस्य:जब PNS गाजी की ट्रैकिंग ने बदल दी थी जंग की दिशा,जानिए कैसे हुआ था विक्रांत का बचाव?*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई 


(मुंबई/रिपोर्ट स्पर्श देसाई)यह कहानी साल1971 के युद्ध का एक बेहद रोचक और ऐतिहासिक पहलू है। यह घटना भारतीय नौसेना की चतुराई और साहस की मिसाल है। जासूसी,धोखा और समुद्र का वह भयानक विस्फोट, उसके हिसाब से यह कहानी साल 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की है। जब पाकिस्तानी नौसेना की सबसे खतरनाक पनडुब्बी PNS गाजी भारतीय विमानवाहक पोत INS विक्रांत को डुबोने के मिशन पर निकली थी। आपने जिस सर्विलांस सिस्टम और डॉक्टर कोवास का जिक्र किया था । वह उसी रहस्यमयी जासूसी गाथा का हिस्सा है। जो इस ऑपरेशन से जुड़ी थी। PNS गाजीजो पाकिस्तान की ''डूबने वाली पतवार'' थी। PNS गाजी जो पहले अमेरिकी पनडुब्बी USS Diablo थी। उसको साल 1964 में पाकिस्तान को पट्टे पर दिया गया था। 



उस अनोखी निगरानी ने खोल दी थी पाकिस्तानी साजिश की पोल । यह कहानी 1971 के युद्ध की है, जब कराची पोर्ट पर एक नया सर्विलांस सिस्टम लगाया जा रहा था। इसी दौरान भारतीय कस्टम विभाग ने एक डॉक्टर को तस्करी करते हुए पकड़ा। जिसके बाद यह मामला पाकिस्तानी पोर्ट तक पहुंचा। वहां मौजूद एजेंटों ने जब फोटोग्राफ लेना शुरू किया तो उनकी नज़र एक खास स्ट्रक्चर पर पड़ी। जिस पर एंटी-एयरक्राफ्ट डिफेंस बैटरी लगी हुई थी। यह चिंताजनक था क्योंकि शांतिकाल में ऐसे रडार सिस्टम नहीं दिखाए जाते थे। ये आपातकाल या युद्ध के समय ही सक्रिय होते हैं। PNS गाजी जो भारत के लिए बनी सबसे बड़ी चुनौती थी। यह वह समय था जब पाकिस्तानी नौसेना की पनडुब्बी PNS गाजी भारतीय विमानवाहक पोत INS विक्रांत को नष्ट करने के मिशन पर निकली थी। 


कमांडर जफर मुहम्मद खान के नेतृत्व में 93 सदस्यों के दल के साथ 14 नवंबर 1971 को गाजी ने कराची से अपनी यात्रा शुरू की। 4,800 किलोमीटर की इस लंबी यात्रा में उसे 16 नवंबर को ओकला पोर्ट पार करना था फिर कोलंबो, गोवा, कर्नाटक होते हुए 19 नवंबर को श्रीलंका के त्रिंकोमाली पोर्ट पर पहुंचना था। जहां ईंधन भरने और सफाई का काम होना था । दो गुप्त मिशन के तहत एक खतरनाक योजना थी। गाजी के पास दो गुप्त कार्य के मद्देनजर प्राथमिक मिशन के हिसाब से INS विक्रांत को ढूंढकर डुबो देना था। दूसरा द्वितीयक मिशन के हिसाब से अगर विक्रांत न मिले तो विशाखापत्तनम पोर्ट के आसपास समुद्री खदानें (माइंस) बिछाना था। कमांडर खान को गोपनीय आदेश दिए गए थे कि किसी भी स्थिति में दूसरा मिशन पूरा करना ही होगा । कैसे पता चली गाजी की लोकेशन? वह जाने तो गाजी अपने पूरे रास्ते में पाकिस्तान से शॉर्ट एचएफ बर्स्ट संदेशों के जरिए संपर्क कर रही थी। ये संदेश छोटे लेकिन बार-बार दोहराए जाने वाले होते थे। जिससे भारतीय खुफिया एजेंसियों को उसका लोकेशन ट्रैक करने में मदद मिली थी हालांकि इतने बड़े समुद्र में सटीक स्थान पता करना अभी भी मुश्किल था। भारत की बुद्धिमानी के मद्देनजर बिछाया गया था जाल।





भारतीय नौसेना ने बेहद चालाकी भरा कदम उठाया था। INS विक्रांत को विशाखापत्तनम से हटा दिया गया था और उसकी जगह समुद्र में डिकॉय (झूठे संकेत) भेजे गए थे। INS राजपूत को विक्रांत की आड़ में भेजा गया था ताकि गाजी को भ्रमित किया जा सके । 4 दिसंबर 1971 के मद्देनजर वह रात जिसने इतिहास बदल दिया था। 4 दिसंबर 1971 की आधी रात ठीक 12:10 बजे, विशाखापत्तनम बंदरगाह के पास एक भीषण विस्फोट हुआ था। उस धमाके में PNS गाजी डूब गई और उसमें सवार सभी 93 सदस्य मारे गए थे।


 भारतीय नौसेना के अनुसार INS राजपूत ने गहरे पानी में विस्फोटक (डेप्थ चार्ज) गिराए थे । जिससे गाजी नष्ट हो गई थी । वहीं पाकिस्तानी पक्ष का दावा है कि खुद माइंस बिछाने के दौरान आंतरिक विस्फोट से पनडुब्बी में विस्फोट हो गया था। रहस्यमयी सच के हिसाब से गाजी के अवशेषों से मिले सबूत। साल2003 में भारतीय नौसेना के गोताखोरों ने गाजी के मलबे से कई चीजें बरामद कीं युद्ध लॉग,रडार कंप्यूटर की बैकअप टेप,गोपनीय फाइलें और छह पाकिस्तानी सैनिकों के शव मिले थे। एक सैनिक की जेब से उर्दू में लिखा अपनी मंगेतर के नाम पत्र भी मिला । गोताखोरों ने पुष्टि की कि विस्फोट आंतरिक था। जिसने पनडुब्बी के टारपीडो और माइंस को उड़ा दिया था । 


PNS गाजी का सिंक होना हीभारत की जीत की शुरुआत थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस घटना की घोषणा की थी। गाजी के डूबने से पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में पाकिस्तानी नौसेना की महत्वाकांक्षाएं ध्वस्त हो गईं थीं । INS विक्रांत सुरक्षित रहा और भारतीय नौसेना ने बंगाल की खाड़ी में जोरदार हमले किए थे जिसने बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में अहम भूमिका निभाई थी। साल 1971 के युद्ध की यादगार के मद्देनजर नौसेना दिवस। हर साल 4 दिसंबर को भारतीय नौसेना दिवस मनाया जाता है। ऑपरेशन ट्राइडेंट की सफलता की याद में जब भारतीय नौसेना ने कराची बंदरगाह पर हमला कर पाकिस्तानी नौसेना को भारी नुकसान पहुंचाया था।



 दरअसल साल1971 में यह पाकिस्तानी नौसेना की इकलौती लंबी दूरी की पनडुब्बी थी और इसे युद्ध का निर्णायक हथियार माना जा रहा था। कमांडर ज़फर मुहम्मद खान के नेतृत्व में 93 सदस्यों का दल 14 नवंबर 1971 की रात कराची से रवाना हुआ था । गाजी के मिशन में दो गुप्त कार्य करने थे। पाकिस्तानी नौसेना मुख्यालय से गोपनीय आदेश मिले थे उसके मद्देनजर पहला प्राथमिक मिशन के तहत INS विक्रांत को खोजकर डुबो देना। दूसरा द्वितीयक मिशन के तहत अगर विक्रांत न मिले तो विशाखापत्तनम बंदरगाह के आसपास समुद्री खदानें (माइंस) बिछाना। गाजी ने कराची से विशाखापत्तनम तक लगभग 3,000 मील (4,800 किलोमीटर) की यात्रा 30 नवंबर 1971को पूरी की और वहाँ खदानें बिछाना शुरू कर दिया था। भारत के मास्टरस्ट्रोक के मद्देनजर विक्रांत को छिपाने की चाल। वाइस एडमिरल एन.कृष्णन की अगुआई में भारतीय नौसेना को पहले ही पता चल गया था कि गाजी विक्रांत का पीछा कर रही है । तब भारतीय नौसेना ने एक बेहद चतुर रणनीति अपनाई थी । INS विक्रांत को अंडमान द्वीपसमूह के पास भेज दिया गया था। जो गाजी की पहुँच से दूर था। INS राजपूत एक पुराना युद्धपोत को विशाखापत्तनम के पास डिकॉय (नकली लक्ष्य) के रूप में तैनात किया गया था । झूठे रेडियो संकेत और संचार भेजे गए थे ताकि गाजी को यह भ्रम हो कि विक्रांत विशाखापत्तनम में ही है ।




 3-4 दिसंबर 1971 की वह काली व भयानक रात। 4 दिसंबर 1971 की आधी रात के लगभग 12:10 बजे विशाखापत्तनम बंदरगाह के पास एक जबरदस्त विस्फोट हुआ था । PNS गाजी समुद्र में समा गई थी और उसमें सवार सभी 93 लोग मारे गए थे । गाजी डूबी कैसे? उसके विवाद और रहस्य के मद्देनजर 
गाजी के डूबने की घटना आज भी रहस्य बनी हुई है ।
भारतीय नौसेना का दावा कि INS राजपूत ने गहरे पानी में विस्फोटक (डेप्थ चार्ज) गिराए थे । जिनसे गाजी नष्ट हो गई थी। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि डेप्थ चार्ज के झटके से गाजी के अंदर मौजूद टारपीडो और माइंस में विस्फोट हो गया था। पाकिस्तानी दावे के मुताबिक पाकिस्तान का कहना है कि खुद माइंस बिछाते समय किसी आंतरिक विस्फोट से गाजी डूबी थी। 


साल 2003 के गोताखोरी अभियान से मिले थे सबूत। 10 दिसंबर 2003 को भारतीय नौसेना के गोताखोरों ने गाजी के मलबे का निरीक्षण किया । उन्होंने पाया कि पतवार बाहर की ओर मुड़ा हुआ था। जो आंतरिक विस्फोट का स्पष्ट संकेत है। यह अपनी ही माइंस से विस्फोट होने की संभावना को कमजोर करता है । रहस्यमयी दुर्घटना का एक और संस्करण के हिसाब से कुछ खातों के अनुसार 28 नवंबर के आसपास गाजी ने INS मगर (एक भारतीय जहाज) से बचने के लिए अचानक गोता लगाया और उथले पानी में समुद्र की चट्टानी तह से टकरा गई । इस टक्कर से फॉरवर्ड टारपीडो रूम में पानी घुस गया और एक टारपीडो ट्यूब में फंस गया जो फायर होने के लिए तैयार था । माना जाता है कि 3-4 दिसंबर की रात किसी जहाज के डेप्थ चार्ज के कंपन ने उस टारपीडो को विस्फोट कर दिया और पूरी पनडुब्बी में आंतरिक विस्फोटों की श्रृंखला शुरू हो गई । 



साल 2003 के मलबे से मिली चौंकाने वाली चीज़ें। गोताखोरों ने गाजी के मलबे से युद्ध लॉग,रडार कंप्यूटर की बैकअप टेप,गोपनीय फाइलें और छह पाकिस्तानी सैनिकों के शव बरामद किए थे। मलबा विशाखापत्तनम के ब्रेकवाटर से 1.5 नॉटिकल मील दूर समुद्र की तह में पड़ा है और जहाजों को सतर्क करने के लिए नेविगेशनल मानचित्रों पर इस स्थान को चिह्नित किया गया है। दस्तावेज़ों का रहस्यमयी गायब होना एक अजीब रहस्य के मद्देनजर गाजी की घटना का एक और रहस्य यह है कि भारतीय नौसेना के पास गाजी से मिले दस्तावेज़ों और सिग्नलों का कोई रिकॉर्ड नहीं है। साल 1980 में कमांडर पी.एस.बावा ने लिखा है कि"विरबाहु यानि विशाखापत्तनम सबमरीन सेंटर में मुझे भयावह रूप से पता चला कि सभी गाजी पेपर और सिग्नल इसी साल नष्ट कर दिए गए। वहाँ अब कुछ भी उपलब्ध नहीं है"। साल 1998 में रियर एडमिरल के.मोहनराव ने स्वीकार किया कि दस्तावेज़ों का पता नहीं चल पाया। युद्ध पर प्रभाव के मद्देनजर गाजी के डूबने से बंगाल की खाड़ी में भारतीय नौसेना का पूर्ण नियंत्रण हो गया । 



INS विक्रांत सुरक्षित रहा और उसने पूर्वी पाकिस्तान अब बांग्लादेश के चटगाँव,कॉक्स बाज़ार,मोंगला और छालना बंदरगाहों पर हवाई हमले किए गए थे। जिससे पाकिस्तानी आपूर्ति लाइनें तबाह हो गईं थीं। पाकिस्तान ने इस्लामाबाद के नौसेना बेस का नाम कमांडर जफर के सम्मान में PNS जफर रखा और कमांडर जफर को मरणोपरांत हिलाल-ए-जुर्रत (सर्वोच्च नौसैनिक वीरता पुरस्कार) से सम्मानित किया गया ।(Photos Courtesy Social media and AI)

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