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Showing posts from June, 2026

*क्या 17,100 साल में सच में खत्म हो जाएगी इंसानियत? 'डूम्सडे आर्ग्युमेंट' की चौंकाने वाली भविष्यवाणी*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई

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*क्या 17,100 साल में सच में खत्म हो जाएगी इंसानियत? 'डूम्सडे आर्ग्युमेंट' की चौंकाने वाली भविष्यवाणी*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई  (मुंबई/रिपोर्ट स्पर्श देसाई) क्या 17,100 साल में विलुप्त हो सकते हैं इंसान?''डूम्सडे आर्युमेंट''नामक स्टैटिस्टिकल मॉडल के मुताबिक 95% संभावना है कि इंसान अधिकतम 17,100 साल और ज़िंदा रहेंगे। खगोलभौतिकीविद् ब्रैंडन कार्टर के साल 1983 के काम पर आधारित यह मॉडल मानता है कि कभी भी जीवित रहे इंसान रैंडम स्थिति में होते हैं और इसमें कुल 2.34 ट्रिलियन जन्मों का अनुमान लगाया गया हालांकि कई वैज्ञानिक इस तर्क को नहीं मानते। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसमें जलवायु परिवर्तन जैसे असली खतरों को नज़रअंदाज़ किया गया है। परिचय के मद्देनजर गणित की नजर में इंसानी तबाही की तारीख जाने तो सबसे पहले क्या गणित इंसानियत के अंत की तारीख बता सकता है?एक चौंकाने वाले स्टैटिस्टिकल मॉडल के अनुसार हाँ! "डूम्सडे आर्ग्युमेंट"(प्रलय तर्क) नामक यह सिद्धांत दावा करता है कि 95% संभावना है कि इंसान अधिकतम 17,100 साल और जीवित रहेंगे। साल 1983 में खगोलभौतिकीविद् ब्रैंडन का...

*वैश्विक अर्थव्यवस्था में सेंध: पूर्व-पश्चिम के बीच पूर्ण आर्थिक अलगाव से 6.9 ट्रिलियन डॉलर की GDP गायब होने की WEF की चेतावनी*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई

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*वैश्विक अर्थव्यवस्था में सेंध: पूर्व-पश्चिम के बीच पूर्ण आर्थिक अलगाव से 6.9 ट्रिलियन डॉलर की GDP गायब होने की WEF की चेतावनी*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई  (मुंबई/रिपोर्ट स्पर्श देसाई)वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) ने एक गंभीर आकलन में कहा है कि यदि पूर्वी और पश्चिमी देशों के बीच भू-आर्थिक विखंडन चरम पर पहुँच गया तो वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) से 6.9 ट्रिलियन डॉलर तक की राशि समाप्त हो सकती है। फोरम की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार बढ़ते व्यापार प्रतिबंध,वित्तीय पाबंदियाँ और तकनीकी हस्तांतरण पर रोक पहले ही वैश्विक आर्थिक वृद्धि को प्रभावित कर रही है और सबसे बड़ी चोट उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ने की आशंका है। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि पिछले कुछ वर्षों में प्रमुख शक्तियों के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक व्यापार को सुरक्षा और रणनीतिक प्राथमिकताओं के आधार पर बाँटना शुरू कर दिया है। पश्चिमी देशों द्वारा आपूर्ति शृंखलाओं में विविधता लाने और मित्र-देशों पर केन्द्रित ‘'फ्रेंडशोरिंग’' को अपनाने से एक खंडित आर्थिक ढाँचा उभर रहा है। यदि यह अलगाव सम्पूर्ण रूप ले लेता है तो विश्व अर्थव्...

*1 जुलाई 2026 से बदल रहे हैं ये 6 बड़े नियम:जेब पर पड़ेगा सीधा असर,पासपोर्ट से लेकर क्रेडिट कार्ड तक सब महंगा*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई

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*1 जुलाई 2026 से बदल रहे हैं ये 6 बड़े नियम:जेब पर पड़ेगा सीधा असर,पासपोर्ट से लेकर क्रेडिट कार्ड तक सब महंगा*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई (मुंबई/रिपोर्ट स्पर्श देसाई)1 जुलाई 2026 से देश में आम आदमी के पर्सनल फाइनेंस,यात्रा और बैंकिंग से जुड़े कई महत्वपूर्ण नियम बदलने जा रहे हैं। नए नियमों के लागू होने से जहां एक तरफ पासपोर्ट बनवाना और गाड़ियों को खरीदना महंगा हो जाएगा । वहीं दूसरी तरफ क्रेडिट कार्ड और भारतीय रेलवे के नियमों में भी बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे। यदि आप इन बदलावों से अनजान हैं तो नए महीने की शुरुआत में आपको भारी वित्तीय नुकसान झेलना पड़ सकता है। आइए जानते हैं 1 जुलाई से होने वाले सभी बड़े बदलावों के बारे में। क्रेडिट कार्ड नियमों में बड़ा फेरबदल जैसे मुफ्त लाउंज एक्सेस हुआ मुश्किल। 1 जुलाई से क्रेडिट कार्ड कंपनियों ने मुफ्त मिलने वाली सुविधाओं पर खर्च की शर्तें (Spend Criteria) बढ़ा दी हैं। HDFC बैंक में रेगालिया गोल्ड (Regalia Gold) और अन्य चुनिंदा कार्डधारकों को एक तिमाही में 3 मुफ्त डोमेस्टिक लाउंज विजिट के लिए पिछली तिमाही में कम से कम ₹60,000 खर्च करना अनिवार्य होगा। बैंक ...

*सहारा की रहस्यमयी ''तीसरी इस्लामी'' कौम:जो न सुन्नी हैं,न शिया और जिनकी जिंदगी दुनिया से छुपी है*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई

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*सहारा की रहस्यमयी ''तीसरी इस्लामी'' कौम:जो न सुन्नी हैं,न शिया और जिनकी जिंदगी दुनिया से छुपी है*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई  (मुंबई/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई)सहरा के रेगिस्तान में रहने वाली ये औरते ना तो शिया हैं और ना ही सुन्नी हैं तो फिर ये मुसल्मान कैसे हुएं ?इतना परदा क्यों कर रही हैं?असल में ये एक ऐसी कौम है जो "सहारा डेजर्ट"के बीच में रहती है और इनकी जिन्दगी दुनिया से बिल्कुल अलग थलग है। ये हैं इबादी मुस्लिम ये लोग दुनिया के सबसे पुराने और सबसे कम मालूम फिरके से तालुक रखते हैं ये लोग ज्यादा तर सहारा रेगिस्तान और ओमान में रहते हैं और इन्हें "बर्बर"भी कहा जाता है और इनका मजब है इबादी इसलाम। जो दुनिया का सबसे पुराना और कम मालूम फिरका है और ये इबादी लोग एक बहुती सिक्रेटिव जिन्दगी जीते हैं। इस कौम के मर्दों का एक खास लिबास होता है। लंबे चोली जैसी कमीजें होती हैं और सर पर हमेशा इनके टोपी होती है और वहाँ की और्तें इतना परदा करती हैं कि आपकी सोच गुम हो जाएगी। वेसे तो वहाँ की औरर्तें ज्यादा घर से बाहर नहीं निकलती। उनको मना है लेकिन अगर कभी किसी काम से मजबूरी के...

*सहारा की रहस्यमयी ''तीसरी इस्लामी'' कौम:जो न सुन्नी हैं,न शिया और जिनकी जिंदगी दुनिया से छुपी है*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई

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*सहारा की रहस्यमयी ''तीसरी इस्लामी'' कौम:जो न सुन्नी हैं,न शिया और जिनकी जिंदगी दुनिया से छुपी है*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई  (मुंबई/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई)सहरा के रेगिस्तान में रहने वाली ये औरते ना तो शिया हैं और ना ही सुन्नी हैं तो फिर ये मुसल्मान कैसे हुएं ?इतना परदा क्यों कर रही हैं?असल में ये एक ऐसी कौम है जो "सहारा डेजर्ट"के बीच में रहती है और इनकी जिन्दगी दुनिया से बिल्कुल अलग थलग है। ये हैं इबादी मुस्लिम ये लोग दुनिया के सबसे पुराने और सबसे कम मालूम फिरके से तालुक रखते हैं ये लोग ज्यादा तर सहारा रेगिस्तान और ओमान में रहते हैं और इन्हें "बर्बर"भी कहा जाता है और इनका मजहब है इबादी इसलाम।   जो दुनिया का सबसे पुराना और कम मालूम फिरका है और ये इबादी लोग एक बहुती सिक्रेटिव जिन्दगी जीते हैं। इस कौम के मर्दों का एक खास लिबास होता है। लंबे चोली जैसी कमीजें होती हैं और सर पर हमेशा इनके टोपी होती है और वहाँ की और्तें इतना परदा करती हैं कि आपकी सोच गुम हो जाएगी। वेसे तो वहाँ की औरर्तें ज्यादा घर से बाहर नहीं निकलती। उनको मना है लेकिन अगर कभी किसी काम से मजबूरी...

*कभी सोने-चाँदी से भी कीमती था एल्युमिनियम, सन 1886 में आया ऐसा आविष्कार जिसने बदल दिया इसकी तकदीर*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई

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*कभी सोने-चाँदी से भी कीमती था एल्युमिनियम, सन 1886 में आया ऐसा आविष्कार जिसने बदल दिया इसकी तकदीर*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई  (मुंबई/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई)जब एल्युमिनियम था शाही ठाठ-बाट की निशानी। आज हम जिस एल्युमिनियम को रसोई के बर्तन, कोल्ड ड्रिंक के कैन और खाना पैक करने के फॉइल के रूप में रोजमर्रा में इस्तेमाल करते हैं, वह करीब 150 साल पहले सोने-चाँदी से भी अधिक कीमती हुआ करता था। यह सुनकर हैरानी हो सकती है, लेकिन यह सच है। दरअसल 19वीं सदी के मध्य तक शुद्ध एल्युमिनियम निकालना बेहद मुश्किल था। पृथ्वी की सतह पर यह सबसे अधिक मात्रा में पाया जाने वाली धातु है फिर भी यह प्रकृति में कभी शुद्ध रूप में नहीं मिलती। यह ऑक्सीजन से तेजी से जुड़कर एल्युमिना (Al₂O₃) बना लेती है। जिसे तोड़ना अत्यंत कठिन होता है। इसी कारण इसे निकालने के लिए भारी मात्रा में ऊर्जा और जटिल प्रक्रियाओं की जरूरत पड़ती थी।  नेपोलियन की दावतें और एल्युमिनियम का दबदबा था। फ्रांस के सम्राट नेपोलियन तृतीय अपने विशिष्ट मेहमानों को एल्युमिनियम के बर्तनों में खाना परोसते थे। जबकि कम खास मेहमानों को सोने और चाँदी के बर्तन मिलते थे। ...