*अमरीकी वाशिंगटन के गलियारों में सन्नाटा: क्या 23 जुलाई 2026 का फैसला बदल देगा अमेरिका-चीन रिश्तों की दिशा?*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
*अमरीकी वाशिंगटन के गलियारों में सन्नाटा: क्या 23 जुलाई 2026 का फैसला बदल देगा अमेरिका-चीन रिश्तों की दिशा?*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
(मुंबई/रिपोर्ट स्पर्श देसाई)वाशिंगटन के गलियारों में इस समय जो सन्नाटा है। वह किसी बड़े तूफान के आने की आहट है। कल तक जो अमेरिका दुनिया को टैरिफ की धमकियां देता था। आज वह खुद अपने ही बुने हुए जाल में फंस गया है। चीन ने 90 अरब डॉलर का ऐसा आर्थिक बम फोड़ा है कि अमेरिका की कृषि से लेकर एनर्जी सेक्टर तक की नीव हिल गई है। लेकिन यह तो सिर्फ झांकी है। असली खबर उस 23 जुलाई 2026 के फैसले में छिपी है। जिसने रातों-रात बीजिंग और वाशिंगटन के रिश्तों को उस नए मोड़ पर खड़ा कर दिया जहां से वापसी नामुमकिन है।
दरअसल पीटरसन इंस्टिट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकॉनमी की रिपोर्ट कोई सामान्य चेतावनी नहीं है। यह अमेरिका के लिए एक डेथ वारंट की तरह है अगर साल 2017 में ट्रंप ने वो ट्रेड वॉर शुरू ना किया होता तो आज अमेरिकी कंपनियां हर साल $90 अरब डॉलर का एक्स्ट्रा प्रॉफिट कमा रही होती । यह पैसा कहां से आता? यह पैसा आता अमेरिका के सोयाबीन किसानों की जेब से, टेक्सास के तेल कुओं से और मिड वेस्ट की फैक्ट्रियों से लेकिन आज हालत क्या है? चीन जो दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आयात करने वाली अर्थव्यवस्था है।उसने अमेरिका की तरफ पीठ कर ली है। निर्यात साल 2008 की वैश्विक मंदी के स्तर पर गिर चुका है।
इसका सीधा मतलब है कि अमेरिका की ग्रोथ अब रिवर्स गियर में है। अब बात करते हैं उस सेक्टर की जिसने अमेरिका की कमर तोड़ दी है। ऊर्जा यानि एनर्जी। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा एलएनजी एक्सपोर्टर बनने का सपना देखता रहता था लेकिन चीन ने एक ही झटके में सपने को चकनाचूर कर दिया। साल 2026 की शुरुआत में चीन ने अमेरिकी गैस खरीदना लगभग शून्य कर दिया। क्यों? क्योंकि टैरिफ की वजह से अमेरिकी गैस इतनी महंगी हो गई कि चीन को क़तर और रूस से गैस मंगाना सस्ता पड़ने लगा। हैरानी की बात यह है कि चीन की चालाकी यहां खत्म नहीं हुई। चीन की कंपनियों ने अमेरिका से जो गैस पहले से बुक कर रखी थी। उसे अपने देश लाने के बजाय रास्ते में ही यूरोप को महंगे दाम पर बेच दिया। यानी अमेरिका की गैस,चीन का मुनाफा और अमेरिका का बाजार खत्म। एक्सपर्टों का मानना है कि अब चीन कभी भी अमेरिका के साथ नए लॉन्ग टर्म एग्रीमेंट नहीं करेगा। 23 जुलाई 2026: वह फैसला जिसने पलट दिया खेल।
आखिर 23 जुलाई 2026 को ऐसा क्या हुआ? दरअसल अमेरिका का पुराना टैरिफ सिस्टम कानूनी लड़ाई में हार गया था । अपनी ईगो बचाने के लिए अमेरिकी प्रशासन ने सेक्शन 301 का इस्तेमाल किया और चीनी सामानों पर 12.5% का नया टैक्स थोप दिया। बहाना बनाया गया"जबरन श्रम"लेकिन इसके पीछे की कड़वी सच्चाई कुछ और ही थी। अमेरिका को पता था कि अगर उसने यह टैरिफ नहीं लगाया तो चीन का सस्ता सामान अमेरिकी मार्केट को पूरी तरह से निकाल देगा लेकिन चीन ने इसका ऐसा जवाब दिया जिसकी उम्मीद पेंटागन को भी नहीं थी। 27 जुलाई 2026 को ब्लूमबर्ग ने एक ऐसी रिपोर्ट छापी जिसने वाशिंगटन की साख को मिट्टी में मिला दिया। चीन ने दावा किया कि अमेरिका ने बंद कमरों में उनसे भीख मांगी थी कि "हम टैरिफ तो लगा रहे हैं लेकिन वादा करते हैं यह 20% से ऊपर नहीं जाएगा।"चीन ने इस प्राइवेट बातचीत को पब्लिक कर दिया। यह अमेरिका के लिए सबसे बड़ी शर्मिंदगी थी। इससे दुनिया को क्या मैसेज गया? यह गया कि "महाशक्ति" कहलाने वाला अमेरिका अब चीन के साथ डील करने के लिए मजबूर है। साल 2022 में जब रूस के डॉलर फ्रीज किए गए थे, तब हमने कहा था कि अमेरिका अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार रहा है।
आज वही हालात अमेरिका के सामने हैं - उसकी नीतियां उलटी पड़ रही हैं और दुनिया उसे अकेला छोड़ रही है इसलिए वाशिंगटन के गलियारों में सन्नाटा छा गया है। 23 जुलाई 2026 का फैसला बदल दिया है अमेरिका- चीन रिश्तों की दिशा? हालांकि वाशिंगटन के गलियारों में इस समय जो सन्नाटा है। वह किसी बड़े तूफान के आने की आहट है। कल तक जो अमेरिका दुनिया को टैरिफ की धमकियां देता था। आज वह खुद अपने ही बुने हुए जाल में फंस गया है। चीन ने 90 अरब डॉलर का ऐसा आर्थिक बम फोड़ा है कि अमेरिका की कृषि से लेकर एनर्जी सेक्टर तक की नीव हिल गई है लेकिन यह तो सिर्फ झांकी है। असली खबर उस 23 जुलाई 2026 के फैसले में छिपी है। जिसने रातों-रात बीजिंग और वाशिंगटन के रिश्तों को उस नए मोड़ पर खड़ा कर दिया है। जहां से वापस आना नामुमकिन है। पीटरसन इंस्टिट्यूट की चेतावनी के मद्देनजर $90 अरब का नुकसान हुआ है। दरअसल पीटरसन इंस्टिट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकॉनमी की रिपोर्ट कोई सामान्य चेतावनी नहीं है। यह अमेरिका के लिए एक"डेथ वारंट"की तरह है अगर 2017 में ट्रंप ने वो ट्रेड वॉर शुरू ना किया होता तो आज अमेरिकी कंपनियां हर साल $90 अरब डॉलर का एक्स्ट्रा प्रॉफिट कमा रही होतीं। यह पैसा कहां से आता?यह कैसा अमेरिका के सोयाबीन किसानों की जेब से,टेक्सास के तेल कुओं से और मिड वेस्ट की फैक्ट्रियों से आता है लेकिन आज हालत क्या है? वह देखें तो कृषि क्षेत्रों में अमेरिका की रीढ़ टूट गई है। चीन जो दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आयात करने वाली अर्थव्यवस्था है।
उसने अमेरिका की तरफ पीठ कर ली है। आंकड़े चौंकाने वाले हैं। चीन के जवाबी टैरिफ के कारण मार्च 2025 से फरवरी 2026 के बीच अमेरिकी कृषि निर्यात में $14.9 अरब डॉलर की गिरावट आई है। साल 2024 में यह निर्यात $24.5 अरब था। जो 2025 में गिरकर $8.4 अरब रह गया था। जो साल 2007 के बाद का सबसे निचला स्तर है। सोयाबीन सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। जिसमें $6.8 अरब का नुकसान हुआ है। साल 2026 की पहली तिमाही में कृषि व्यापार 45.5% घट गया था। अमेरिकी कृषि निर्यात में 56.9% की भारी गिरावट आई है। अमेरिकी कृषि विभाग के अनुसार साल 2025/26 में अमेरिका से चीन को सोयाबीन निर्यात19 साल के निचले स्तर पर पहुंच गया था। ब्राजील ने अमेरिका की जगह ले ली है। एनर्जी सेक्टर को लेकर अमेरिकी गैस पर चीन का मुनाफा बढ़ा है। अब बात करते हैं उस सेक्टर की जिसने अमेरिका की कमर तोड़ दी है। ऊर्जा को लेकर अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा एलएनजी एक्सपोर्टर बनने का सपना देखता रहता था लेकिन चीन ने एक ही झटके में सपने को चकनाचूर कर दिया है। साल 2026 की शुरुआत में चीन ने अमेरिकी गैस खरीदना लगभग शून्य कर दिया है। इसका प्रमाण यह है कि जुलाई 2026 में चीन के एलएनजी आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी महज 9% रह गई थी। जबकि ऑस्ट्रेलिया 42% और मलेशिया 10% के साथ आगे रहे थे। साल 2026 की पहली तिमाही में चीन का एलएनजी आयात 18.61% घटा क्यों? क्योंकि टैरिफ की वजह से अमेरिकी गैस इतनी महंगी हो गई कि चीन को क़तर,ऑस्ट्रेलिया और रूस से गैस मंगाना सस्ता पड़ने लगा था। एक्सपर्टों का मानना है कि अब चीन कभी भी अमेरिका के साथ नए लॉन्ग टर्म एग्रीमेंट नहीं करेगा। हैरानी की बात यह है कि चीन की चालाकी यहां खत्म नहीं हुई थी।
चीन की कंपनियों ने अमेरिका से जो गैस पहले से बुक कर रखी थी। उसे अपने देश लाने के बजाय रास्ते में ही यूरोप को ही महंगे दाम पर बेच दिया था यानि अमेरिका की गैस,चीन का मुनाफा और अमेरिका का बाजार खत्म। चीन की मजबूत चाल के मद्देनजर टैरिफ हो गया फेल,वहां चीन का एक्सपोर्ट भी बढ़ा है। सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि टैरिफ के बावजूद चीन का निर्यात बढ़ रहा है। साल 2025 में चीन का व्यापार अधिशेष $1.2 ट्रिलियन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। जनवरी- फरवरी 2026 में चीन का निर्यात 21.8% बढ़ा था। अमेरिका को सीधे निर्यात में गिरावट आई लेकिन गैर-अमेरिकी बाजारों में निर्यात में $124.95 अरब की बढ़ोतरी हुई। अमेरिका की चीन के कुल आयात में हिस्सेदारी अब सिर्फ10.2% रह गई है। दौरान 23 जुलाई 2026 का वह फैसला जिसने पलट दिया था खेल। आखिर 23 जुलाई 2026 को ऐसा क्या हुआ? दरअसल अमेरिका का पुराना टैरिफ सिस्टम कानूनी लड़ाई में हार गया था। फरवरी 2026 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने IEEPA के तहत लगाए गए टैरिफ को अवैध करार दिया था। इसके बाद अमेरिका को लगभग $1750 अरब टैरिफ वापस करने पड़े थे।
अपनी ईगो बचाने के लिए अमेरिकी प्रशासन ने सेक्शन 301 का इस्तेमाल किया और 60 देशों पर 10-12.5% का नया टैक्स थोप दिया। बहाना बनाया गया "जबरन श्रम" लेकिन इसके पीछे की कड़वी सच्चाई कुछ और ही थी। 25 अमेरिकी राज्यों ने इस नए टैरिफ के खिलाफ मुकदमा दायर किया है। कहा कि प्रशासन सुप्रीम कोर्ट से हारने के बाद अवैध तरीके से टैक्स बढ़ा रहा है। न्यूयॉर्क के अटॉर्नी जनरल लेटिटिया जेम्स ने कहा कि "सुप्रीम कोर्ट में हारने के बाद प्रशासन एक बार फिर परिवारों और व्यवसायों पर अवैध रूप से टैक्स बढ़ा रहा है"। अमेरिका की नाकामी को लेकर टैरिफ का उल्टा असर हुआ है। यह सबसे बड़ी विडंबना है कि टैरिफ का उल्टा असर हुआ है। मई 2026 में अमेरिका का व्यापार घाटा 18.7% बढ़कर $100 अरब हो गया था। टैरिफ न तो घाटा कम कर सके,न मैन्युफैक्चरिंग लौटा सके। विशेषज्ञों के अनुसार"टैरिफ नीति विफल रही है"यह मुद्रास्फीति बढ़ा रही है। नौकरियां नहीं बढ़ा रही। अमेरिकी विनिर्माण का GDP में हिस्सा 2025 में 10% से नीचे आ गया। कोलनी की रिपोर्ट बताती है कि साल 2024-25 में मैन्युफैक्चरिंग रिटर्न इंडेक्स नकारात्मक रहा था।
स्टील जैसे संरक्षित उद्योगों को फायदा हुआ लेकिन ऑटो,मशीनरी और इलेक्ट्रॉनिक्स को नुकसान। 27 जुलाई 2026 का ब्लूमबर्ग का खुलासा देखें तो 27 जुलाई 2026 को ब्लूमबर्ग ने एक ऐसी रिपोर्ट छापी जिसने वाशिंगटन की साख को मिट्टी में मिला दिया है। चीन ने दावा किया कि अमेरिका ने बंद कमरों में उनसे"भीख मांगी"थी कि"हम टैरिफ तो लगा रहे हैं लेकिन वादा करते हैं यह 20% से ऊपर नहीं जाएगा।" चीन ने इस प्राइवेट बातचीत को पब्लिक कर दिया। यह अमेरिका के लिए सबसे बड़ी शर्मिंदगी है कि "महाशक्ति" कहलाने वाला अमेरिका अब चीन के साथ डील करने के लिए मजबूर है। साल 2022 में जब रूस के डॉलर फ्रीज किए गए थे। तब हमने कहा था कि अमेरिका अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार रहा है। आज वही हालात अमेरिका के सामने हैं। उसकी नीतियां उलटी पड़ रही हैं और दुनिया उसे अकेला छोड़ रही है। टैरिफ युद्ध में अमेरिका को सबसे बड़ा झटका लगा है। उसकी कृषि चरमराई, ऊर्जा क्षेत्र ध्वस्त हुआ,व्यापार घाटा बढ़ा और दुनिया में उसकी साख गिरी।(Photos Courtesy Social media and AI)
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