*सुप्रीम कोर्ट के सवालों से चुनाव आयोग नियुक्ति विवाद गरमाया, आगामी साल 2029 चुनाव से पहले क्या बदलेगी व्यवस्था?*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
*सुप्रीम कोर्ट के सवालों से चुनाव आयोग नियुक्ति विवाद गरमाया, आगामी साल 2029 चुनाव से पहले क्या बदलेगी व्यवस्था?*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
(मुंबई/रिपोर्ट स्पर्श देसाई)चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी ने मोदी सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। वह मुद्दा जिसे विपक्ष लंबे समय से उठा रहा था। अब उसी पर सर्वोच्च न्यायालय ने भी सवाल खड़े किए हैं। चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर देश में एक नई बहस शुरू हो गई है और इसका सीधा संबंध 2029 के आम चुनावों से भी जुड़ा है । सुप्रीम कोर्ट ने क्या पूछा? वो जाने तो दरअसल चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति से जुड़े कानून को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने केंद्र सरकार से कई अहम सवाल पूछे थे।
उसके मद्देनजर सबसे बड़ा सवाल यह था कि जब चुनाव आयोग लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण संस्थान हैं तो उसकी नियुक्ति प्रक्रिया में मुख्य न्यायाधीश (CJI) को क्यों हटा दिया गया? अदालत ने पूछा कि जब लोकपाल और CBI निदेशक जैसे महत्वपूर्ण पदों की चयन समितियों में CJI शामिल हैं तो चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान की नियुक्ति प्रक्रिया में उन्हें शामिल करने में क्या दिक्कत है? कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि उसने पहले कहा था कि गंभीर आपराधिक मामलों का सामना कर रहे लोगों को मंत्री बनाने से बचना चाहिए और पूछा कि कितने मंत्रियों पर मामले लंबित हैं । अहम टिप्पणी के मद्देनजर जैसा आपने कहा कि जज ही जज को चुनते हैं। हम सोचते हैं कि क्या आजकल जज ही जज को चुनते हैं? यह टिप्पणी कोर्ट ने सरकार की उस दलील के जवाब में की। जिसमें कहा गया था कि न्यायपालिका को कार्यपालिका के क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए । इसी दौरान विपक्ष की क्या है दलील? वह देखें तो विपक्ष का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में सरकार का प्रभाव ज्यादा है। चयन समिति में प्रधानमंत्री और एक केंद्रीय मंत्री शामिल हैं। जबकि विपक्ष की ओर से केवल नेता प्रतिपक्ष होते हैं यानि समिति में 2:1 का बहुमत सरकार के पास है । विपक्ष लगातार मांग करता रहा है कि चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश को फिर से शामिल किया जाए ताकि नियुक्ति प्रक्रिया अधिक संतुलित और पारदर्शी हो सके । कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने फरवरी 2025 में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति के दौरान आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले नियुक्तियां नहीं होनी चाहिएं ।
इसके लिए सरकार का क्या है पक्ष? वह देखें तो केंद्र सरकार ने अदालत के सामने अपना पक्ष मजबूती से रखा। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि
"प्रधानमंत्री के पद की एक पवित्रता है अगर उनके फैसलों पर भरोसा नहीं किया जा सकता तो क्या उन्हें अपने कैबिनेट के चयन में भी किसी पूर्व न्यायाधीश या बाहरी व्यक्ति से सलाह लेनी चाहिए? कोर्ट को यह नहीं मानना चाहिए कि प्रधानमंत्री और मंत्री "बुरी नीयत" से या "लोकतंत्र के खिलाफ" कार्य करेंगे सिर्फ इसलिए कि उनके पास समिति में बहुमत है । साल 2023 का कानून संसद ने अपनी संवैधानिक शक्ति का उपयोग करते हुए बनाया है और अनूप बरनवाल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था कि संसद इस विषय पर कानून बना सकती है । सरकार ने इस मामले को पांच जजों की संविधान पीठ को भेजे जाने की मांग की है ।
क्या है पूरा मामला और पृष्ठभूमि? वह जाने तो संविधान के अनुच्छेद 324(2) के अनुसार चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति "संसद द्वारा इस संबंध में बनाए गए किसी कानून के प्रावधानों के अधीन रहते हुए" राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी। साल 1991 से 2023 तक कोई कानून नहीं था इसलिए नियुक्तियां पूरी तरह सरकार के अधीन थीं। कानून मंत्रालय पैनल बनाता था। पीएम सिफारिश करते थे और राष्ट्रपति नियुक्ति करते थे । मार्च 2023 अनूप बरनवाल मामले के अनुसार सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ ने फैसला दिया कि जब तक संसद कानून नहीं बनाती। नियुक्तियां पीएम, CJI और नेता प्रतिपक्ष की समिति के माध्यम से हों । दिसंबर 2023 से संसद ने नया कानून बनाया । जिसमें CJI की जगह एक कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया । जिससे समिति में सरकार के दो सदस्य पीएम + मंत्री और विपक्ष का एक सदस्य नेता प्रतिपक्ष हो गया ।
साल 2024 में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और जया गुप्ता सहित कई याचिकाकर्ताओं ने इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी । फरवरी 2025 में इसी नई व्यवस्था के तहत ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया । दौरान कोर्ट का बड़ा संकेत दिया कि'निष्पक्षता दिखनी भी चाहिए' सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि उसे प्रधानमंत्री पर भरोसा नहीं है। ऐसा नहीं है। कोर्ट ने कहा कि यह भरोसे की कमी का मामला नहीं है। चुनाव आयुक्त को एक स्वतंत्र व्यक्ति होना चाहिए। क्या समिति में निष्पक्षता का प्रदर्शन नहीं होना चाहिए? हम यह नहीं कह रहे कि इस समिति से निष्पक्षता नहीं मिल रही है लेकिन जिस तरह न्याय सिर्फ होना ही नहीं चाहिए बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए । हम उसी दूसरे हिस्से पर बात कर रहे हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि संसद में इस कानून पर उचित बहस नहीं हुई और "निर्वाचितों का अत्याचार" (tyranny of the elected) की बात की । आगामी साल 2029 चुनाव से क्या कनेक्शन है? वो समझे तो यह मामला 2029 के आम चुनावों से जुड़ा है क्योंकि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार जनवरी 2029 में सेवानिवृत्त हो रहे हैं।
चुनाव आयुक्त सुखबीर संधू जुलाई 2028 में सेवानिवृत्त होंगे। अगर मामला संविधान पीठ को भेजा जाता है तो सुनवाई में लंबा समय लग सकता है और सरकार मौजूदा व्यवस्था के तहत आगामी साल 2029 चुनाव से पहले नए आयुक्तों की नियुक्ति कर सकती है । आगे क्या होगा? वह जाने तो सुप्रीम कोर्ट ने सरकार और याचिकाकर्ताओं दोनों से लिखित हलफनामे मांगे हैं और अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। क्या इस मामले को 5 जजों की संविधान पीठ को भेजा जाए ? इस पर कोर्ट अलग से फैसला करेगा । याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सरकार ने 28 दिनों की सुनवाई के बाद अचानक केस ट्रांसफर की मांग उठाई है। जो सही नहीं है । अंतिम फैसले से तय होगा कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की मौजूदा व्यवस्था जारी रहेगी या इसमें बदलाव होगा।( Photos Courtesy Social media and AI)
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