*क्रांतिकारी कानूनी क्रांति:कैसे 1773 के 'रेगुलेटिंग एक्ट' ने बदल दी भारत की तक़दीर?भूख,भ्रष्टाचार और फाँसी ने भारत की न्याय व्यवस्था को जन्म दिया*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई

*क्रांतिकारी कानूनी क्रांति:कैसे 1773 के 'रेगुलेटिंग एक्ट' ने बदल दी भारत की तक़दीर?भूख,भ्रष्टाचार और फाँसी ने भारत की न्याय व्यवस्था को जन्म दिया*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई 


(मुंबई/रिपोर्ट स्पर्श देसाई) क्या आप जानते हैं? भारत का पहला आधुनिक कानून अंग्रेजों ने सन 1773 में बनाया था। जिसे Regulating Act कहा गया था । भारत पर उनका शासन अंग्रेजी नियमों से चला। अंग्रेजों ने वारन हैस्टिंग्स को पहला गवर्नर जनरल नियुक्त किया था ताकि पूरे हिंदुस्तान पर अंग्रेजी हुकूमत का दबदबा बना रहे। कलकत्ता में पहला सुप्रीम कोट इसी रेगुलेटिंग आक्ट कानून के तहत बन चुका था।  पूरे भारत में कानून अंग्रेजी हुकूमत के आदेश से चला था। क्या आप जानते हैं कि भारत में आधुनिक कानूनी व्यवस्था की नींव एक ऐसे कानून से रखी गई। जो लगभग 250 साल पहले ब्रिटिश संसद में पारित हुआ था? यह वह समय था जब भारत पर अंग्रेज़ों का शासन औपचारिक रूप से स्थापित हो रहा था और उन्हें अपनी विशाल जागीर को व्यवस्थित करने के लिए एक सुदृढ़ कानूनी ढांचे की आवश्यकता थी । इसी ज़रूरत ने सन 1773 में 'रेगुलेटिंग एक्ट' को जन्म दिया। जो भारत में ब्रिटिश संसद का पहला बड़ा हस्तक्षेप था और जिसने देश के कानूनी इतिहास को एक नई दिशा दी। दौरान अकाल और दिवालियापन ने बदला था इतिहास।


 सन1773 का यह ऐतिहासिक कानून अचानक नहीं बना। इसके पीछे एक बड़ा संकट था। "ईस्ट इंडिया कंपनी" पर कर्ज़ का बोझ बढ़ रहा था और बंगाल में उसका कुशासन चरम पर था। कंपनी के सामने दिवालियापन का खतरा मंडरा रहा था और उसे ब्रिटिश सरकार से कर्ज़ लेने की नौबत आ गई थी। ब्रिटिश प्रधानमंत्री लॉर्ड नॉर्थ ने इस गंभीर स्थिति को देखते हुए कंपनी के भारतीय प्रांतों के प्रबंधन में सुधार के लिए यह ऐतिहासिक कानून पेश किया था। जब वारेन हेस्टिंग्स बने थे ''सरकार''के मुखिया। इस कानून के तहत सबसे महत्वपूर्ण बदलाव बंगाल के गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स को भारत का पहला गवर्नर- जनरल नियुक्त करना था । अब उनका अधिकार सिर्फ बंगाल तक सीमित नहीं था बल्कि उन्हें मद्रास और बॉम्बे प्रेसीडेंसी पर भी नियंत्रण का अधिकार दे दिया गया हालांकि हेस्टिंग्स की शक्ति पूर्ण नहीं थी। उन्हें चार सलाहकारों की एक परिषद के साथ काम करना था और किसी भी फैसले में बहुमत की राय निर्णायक होती थी। गवर्नर-जनरल को केवल बराबरी की स्थिति में ही निर्णायक वोट देने का अधिकार था। कलकत्ता में सुप्रीम कोर्ट का जन्म हुआ था। 


रेगुलेटिंग एक्ट की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक थी 1774 में कलकत्ता (अब कोलकाता) में सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) की स्थापना। यह भारत का पहला आधुनिक न्यायालय था। जिसकी अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश सर एलिजा इम्पी ने की थी । इस न्यायालय के पास दीवानी,फौजदारी, धार्मिक और समुद्री मामलों की सुनवाई का अधिकार था। यह न्यायालय न केवल अंग्रेज़ नागरिकों पर बल्कि कंपनी के कर्मचारियों और कुछ मामलों में भारतीय नागरिकों पर भी अपना अधिकार रखता था । दिलचस्प बात यह है कि यह न्यायालय अपने फैसलों में मुख्य रूप से अंग्रेज़ी कानून का पालन करता था लेकिन हिंदू और मुस्लिम व्यक्तिगत कानूनों को भी महत्व देता था। एक क्रांति की शुरुआत के मद्देनजर हालांकि रेगुलेटिंग एक्ट में कई खामियां थीं । जैसे गवर्नर-जनरल को वीटो की शक्ति न होना और सुप्रीम कोर्ट के अधिकारों की स्पष्ट परिभाषा का अभाव फिर भी इसने भारत में आधुनिक कानूनी व्यवस्था की नींव रखी थी । यह वह पहला कदम था जिसने भारत में ब्रिटिश शासन को नियंत्रित करने की प्रक्रिया शुरू की। जो सन1858 में पूरी हुई । जब भारत सीधे ब्रिटिश ताज के अधीन आ गया था। भारत का यह पहला आधुनिक कानून न सिर्फ एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ है बल्कि यह उस युग की शुरुआत है। जब भारत में कानूनों की संहिताबद्ध व्यवस्था ने आकार लेना शुरू किया था। आज भी जब हम भारतीय न्यायपालिका की बात करते हैं तो इसी सन 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट की विरासत हमें याद आती है ।“कानून के राज” की यात्रा की शुरुआत एक ऐसे कानून से हुई थी । जिसे खुद अपने ही विरोधाभासों से जूझना पड़ा था। सन् 1773 का रेगुलेटिंग एक्ट भारतीय इतिहास में सिर्फ एक कानून नहीं बल्कि एक ऐसा महाकाव्य है। जिसमें भूख,भ्रष्टाचार,राजनीतिक साजिश और न्याय की अनोखी परिभाषा का अजीब संगम है। यह वह समय था जब ईस्ट इंडिया कंपनी जो एक व्यापारिक कंपनी थी,अचानक से बंगाल,बिहार और उड़ीसा की “दीवानी” (राजस्व वसूली का अधिकार) की मालिक बन गई थी पर यह “जीत” कंपनी के लिए अभिशाप साबित हुई। प्रशासन अस्त-व्यस्त था। भ्रष्टाचार चरम पर था और सन 1770 का बंगाल का अकाल ऐसा आया कि लगभग एक-तिहाई आबादी का काल ने ग्रास कर लिया था । कंपनी का खजाना खाली था। उस पर 1.4 मिलियन पाउंड का कर्ज़ था और उसे ब्रिटिश सरकार से लोन लेने की नौबत आ गई। जब कंपनी के'नवाब' बने और संसद ने लगाई थी लगाम। लॉर्ड नॉर्थ की सरकार के लिए यह संकट था और मौका भी। सन1772 में कंपनी के डूबते जहाज को बचाने के लिए ब्रिटिश संसद ने हस्तक्षेप किया और ऐतिहासिक रेगुलेटिंग एक्ट पारित किया था। इस कानून ने कंपनी के भारतीय प्रांतों में पहली बार संसदीय नियंत्रण की बुनियाद रखी थी।


 दौरान 4 बड़े बदलाव हुएं उस 4 बड़े बदलाव जिन्होंने इतिहास बदल दिया था। जिसके तहत गवर्नर-जनरल का जन्म हुआ था। बंगाल के गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स को भारत का पहला गवर्नर-जनरल बनाया गया । मद्रास और बॉम्बे अब उनके अधीन कर दिए गए थे। यही वह क्षण था जब भारत का केंद्रीकरण शुरू हुआ । दूसरा कलकत्ता में सुप्रीम कोर्ट का निर्माण ।सन 1774 में कलकत्ता में एक सर्वोच्च न्यायालय स्थापित किया गया था । जिसके पहले मुख्य न्यायाधीश सर एलिजा इम्पी बने।  यह कोर्ट अंग्रेज़ी कानून के तहत सभी ब्रिटिश नागरिकों और कंपनी के नौकरों पर अपना अधिकार रखता था । तिसरा बदलाव भ्रष्टाचार पर शिकंजा कहना। कानून ने स्पष्ट कर दिया कि गवर्नर-जनरल,जजों या कंपनी के किसी भी अधिकारी के लिए भारतीय राजकुमारों या जमींदारों से कोई उपहार या रिश्वत लेना अब अपराध था और चौथा व आखरी डायरेक्टर्स की सत्ता पर अंकुश।  कंपनी के निदेशकों का कार्यकाल 1 साल से बढ़ाकर 4 कर दिया गया और हर साल एक-चौथाई निदेशक सेवानिवृत्त होते थे । इससे उनकी मनमानी पर रोक लगाने की कोशिश की गई । कानून के 'दाग' के मद्देनजर एक ज़मींदार की फाँसी की कहानी यहां देखें तो यह कानून अपने अंदर इतिहास का सबसे विवादास्पद न्यायिक हत्याकांड भी छिपाए है। महाराजा नंदकुमार एक अनुभवी और प्रभावशाली ब्राह्मण अधिकारी ने गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था । यह आरोप हेस्टिंग्स के लिए खतरनाक साबित हो रहा था लेकिन फिर क्या हुआ? नंदकुमार को कोर्ट ने एक पुराने जाली दस्तावेज़ (फोर्जरी) के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था । यह आरोप एक ऐसे ब्रिटिश कानून (1729) के तहत लगाया गया था। जो पहले कभी किसी भारतीय पर लागू नहीं किया गया था । अगस्त 1775 में मुख्य न्यायाधीश एलिजा इम्पी जो हेस्टिंग्स के करीबी सहयोगी थे। उन्होंने नंदकुमार को फाँसी की सजा सुनाई थी। भारत में पहली बार ब्रिटिश अधिकारियों ने किसी भारतीय को फाँसी दी गई थी। नंदकुमार की फाँसी ने साफ कर दिया कि न्यायालय राजनीतिक विरोधियों को खत्म करने का एक हथियार मात्र था ।


 इतिहासकार इसे “लॉफेयर” कानून को युद्ध की तरह इस्तेमाल करना उस का पहला और सबसे काला उदाहरण मानते हैं। जहां कानूनी प्रक्रिया का मुखौटा पहनकर राजनीतिक बदला लिया गया था । 'अधूरा सपना': क्यों असफल रहा यह कानून? और रेगुलेटिंग एक्ट में इतनी खामियां थीं कि यह अपने उद्देश्य में पूरी तरह असफल रहा था गवर्नर-जनरल बेबस नजर आते थे। हेस्टिंग्स के पास वीटो पावर नहीं थी। काउंसिल के 4 में से 3 सदस्य (क्लेवरिंग, मॉनसन और फ्रांसिस) उनके खिलाफ थे और वे हर प्रस्ताव को रोक देते थे । हेस्टिंग्स को सन1776 में इस्तीफा भी देना पड़ा हालांकि बाद में उन्होंने इसे वापस ले लिया था । न्यायालय बनाम सरकार के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट और गवर्नर-जनरल की काउंसिल के बीच अधिकार क्षेत्र को लेकर जंग छिड़ गई थी। कानून स्पष्ट नहीं था कि किसके पास कितनी ताकत है? जिससे अराजकता फैल गई थी। केंद्रीय नियंत्रण भी असफल रहा । मद्रास और बॉम्बे ने "आपातकाल"का बहाना बनाकर बार-बार केंद्र के आदेशों की अवहेलना की थी दौरान भ्रष्टाचार जारी रहा था। रिश्वत पर रोक लगाने के बावजूद,भ्रष्टाचार कम नहीं हुआ था। हेस्टिंग्स पर खुद महाभियोग (इंपीचमेंट) के दौरान भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे थे। एक इतिहासकार के अनुसार इस कानून ने "न तो राज्य को कंपनी पर,न निदेशकों को अपने कर्मचारियों पर,न गवर्नर-जनरल को अपनी काउंसिल पर और न ही कलकत्ता को मद्रास-बॉम्बे पर कोई स्पष्ट नियंत्रण दिया" फिर भी यह एक "यूरोपीय शक्ति का विदेशी सभ्य समाज पर शासन करने का पहला गंभीर प्रयास" था। जिसने ब्रिटिश संसद को भारत के मामलों में सीधी भूमिका निभाने का अधिकार दिया । इस कानून की विफलताओं को दूर करने के लिए 1781 में ज्यूडिकेचर एक्ट (एक्ट ऑफ सेटलमेंट) और 1784 में पिट्स इंडिया एक्ट आए थे । जिन्होंने भारत में ब्रिटिश शासन को और मज़बूत और स्पष्ट किया । (Photos Courtesy Social media and AI)

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