*अमेरिकी दबाव में भारत ने नहीं छोड़ा चाबहार पोर्ट, 120 मिलियन डॉलर बर्बाद नहीं;मोंगला पोर्ट पर चीन को मिली जगह के पीछे है ये वजह*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई

*अमेरिकी दबाव में भारत ने नहीं छोड़ा चाबहार पोर्ट, 120 मिलियन डॉलर बर्बाद नहीं;मोंगला पोर्ट पर चीन को मिली जगह के पीछे है ये वजह*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई 


(मुंबई/रिपोर्ट स्पर्श देसाई)एक वायरल वीडियो की खबर कुछ इस तरह की है कि एक बड़ी खबर सामने आ रही है अमेरिका के दबाव में मोदी सरकार ने चाबहार पोर्ट से अपना कंट्रोल छोड़ दिया है। इस प्रोजेक्ट के लिए सरकार ने 120 मिलियन डॉलर खर्च किये थे । जो अब स्वाहा हो गए हैं। बांगलादेश नहीं मॉंगलापोर्ट के पास एक स्पेशल एकनॉमिक जोन विकसित करने के लिए चीन की सरकारी कंपनी के साथ समझौता कर लिया है। ये वही जमीन है जिसे पहले भारती एकनॉमिक जोन के लिए अलोकेटिट किया गया था। इसे नई दिल्ली के लिए बड़ा कूटनीतिक और रणनीतिक जटका माना जा रहा है।



Fact Check: क्या अमेरिका के दबाव में भारत ने छोड़ा चाबहार पोर्ट? जानिए मोंगला पोर्ट की सच्चाई
सोशल मीडिया और कुछ मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक खबर तेजी से वायरल हो रही है कि जिसमें दावा किया जा रहा है कि अमेरिकी दबाव में मोदी सरकार ने चाबहार पोर्ट (Chabahar Port) से अपना नियंत्रण छोड़ दिया है और 120 मिलियन डॉलर का निवेश बेकार हो गया है साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि बांग्लादेश ने मोंगला पोर्ट (Mongla Port) पर भारत को दरकिनार कर चीन के साथ समझौता कर लिया है। आइए इन दावों की सच्चाई की पड़ताल करते हैं।



चाबहार पोर्ट पर भारत की स्थिति क्या है?उसके मद्देनजर वायरल दावे के विपरीत भारत ने चाबहार पोर्ट से अपना नियंत्रण नहीं छोड़ा है हालांकि अमेरिकी प्रतिबंधों (US Sanctions) के कारण यह प्रोजेक्ट जटिल स्थिति में जरूर हैं। अमेरिका ने 26 अप्रैल 2026 को चाबहार पोर्ट परियोजना के लिए दी गई छूट (Sanctions Waiver) समाप्त कर दी थी । इसके बाद भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह इस मामले पर सभी हितधारकों के संपर्क में है। क्या भारत का 120 मिलियन डॉलर बर्बाद हो गया? वह देखें तो नहीं।
 

भारत सरकार ने मई 2024 में ईरान के साथ 10 साल के अनुबंध के तहत120 मिलियन डॉलर की वित्तीय प्रतिबद्धता पूरी कर ली है। जिसकी आखिरी किस्त अगस्त 2025 में ट्रांसफर की गई। यह राशि पोर्ट के संचालन और विकास में निवेश की गई है। न कि बर्बाद हुई है। भारतीय कंपनी India Ports Global Limited (IPGL) साल 2018 से इस पोर्ट का संचालन कर रही है। ईरान भी चाहता है कि भारत इस परियोजना में निवेश जारी रखे और इसे भारत के लिए "गोल्डन गेट" बताया है। मोंगला पोर्ट पर बांग्लादेश ने चीन को क्यों चुना?वह जाने तो बांग्लादेश ने मोंगला पोर्ट (Mongla Port) के पास एक स्पेशल इकोनॉमिक जोन (SEZ) विकसित करने के लिए चीन की सरकारी कंपनी CCECC के साथ समझौता किया है । यह जमीन वास्तव में पहले भारत के लिए आरक्षित थी लेकिन यह परियोजना लगभग एक दशक तक शुरू नहीं हो पाई। भारत को क्यों मिला यह झटका?



वर्ष 2015 में भारत और बांग्लादेश के बीच इस SEZ के लिए समझौता हुआ था लेकिन भारत की ओर से नामित कंपनी हीरानंदानी ग्रुप कई वर्षों तक काम शुरू नहीं कर पाई। अंततःमुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने साल 2025 में परियोजना को सूची से हटा दिया था क्योंकि निर्धारित समय सीमा के भीतर काम शुरू नहीं किया गया था । इसके बाद बांग्लादेश ने चीन को यह प्रोजेक्ट दे दिया। जिसे भारत के लिए एक रणनीतिक झटका माना जा रहा है क्योंकि मोंगला पोर्ट भारत की सीमा और कोलकाता बंदरगाह के काफी करीब है।



दावे कितने सच्चे हैं? वह देखें तो चाबहार पोर्ट से भारत का नियंत्रण छोड़ना। यह दावा गलत है। भारत अभी भी चाबहार पोर्ट के संचालन में शामिल है और उसने 120 मिलियन डॉलर का निवेश कर दिया है हालांकि अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण परिचालन संबंधी चुनौतियाँ जरूर हैं। बांग्लादेश में चीन का समझौता के मद्देनजर यह दावा सही है लेकिन इसका कारण भारत की अपनी देरी है।परियोजना शुरू न कर पाने के कारण बांग्लादेश ने वह जमीन चीन को दे दी। जो पहले भारत के लिए आरक्षित थी ।(Photos Courtesy Social media and AI)

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