*बगदाद की राख से उठा इस्लाम:मंगोलों का वो क़िस्सा जब कातिल खुद बने मुसलमान*/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई
*बगदाद की राख से उठा इस्लाम:मंगोलों का वो क़िस्सा जब कातिल खुद बने मुसलमान*/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई
(मुंबई/रिपोर्ट स्पर्श देसाई) इतिहास के पन्नों में 1258 ईस्वी वह दर्दनाक साल है। जब मंगोलों ने बगदाद को न सिर्फ जीता बल्कि पूरी तरह मिटा दिया। हलाकु खान की अगुवाई में मंगोल सेना ने इस्लामी सभ्यता के केंद्र को तहस-नहस कर दिया था। आठ लाख से अधिक मुसलमान मारे गए थे। विश्व प्रसिद्ध पुस्तकालय ''बैतुल हिकमत''को जला दिया गया और चार लाख किताबें दजला यानि टिगरिस नदी में फेंक दी गईं थीं। कहा जाता है कि किताबों की स्याही से नदी काली हो गई और फिर शहीदों के खून से वह लाल हो गई। उस वक्त यह लगा जैसे इस्लाम हमेशा के लिए खत्म हो गया मगर इतिहास ने एक अनोखा करिश्मा दिखाया था।
महज 50 साल बाद जिन मंगोलों ने मस्जिदें जलाईं थी वही मस्जिदें बना रहे थे। जिन्होंने उल्मा (विद्वानों) को कत्ल किया था । वही इस्लामी विश्वविद्यालयों की नींव रख रहे थे। हलाकु खान का पोता गाजान खान ने इस्लाम को मंगोल सल्तनत का आधिकारिक धर्म घोषित किया। मंगोल सेनापति जो कभी मुसलमानों के खिलाफ लड़े थे। अब खुद मुसलमान बन गए और अपने पूर्व विरोधियों की धरोहर को संजोने में जुट गए। यह इतिहास की पहली ऐसी मिसाल थी। जब कोई विजेता राष्ट्र अपने द्वारा पराजित राष्ट्र का धर्म अपनाए।
बिना किसी जंग के,बिना किसी जबरदस्ती के,मंगोलों ने इस्लाम कबूल किया और यह इस्लामी सभ्यता की अद्भुत ताकत का प्रमाण है लेकिन अफसोस यह दिलचस्प और सबक सिखाने वाली कहानी समय के साथ किताबों के पन्नों में दफन होकर रह गई। आज के मुसलमान इस ऐतिहासिक सच्चाई से ज्यादा वाकिफ नहीं हैं कि कैसे उनके पूर्वजों की सभ्यता ने अपने दुश्मनों को भी अपनी रहमत से बदल दिया था।
यह कहानी हमें बताती है कि इस्लाम सिर्फ तलवार से नहीं बल्कि अपनी हिकमत,अखलाक और सच्चाई से फैला है। जिसका असर हलाकु खान के पोते पर भी हुआ और उसने''अल्लाहू अकबर''कहते हुए इस्लाम को अपना लिया था।(Photos Courtesy Social media and AI)
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