*वैज्ञानिकों ने बनाया गंदे पानी से 95% तक 'अदृश्य' माइक्रोप्लास्टिक हटाने वाला चमत्कारी पदार्थ*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई

*वैज्ञानिकों ने बनाया गंदे पानी से 95% तक 'अदृश्य' माइक्रोप्लास्टिक हटाने वाला चमत्कारी पदार्थ*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई 


(मुंबई/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई)पानी के लिए ''चुंबकीय जादू'' का असर। ऑस्ट्रेलिया की RMIT यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने पानी से सूक्ष्म प्लास्टिक कणों को हटाने की एक क्रांतिकारी तकनीक विकसित की है। इस शोध ने एक ऐसा चुंबकीय पाउडर तैयार किया है। जो महज 1 घंटे में 95% से अधिक माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक कणों को सोखकर अलग कर सकता है। ये कण इतने सूक्ष्म होते हैं कि नंगी आंखों से अदृश्य रहता हैं और पारंपरिक जल शोधन प्रणालियां इन्हें छानने में असमर्थ हैं। कैसे काम करता है यह चमत्कारी पदार्थ? वह देखें तो यह एक विशेष प्रकार का अवशोषक (Adsorbent) पाउडर है ‌।




 जिसे धातु-कार्बनिक ढांचा (Metal-Organic Framework-MOF) तकनीक का उपयोग करके बनाया गया है। इसकी सबसे खासियत यह है कि यह 30 नैनोमीटर जितने सूक्ष्म कणों को भी पकड़ सकता है। जो कि मानव बाल की चौड़ाई से 3000 गुना पतले होते हैं। पहले 15 मिनट में ही यह 80% प्रदूषकों को अपनी ओर खींच लेता है। जो व्यावसायिक जल संयंत्रों के लिए आदर्श है। चुंबकीय तकनीक से आसान पुनर्प्रयोग संभव है। इस शोध की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वैज्ञानिकों ने कनाडा की कंपनी One Eye Industries के साथ मिलकर एक प्रोटोटाइप प्रणाली विकसित की है। पाउडर को पानी में मिलाने के बाद जब यह प्रदूषकों को सोख लेता है तो चुंबक (Magnet) की सहायता से इसे आसानी से बाहर निकाला जा सकता है। इस प्रक्रिया के बाद अवशोषक पदार्थ को साफ करके बार-बार रीसाइकिल (Reuse) किया जा सकता है। जिससे पानी साफ करने की लागत बेहद कम हो जाती है। 


अब क्या यह पानी पीने लायक बनाता है? उस बात को देखते हैं। यह तकनीक माइक्रोप्लास्टिक,भारी धातुओं मर्करी, क्रोमियम,कॉपर,औद्योगिक रंग और इबुप्रोफेन जैसी दवाओं के अवशेषों को 95% से अधिक शुद्ध करने में सफल रही है। शोधकर्ताओं का दावा है कि यह ताजे और खारे समुद्री पानी दोनों में समान रूप से प्रभावी है। इसके अलावा इसने PFAS (फॉरएवर केमिकल्स) नामक खतरनाक रसायनों के बड़े अणुओं को हटाने में भी प्रारंभिक सफलता दिखाई है हालांकि इस पर अभी और शोध जारी है हालांकि यह ध्यान देने योग्य है कि यह शोध अभी प्रयोगशाला स्तर पर है। वैज्ञानिकों ने औद्योगिक लॉन्ड्री अपशिष्ट जल पर इसका परीक्षण किया। जहां यह 88% से अधिक पॉलिएस्टर माइक्रोफाइबर को हटाने में सफल रहा। पानी को पूरी तरह पीने लायक बनाने के लिए इसे मौजूदा जल शोधन प्रणालियों के साथ एकीकृत करने की आवश्यकता होगी। नैनोप्लास्टिक के खतरे देखें तो नैनोप्लास्टिक विशेष रूप से खतरनाक हैं क्योंकि ये कोशिका भित्ति को पार कर जीवित प्राणियों के शरीर में जमा हो सकते हैं। हाल के शोध में पाया गया है कि नैनोप्लास्टिक पानी में बैक्टीरिया को मजबूत बना सकते हैं। जिससे वे कीटाणुनाशकों के प्रति अधिक प्रतिरोधी हो जाते हैं और जल शोधन प्रणालियों में मजबूत बायोफिल्म बना सकते हैं। इसके अलावा माइक्रो प्लास्टिक पानी में मौजूद अन्य प्रदूषकों के लिए वाहक (carrier) का काम करते हैं। जिससे जटिल प्रदूषण की समस्या बढ़ जाती है। 


पर्यावरण और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव के मद्देनजर इस तकनीक की सबसे अच्छी बात यह है कि इसे कमरे के तापमान पर बनाया जा सकता है। जिससे उत्पादन लागत में 75% तक की कमी आई है। इसके अलावा शोधकर्ताओं ने उत्पादन क्षमता को 5 गुना बढ़ाने में सफलता प्राप्त की है। RMIT विश्वविद्यालय अब Fire and Test Australasia (एक स्वदेशी-स्वामित्व वाली कंपनी) और Star Water Group जैसी कंपनियों के साथ साझेदारी कर रहा है ताकि इस तकनीक को वास्तविक दुनिया में लागू किया जा सके। यह शोध न केवल माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण से निपटने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि है बल्कि यह एक ऐसा समाधान प्रस्तुत करता है। जो किफायती,पुन: प्रयोज्य और पर्यावरण के अनुकूल है हालांकि अभी भी PFAS को पूरी तरह हटाने पर शोध जारी है। यह तकनीक भविष्य में स्वच्छ पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।(Photos Courtesy Social media and AI)

~ब्यूरो रिपोर्ट स्पर्श देसाई √•Metro City Post•Digital World•
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