*पबुसा-2 ने खींची मूंगफली के आकार वाले दुर्लभ एस्टेरॉयड 'टोरिफुने' की पहली तस्वीर*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
*पबुसा-2 ने खींची मूंगफली के आकार वाले दुर्लभ एस्टेरॉयड 'टोरिफुने' की पहली तस्वीर*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
(मुंबई/रिपोर्ट स्पर्श देसाई)जापान के अंतरिक्ष मिशन हायाबुसा-2 (Hayabusa-2) ने अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है। इस अंतरिक्ष यान ने पृथ्वी से लगभग 10 करोड़ किलोमीटर दूर एक फ्लाईबाई (निकट से गुजरने) के दौरान मूंगफली के आकार वाले एक अत्यंत दुर्लभ एस्टेरॉयड क्षुद्रग्रह 'टोरिफुने' Torifune की पहली क्लोज़-अप तस्वीर सफलतापूर्वक खींची है। जापानी अंतरिक्ष एजेंसी JAXA द्वारा जारी यह तस्वीर ब्रह्मांड के कई रहस्यों को उजागर करती है। लगभग 450 मीटर चौड़े इस एस्टेरॉयड को लेकर वैज्ञानिकों में भारी उत्सुकता है। वैज्ञानिकों के शुरुआती विश्लेषण के अनुसार टोरिफुने एक"कॉन्टेक्ट बाइनरी''(Contact Binary) एस्टेरॉयड है। इसका सीधा मतलब यह है कि इसका निर्माण अरबों साल पहले दो अलग-अलग विशाल चट्टानी पिंडों के धीरे-धीरे आपस में मिलकर एक होने से हुआ है। इस प्रकार के पिंडों का अध्ययन सौर मंडल के शुरुआती इतिहास और ग्रहों के निर्माण की प्रक्रिया को समझने में बेहद मददगार साबित होता है। हायाबुसा-2 का यह सफल फ्लाईबाई मिशन अंतरिक्ष अन्वेषण की दिशा में एक मील का पत्थर है। टोरिफुने एस्टेरॉयड फ्लाईबाई जापानी स्पेसक्राफ्ट ने रचा इतिहास है । प्लेनेटरी डिफेंस के खुले हैं नए रास्ते। जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी (JAXA) के प्रसिद्ध अंतरिक्ष यान हायाबुसा-2 (Hayabusa2) ने 5 जुलाई 2026 को पृथ्वी से करीब 10 करोड़ किलोमीटर दूर अपोलो-क्लास एस्टेरॉयड"98943 टोरिफुने''(2001 CC21) के बेहद करीब से गुजरकर एक नया इतिहास रच दिया है। इस मिशन से जुड़ी कई नई रोमांचक और सटीक जानकारियां देखें तो सांस थाम देने वाली नजदीकी और उसकी गति है। उसकी दूरी और रफ्तार जाने तो वैज्ञानिकों की चेतावनियों के बावजूद इंजीनियरिंग टीम ने इस स्पेसक्राफ्ट को टोरिफुने की सतह से मात्र 800 मीटर (0.5 मील) की दूरी से गुजरा है। इस दौरान इसकी सापेक्ष गति 5 किलोमीटर प्रति सेकंड (18,000 किमी/घंटा) से अधिक थी। स्वायत्त नेविगेशन के मद्देनजर टोरिफुने के छोटे आकार और धुंधलेपन के कारण ऐन वक्त तक सटीक रास्ता तय करना मुश्किल था। इस फ्लाईबाई को सफल बनाने के लिए हायाबुसा-2 ने खुद के ऑप्टिकल ऑटोनॉमस गाइडेंस सिस्टम का उपयोग किया। इस बात पर वैज्ञानिक विश्लेषण और बनावट देखें तो इसका अनोखा आकार है। तस्वीरों से साफ हुआ कि 450 मीटर चौड़ा यह एस्टेरॉयड दो हिस्सों (लोब्स) से बना है जो बेहद धीमी टक्कर के बाद आपस में चिपक गए। ब्रह्मांड में इसे ''कॉन्टेक्ट बाइनरी'' या स्नोमैन/पीनट शेप कहा जाता है। सतह की बनावट पर टोरिफुने की सतह पर अलग-अलग रंगों के बड़े-बड़े पत्थर (boulders) बिखरे दिखाई दिए हैं। जिससे संकेत मिलता है कि इसके दोनों हिस्सों की रासायनिक संरचना भिन्न हो सकती है।"प्लेनेटरी डिफेंस"यानि धरती की सुरक्षा के लिए मील का पत्थर साबित होता है। JAXA के वैज्ञानिकों के अनुसार यह मिशन सिर्फ फोटो खींचने के लिए नहीं था। इतनी तेज गति और बेहद नजदीकी से गुजरे इस सफल प्रयोग ने साबित कर दिया है कि JAXA के पास भविष्य में किसी खतरनाक एस्टेरॉयड की दिशा बदलने (Kinetic Impactor Method) या उसकी त्वरित टोह (Fast Reconnaissance) लेने की सटीक तकनीक मौजूद है। जो नासा के DART मिशन जैसी तकनीकों को मजबूती देती है। अब इस मिशन का अगला पड़ाव क्या है? वह जाने तो यह हायाबुसा-2 का विस्तारित मिशन (Extended Mission) है। जो 2020 में एस्टेरॉयड ''रयुगु'' से सैंपल लाकर इतिहास रच चुका है। अब टोरिफुने से आगे बढ़ते हुए यह यान है। साल 2027 और 2028 में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का उपयोग (Earth Swingbys) कर अपनी कक्षा बदलेगा। इसका अंतिम लक्ष्य साल 2031 में मात्र 11 मीटर चौड़े और बेहद तेज घूमने वाले छोटे एस्टेरॉयड ''1998 KY26'' पर पहुंचना और वहां लैंडिंग की कोशिश करना है। जो हायाबुसा-2 ने खींची मूंगफली के आकार वाले दुर्लभ एस्टेरॉयड 'टोरिफुने' की पहली क्लोज़-अप तस्वीर ली है उसके मुताबिक जापान के अंतरिक्ष मिशन हायाबुसा-2 (Hayabusa-2) ने अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है। इस अंतरिक्ष यान ने पृथ्वी से लगभग 10 करोड़ किलोमीटर दूर एक फ्लाईबाई (निकट से गुजरने) के दौरान मूंगफली के आकार वाले एक अत्यंत दुर्लभ एस्टेरॉयड ''टोरिफुने''Torifuneकी पहली क्लोज़-अप तस्वीर सफलतापूर्वक खींची है। जापानी अंतरिक्ष एजेंसी JAXA द्वारा जारी यह तस्वीर ब्रह्मांड के कई रहस्यों को उजागर करती है। लगभग 450 मीटर चौड़े इस एस्टेरॉयड को लेकर वैज्ञानिकों में भारी उत्सुकता है। वैज्ञानिकों के शुरुआती विश्लेषण के अनुसार टोरिफुने एक"कॉन्टेक्ट बाइनरी'' (Contact Binary) एस्टेरॉयड है। इसका सीधा मतलब यह है कि इसका निर्माण अरबों साल पहले दो अलग-अलग विशाल चट्टानी पिंडों के धीरे-धीरे आपस में मिलकर एक होने से हुआ है। इस प्रकार के पिंडों का अध्ययन सौर मंडल के शुरुआती इतिहास और ग्रहों के निर्माण की प्रक्रिया को समझने में बेहद मददगार साबित होता है। हायाबुसा-2 का यह सफल फ्लाईबाई मिशन अंतरिक्ष अन्वेषण की दिशा में एक मील का पत्थर है। जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी (JAXA) के प्रसिद्ध अंतरिक्ष यान हायाबुसा-2(Hayabusa2) ने 5 जुलाई 2026 को पृथ्वी से करीब 10 करोड़ किलोमीटर दूर अपोलो-क्लास एस्टेरॉयड ''98943 टोरिफुने'' (2001 CC21) के बेहद करीब से गुजरकर एक नया इतिहास रच दिया है। इस मिशन से जुड़ी कई नई,रोमांचक और सटीक जानकारियां देखें तो वैज्ञानिकों की चेतावनियों के बावजूद इंजीनियरिंग टीम ने इस स्पेसक्राफ्ट को टोरिफुने की सतह से मात्र 800 मीटर (0.5 मील) की दूरी से गुजरा था। इस दौरान इसकी सापेक्ष गति 5 किलोमीटर प्रति सेकंड (18,000 किमी/घंटा) से अधिक थी। टोरिफुने के छोटे आकार और धुंधलेपन के कारण ऐन वक्त तक सटीक रास्ता तय करना मुश्किल था। इस फ्लाईबाई को सफल बनाने के लिए हायाबुसा-2 ने खुद के ऑप्टिकल ऑटोनॉमस गाइडेंस सिस्टम का उपयोग किया। ली गई तस्वीरों से यह साफ हुआ कि 450 मीटर चौड़ा यह एस्टेरॉयड दो हिस्सों (लोब्स) से बना है। जो बेहद धीमी टक्कर के बाद आपस में चिपक गए। ब्रह्मांड में इसे"कॉन्टेक्ट बाइनरी" या स्नोमैन/पीनट शेप कहा जाता है। टोरिफुने की सतह पर अलग-अलग रंगों के बड़े-बड़े पत्थर (boulders) बिखरे दिखाई दिए हैं। जिससे संकेत मिलता है कि इसके दोनों हिस्सों की रासायनिक संरचना भिन्न हो सकती है। JAXA के वैज्ञानिकों के अनुसार यह मिशन सिर्फ फोटो खींचने के लिए नहीं था। इतनी तेज गति और बेहद नजदीकी से गुजरे इस सफल प्रयोग ने साबित कर दिया है कि JAXA के पास भविष्य में किसी खतरनाक एस्टेरॉयड की दिशा बदलने (Kinetic Impactor Method) या उसकी त्वरित टोह (Fast Reconnaissance) लेने की सटीक तकनीक मौजूद है, जो नासा के DART मिशन जैसी तकनीकों को मजबूती देती है। यह हायाबुसा-2 का विस्तारित मिशन (Extended Mission) है। जो 2020 में एस्टेरॉयड 'रयुगु' से सैंपल लाकर इतिहास रच चुका है। साल 2027 और 2028 में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का उपयोग (Earth Swingbys) कर अपनी कक्षा बदलेगा। इसका अंतिम लक्ष्य साल 2031 में मात्र 11 मीटर चौड़े और बेहद तेज घूमने वाले छोटे एस्टेरॉयड ''1998 KY26''पर पहुंचना और वहां लैंडिंग की कोशिश करना है। नासा के OSIRIS-REx मिशन को एस्टेरॉयड बेन्नू (Bennu) से क्या मिला?नासा का OSIRIS-REx मिशन सितंबर 2023 में एस्टेरॉयड बेन्नू से लगभग121.6 ग्राम ऐतिहासिक सैंपल लेकर पृथ्वी पर लौटा था। वैज्ञानिकों के शुरुआती विश्लेषण में जो निष्कर्ष निकले हैं। वे बेहद हैरान करने वाले हैं। पानी और उच्च कार्बन सामग्री के मद्देनजर बेन्नू से आए नमूनों में प्रचुर मात्रा में पानी (हाइड्रेटेड क्ले मिनरल्स के रूप में) और कार्बन पाया गया है। कार्बन की यह मात्रा किसी भी अन्य एस्टेरॉयड सैंपल की तुलना में सबसे अधिक है। फॉस्फोरस और मैग्नीशियम के हिसाब से वैज्ञानिकों को नमूनों में मैग्नीशियम-फॉस्फेट की एक सफेद परत मिली। जो पृथ्वी पर केवल समुद्री जीवन और गीले भूभागों में देखी जाती है। इससे संकेत मिलता है कि बेन्नू किसी प्राचीन,पानी से भरपूर विशाल ग्रह या महासागरीय दुनिया का हिस्सा रहा होगा। जीवन की शुरुआत के सुराग भी इसमें मौजूद कार्बनिक यौगिक (Organic Compounds) इस बात की पुष्टि करते हैं कि पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के लिए जरूरी कच्चे माल की डिलीवरी अंतरिक्षीय चट्टानों द्वारा ही की गई थी। काइनेटिक इम्पैक्टर तकनीक (Kinetic Impactor Technique) कैसे काम करती है? वह देखें तो यह ब्रह्मांड में पृथ्वी की ओर आ रहे किसी खतरनाक एस्टेरॉयड को रोकने और उसकी दिशा बदलने की सबसे सटीक और व्यावहारिक तकनीक है। यह पूरी प्रक्रिया निम्नलिखित चरणों में काम करती है।
खोज और गणना के मद्देनजर सबसे पहले पृथ्वी के टेलिस्कोप और प्लेनेटरी डिफेंस सिस्टम किसी संभावित खतरनाक एस्टेरॉयड की खोज करते हैं और उसके पृथ्वी से टकराने के सटीक समय व रास्ते (Trajectory) की गणना करते हैं।''गतिज''हमला (Kinetic Impact) के हिसाब से एक भारी-भरकम अंतरिक्ष यान (Impactor) को अंतरिक्ष में भेजा जाता है। यह यान किसी हथियार या बारूद का उपयोग नहीं करता बल्कि अपनी अत्यधिक तेज गति (High Velocity) का इस्तेमाल करता है। टक्कर और मोमेंटम ट्रांसफर के मद्देनजर अंतरिक्ष यान सीधे जाकर एस्टेरॉयड की सतह से टकराता है। इस टक्कर से यान अपनी गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) एस्टेरॉयड को ट्रांसफर कर देता है। कक्षा में बदलाव पर ध्यान दें तो टक्कर के प्रभाव से एस्टेरॉयड की गति में बहुत मामूली (कुछ मिलीमीटर प्रति सेकंड) का बदलाव आता है। अंतरिक्ष की विशाल दूरियों को देखते हुए यह छोटा सा बदलाव समय के साथ एस्टेरॉयड के रास्ते को इतना बदल देता है कि वह पृथ्वी से लाखों किलोमीटर दूर से सुरक्षित गुजर जाता है। नासा ने अपने DART (Double Asteroid Redirection Test) मिशन के जरिए सितंबर 2022 में एस्टेरॉयड''डिमॉर्फोस''से एक स्पेसक्राफ्ट टकराकर इस तकनीक का दुनिया का पहला सफल परीक्षण किया था। JAXA का हायाबुसा-2 मिशन भी भविष्य के लिए इसी तरह की तकनीकों की सटीकता को जांच रहा है।(Photos Courtesy Social media and AI)
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