*क्या 17,100 साल में सच में खत्म हो जाएगी इंसानियत? 'डूम्सडे आर्ग्युमेंट' की चौंकाने वाली भविष्यवाणी*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई

*क्या 17,100 साल में सच में खत्म हो जाएगी इंसानियत? 'डूम्सडे आर्ग्युमेंट' की चौंकाने वाली भविष्यवाणी*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई 


(मुंबई/रिपोर्ट स्पर्श देसाई) क्या 17,100 साल में विलुप्त हो सकते हैं इंसान?''डूम्सडे आर्युमेंट''नामक स्टैटिस्टिकल मॉडल के मुताबिक 95% संभावना है कि इंसान अधिकतम 17,100 साल और ज़िंदा रहेंगे। खगोलभौतिकीविद् ब्रैंडन कार्टर के साल 1983 के काम पर आधारित यह मॉडल मानता है कि कभी भी जीवित रहे इंसान रैंडम स्थिति में होते हैं और इसमें कुल 2.34 ट्रिलियन जन्मों का अनुमान लगाया गया हालांकि कई वैज्ञानिक इस तर्क को नहीं मानते। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसमें जलवायु परिवर्तन जैसे असली खतरों को नज़रअंदाज़ किया गया है। परिचय के मद्देनजर गणित की नजर में इंसानी तबाही की तारीख जाने तो सबसे पहले क्या गणित इंसानियत के अंत की तारीख बता सकता है?एक चौंकाने वाले स्टैटिस्टिकल मॉडल के अनुसार हाँ! "डूम्सडे आर्ग्युमेंट"(प्रलय तर्क) नामक यह सिद्धांत दावा करता है कि 95% संभावना है कि इंसान अधिकतम 17,100 साल और जीवित रहेंगे। साल 1983 में खगोलभौतिकीविद् ब्रैंडन कार्टर द्वारा प्रस्तुत यह सिद्धांत जिसे"कार्टर प्रलय"(Carter catastrophe) भी कहा जाता है। आज भी वैज्ञानिक हलकों में बहस का विषय बना हुआ है।

"डूम्सडे आर्ग्युमेंट"क्या है?और उसका गणितीय समीकरण जाने तो यह सिद्धांत एक सरल लेकिन गहरे स्टैटिस्टिकल विचार पर आधारित है। कोपरनिकस सिद्धांत (Copernican Principle) के मद्देनजर हम ब्रह्मांड में कोई विशेष स्थान नहीं रखते और न ही मानव इतिहास के समयरेखा में। आप स्वयं को मानव जाति के पूरे इतिहास में यादृच्छिक रूप से जन्मा एक इंसान मान सकते हैं। गणितीय आधार के हिसाब से अब तक लगभग 117 अरब (117 billion) लोग जन्म ले चुके हैं। यदि आपकी स्थिति यादृच्छिक है तो 95% संभावना है कि आप पहले 5% इंसानों में से नहीं हैं। गणितीय रूप में देखें तो x > 0.05N (जहाँ x = 117 अरब,N = कुल कभी जन्म लेने वाले इंसान)। इसका मतलब है कि N < 20 × 117 अरब = 2.34 ट्रिलियन।  अब यह जाने कि 17,100 साल कैसे निकला? वह जाने तो यदि कुल 2.34 ट्रिलियन इंसान कभी जन्म लेंगे और वर्तमान जन्म दर (~130 मिलियन प्रति वर्ष) जारी रही तो यह आंकड़ा लगभग 17,100 वर्षों में पहुंचेगा। एक सरल उदाहरण के तौर पर पिंग-पोंग बॉल का खेल देखें तो इस तर्क को समझने के लिए एक क्लासिक उदाहरण है। जिसके तहत बॉक्स A में 10 गेंदें (नंबर 1 से 10) तक है और बॉक्स B में 1,00,000 गेंदें (नंबर 1 से 1,00,000) है। आपको बिना देखे एक बॉक्स से नंबर 4 वाली गेंद मिलती है तो आप किस बॉक्स से निकली गेंद मानेंगे? इसका स्वाभाविक उत्तर देखें तो बॉक्स A है क्योंकि वहाँ से गेंद नंबर 4 निकलने की संभावना 1/10 है। जबकि बॉक्स B से 1/1,00,000। 


"डूम्सडे आर्ग्युमेंट"  यही कहता है कि यदि 117 अरब लोग पहले ही जन्म ले चुके हैं तो यह मानना अधिक संभावित है कि हम "छोटे बॉक्स"(कुल मानव जनसंख्या सीमित) में हैं। न कि"बड़े बॉक्स"(खरबों- खरबों लोगों वाले भविष्य) में। दौरान वैज्ञानिकों की आलोचनाएँ देखें तो क्यों नहीं मानते यह तर्क?कई वैज्ञानिक इस मॉडल को अत्यधिक सरलीकृत और भ्रामक मानते हैं। असली खतरों को नज़रअंदाज़ किया गया है। यह मॉडल केवल जन्म दर पर आधारित है। यह जलवायु परिवर्तन,परमाणु युद्ध,महामारी या कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) जैसे वास्तविक खतरों को पूरी तरह अनदेखा करता है। तकनीकी विकास को नज़रअंदाज़ पर एक नजर डालें तो यदि इंसान अन्य ग्रहों पर उपनिवेश स्थापित कर लेता है। नई तकनीकें विकसित कर लेता है या लाखों वर्षों तक जीवित रहता है तो यह गणना पूरी तरह विफल हो जाती है। मूल अनुमान में भिन्नता के मद्देनजर विकिपीडिया के अनुसार यदि 60 अरब (लेस्ली का आंकड़ा) जन्मों को आधार माना जाए तो 95% संभावना में कुल जनसंख्या 1.2 ट्रिलियन से कम होगी और विलुप्ति 9,120 साल में! यानी अलग-अलग अनुमान अलग-अलग परिणाम देते हैं हालांकि यह"भविष्य वाणी"नहीं बल्कि "संभावना" है। यह सिद्धांत यह नहीं कहता कि इंसान ठीक 17,100 साल में खत्म हो जाएंगे।

 यह सिर्फ एक स्टैटिस्टिकल संभावना है। असली खतरे जाने तो जलवायु परिवर्तन से लेकर AI तक डूम्सडे आर्ग्युमेंट की सबसे बड़ी कमी यह है कि यह वास्तविक खतरों को नज़रअंदाज़ करता है। खतरा संभावित प्रभाव के हिसाब से जलवायु परिवर्तन बढ़ता तापमान,समुद्र स्तर में वृद्धि,खाद्य संकट,परमाणु युद्ध सैकड़ों शहरों का विनाश,परमाणु सर्दी महामारी कोविड-19 से भी घातक वायरस का उभरना। कृत्रिम बुद्धिमत्ता अनियंत्रित AI का मानवता के लिए खतरा। अंतरिक्ष खतरे क्षुद्रग्रह प्रभाव और सौर ज्वालाएँ के अनुसंधान पर वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन जैसे ठोस खतरे इस स्टैटिस्टिकल मॉडल से कहीं अधिक गंभीर हैं। अन्य संबंधित सिद्धांत के मद्देनजर लिंडी इफ़ेक्ट (Lindy Effect) की सोच देखें तो किसी चीज़ का भविष्य का जीवनकाल उसके वर्तमान आयु के समानुपाती होता है। गॉट के सूत्र (Gott's Formula) के अनुसार खगोलशास्त्री जे.रिचर्ड गॉट ने स्वतंत्र रूप से इसी तरह का तर्क प्रस्तुत किया है। फोस्टर के जनसंख्या विस्फोट मॉडल के मद्देनजर हेंज वॉन फोस्टर ने इससे पहले इसी तरह के विचार प्रस्तुत किए हैं।



इसी दौरान क्या हमें डरना चाहिए? इस पर गौर करें तो "डूम्सडे आर्ग्युमेंट"एक दिलचस्प स्टैटिस्टिकल पहेली है लेकिन यह कोई वैज्ञानिक भविष्यवाणी नहीं है। यह हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम इतिहास में कहाँ खड़े हैं लेकिन यह जलवायु परिवर्तन,परमाणु युद्ध या AI जैसे असली खतरों का कोई जवाब नहीं देता। असली सवाल यह नहीं है कि "हम कब खत्म होंगे?" बल्कि यह है कि हम अपने अस्तित्व को लम्बा करने के लिए आज क्या कर रहे है?हमारा भविष्य गणितीय संभावनाओं से नहीं बल्कि हमारे आज के फैसलों से तय होगा।( Photos Courtesy Social media & AI)

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