*सहारा की रहस्यमयी ''तीसरी इस्लामी'' कौम:जो न सुन्नी हैं,न शिया और जिनकी जिंदगी दुनिया से छुपी है*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
*सहारा की रहस्यमयी ''तीसरी इस्लामी'' कौम:जो न सुन्नी हैं,न शिया और जिनकी जिंदगी दुनिया से छुपी है*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
(मुंबई/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई)सहरा के रेगिस्तान में रहने वाली ये औरते ना तो शिया हैं और ना ही सुन्नी हैं तो फिर ये मुसल्मान कैसे हुएं ?इतना परदा क्यों कर रही हैं?असल में ये एक ऐसी कौम है जो "सहारा डेजर्ट"के बीच में रहती है और इनकी जिन्दगी दुनिया से बिल्कुल अलग थलग है। ये हैं इबादी मुस्लिम ये लोग दुनिया के सबसे पुराने और सबसे कम मालूम फिरके से तालुक रखते हैं ये लोग ज्यादा तर सहारा रेगिस्तान और ओमान में रहते हैं और इन्हें "बर्बर"भी कहा जाता है और इनका मजहब है इबादी इसलाम।
जो दुनिया का सबसे पुराना और कम मालूम फिरका है और ये इबादी लोग एक बहुती सिक्रेटिव जिन्दगी जीते हैं। इस कौम के मर्दों का एक खास लिबास होता है। लंबे चोली जैसी कमीजें होती हैं और सर पर हमेशा इनके टोपी होती है और वहाँ की और्तें इतना परदा करती हैं कि आपकी सोच गुम हो जाएगी। वेसे तो वहाँ की औरर्तें ज्यादा घर से बाहर नहीं निकलती। उनको मना है लेकिन अगर कभी किसी काम से मजबूरी के तौर पर निकलना पड़े तो निकले । तब वह ऐसा परदा करती हैं कि उनकी आँखें भी मुश्किल से दिखाई देती हैं और सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इनके घरों के डिजाइन भी दुनिया के घरों के डिजाइन से बिलकुल अलग अलग होते हैं।
दस फूट की ऊंची दिवारे होती हैं और घर की खिड़कियां और दर्वाजे इस तरहां से बनाये जाते हैं कि पड़ोसी के दर्वाजे या खिड़की एक दूसरे के साथ अटैच नहीं होते या उनका मुँह एक दूसरे की तरफ ना हो। इसमें भी वो परदा करते है। यह कौम आगे बढ़ रही हैं। जिंदा है और इन इबादी मुस्लिमानों को दुनिया का सबसे पुराना फिरका आज तक तसब्वर किया जाता है। अल्जीरिया के सहारा रेगिस्तान की गहराई में यह एक ऐसी कौम बसती है। जिसके बारे में दुनिया बहुत कम जानती है। ये न तो सुन्नी हैं और न ही शियां है बल्कि इस्लाम की सबसे पुरानी और सबसे कम समझी गई शाखा ''इबादी''(Ibadism) से ताल्लुक रखती हैं। इनकी जिंदगी,रहन-सहन,परदा प्रथा और घरों की बनावट भी दुनिया से बिल्कुल अलग है। यह है सहारा के इबादी मुसलमानों की कहानी।
कौन हैं ये इबादी मुसलमान? वह जाने तो इबादी इस्लाम इस्लाम की तीसरी सबसे बड़ी शाखा मानी जाती है। इसकी स्थापना करीब 1400 साल पहले सन् 680 के आसपास इराक के बसरा शहर में ''अब्दुल्लाह बिन इबाद'' ने की थी। यह ख्वारिज (Khawarij) आंदोलन की एक मध्यम शाखा के रूप में उभरा हालांकि आज के "इबादी" खुद को "ख्वारिज" माने जाने का सख्त विरोध करते हैं और खुद को ''अहल अल-हक्क वल-इस्तिकामा'' (सत्य और सीधेपन के लोग) कहते हैं। सुन्नी और शियां की तरह वे भी खुद को इस्लाम की सबसे प्राचीन और प्रामाणिक शाखा मानते हैं। ये समुदाय मुख्य रूप से ओमान में बहुसंख्यक है लेकिन अल्जीरिया के मज़ाब घाटी (Mzab Valley),लीबिया के नफूसा पहाड़ियों,ट्यूनीशिया के द्ज़ेरबा और तंजानिया के ज़ांज़ीबार में भी बिखरे हुए हैं। दुनिया में इनकी कुल संख्या लगभग 2.7 से 7 मिलियन के बीच आंकी गई है। इस्लाम की सबसे पुरानी और कट्टर शाखा है इबादी की। इबादी इस्लाम अपनी सख्त,समतावादी (egalitarian) और अलगाववादी (separatist) सोच के लिए जाना जाता है। इस्लाम की दो बड़ी शाखाओं से अलग,उनकी अपनी शरिया कानून की व्याख्या है। वे बड़े पाप (गुनाह-ए-कबीरा) करने वाले को चाहे वह खलीफा ही क्यों न हो ''काफिर'' ्घोषित कर देते थे हालांकि आज के इबादी इसे नरम रूप में मानते हैं। उनका आचार संहिता बेहद कठोर है और धार्मिक शुद्धता के मानक बहुत ऊंचे हैं। इतनी सख्ती के कारण ही वे अपने संप्रदाय से बाहर शादी नहीं करते। यह कौम के लोग"सहारा"में कैसे पहुंचे? वह जाने तो 9वीं शताब्दी में इबादी नेता''अब्द अर-रहमान इब्न रुस्तम'' के अनुयायियों को अल्जीरिया के तिआरेट (Tiaret) से खदेड़ दिया गया था। बचाव के लिए उन्होंने रेगिस्तान का सबसे दुर्गम इलाका चुना और 1010 ईस्वी के आसपास अल्जीरिया के मज़ाब वादी (Wadi M'zab) में बस गए।
यहीं से इनकी अलग- थलग और रहस्यमयी जिंदगी की शुरुआत हुई। गहरे परदे और अनोखे घर के मद्देनजर इस कौम की महिलाएं सख्त परदा करती हैं। वे पूरी तरह घूंघट में रहती हैं। इतना कि उनकी आंखें भी मुश्किल से दिखती हैं। वे अपने समुदाय से बाहर नहीं निकलतीं और अगर मजबूरी में निकलें तो घने घूंघट के पीछे पूरी तरह छिप जाती हैं। इनके घरों की दीवारें 10 फीट ऊंची होती हैं और दरवाजे-खिड़कियां इस तरह बनाई जाती हैं कि पड़ोसियों के दरवाजे या खिड़कियां आमने-सामने न हों। यह भी परदा का एक रूप हैं। जिसमें वे अपनी ''निजता'' बनाए रखते हैं।''गुप्तता''(कितमान) का सिद्धांत जाने तो इबादी समुदाय का मूल सिद्धांत ''कितमान'' (Kitman) यानी ''गुप्तता'' है। उनका मानना है कि सच्चे मुसलमानों को अपनी गतिविधियां गुप्त रखनी चाहिए। यही कारण है कि ये सबसे कम जाने जाने वाले इस्लामी संप्रदायों में से एक हैं। मज़ाब घाटी में किसी गैर-इबादी को उनकी मस्जिद में प्रवेश की इजाजत नहीं। उनके पास न्यायिक परिषदें (हल्का - Halqa) हैं। जो उनके समुदाय के मामलों को चलाती हैं।
वे ''ख्वारिज'' कहलाए जाने से सख्त नाराज हैं। क्या इबादी ''खतरनाक'' हैं? वह जाने तो इतिहास में इबादी कभी''खतरनाक''नहीं रहे बल्कि वे सख्त अलगाववादी रहे हैं। असली खतरा तो उन्हें दूसरे संप्रदायों से झेलना पड़ा । उन्हें सदियों तक सताया और पीछे धकेला गया था। आधुनिक अल्जीरिया में भी मज़ाब इबादी अपनी बर्बर (Amazigh) जड़ों और इबादी विचारधारा के कारण भेदभाव का शिकार हैं। अल्जीरिया में एक प्रमुख इबादी कार्यकर्ता की मौत भी हुई। आज कहां हैं इबादी? वो जाने तो ये कौम आज भी जिंदा है और आगे बढ़ रही है। ओमान इकलौता मुस्लिम देश है। जहां इबादी इस्लाम सबसे बड़ा संप्रदाय है। सहारा के मज़ाब घाटी में इनकी आबादी करीब 2 लाख है। दुनिया भर में सबसे पुराने इस्लामी संप्रदाय के रूप में ये अपनी अनोखी पहचान बनाए हुए हैं। विकिपीडिया के अनुसार इबादी इस्लाम इस्लाम की तीसरी सबसे बड़ी शाखा है। जो सुन्नी और शियां से अलग है। इसे ''इबादी आंदोलन''या''इबादिय्या'' (अरबी: الاباضية) भी कहा जाता है। आइए विकिपीडिया के आधार पर इसके बारे में विस्तार से जानते हैं। इनकी उत्पत्ति और इतिहास के मद्देनजर यह आंदोलन हज़रत मुहम्मद की मृत्यु के लगभग 60 साल बाद (692 ईस्वी के आसपास) इराक के बसरा शहर में उभरा था। संबंध को लेकर इसकी जड़ें ''ख्वारिज'' (Kharijites) आंदोलन से जुड़ी हैं। जो चौथे खलीफा हज़रत अली के विरोध से निकला था। अस्वीकृति के मद्देनजर हालाँकि आधुनिक इबादी खुद को"ख्वारिज"माने जाने का सख्त विरोध करते हैं। वे खुद को 'मुहक्किमा''Muhakkima समूह का अनुयायी बताते हैं और अपने लिए''अहल अल-हक्क वल-इस्तिकामा''(People of Truth and Integrity सत्य और सीधेपन के लोग नाम पसंद करते हैं। जनसंख्या और भौगोलिक वितरण के हिसाब से कुल संख्या को जाने तो दुनिया भर में इनकी संख्या लगभग 2.72 मिलियन से 7 मिलियन के बीच है। जो दुनिया के कुल मुसलमानों का 1% से भी कम है। इनका मुख्य क्षेत्र जाने तो यह ओमान में बहुसंख्यक संप्रदाय है। जबकि अन्य क्षेत्र इसके अलावा ये समुदाय अल्जीरिया (मज़ाब),ट्यूनीशिया (जेरबा),लीबिया (नफूसा) और तंजानिया (ज़ांज़ीबार)में भी रहते हैं। इनकी विशिष्ट मान्यताएँ और प्रथाएँ देखें तो तीसरी शाखा के हिसाब से इसे अक्सर सुन्नी और शियांं के बाद इस्लाम की तीसरी शाखा माना जाता है। खलीफा का चुनाव के मद्देनजर खिलाफत के मामले में इबादी और सुन्नी यह मानते हैं कि अबू बकर पैगंबर के वैध उत्तराधिकारी थे।
जबकि शिया इसे हज़रत अली का अधिकार मानते हैं।''कुनूत''(Qunut) का खंडन जाने तो इबादी नमाज़ के दौरान खड़े होकर की जाने वाली विशेष प्रार्थना ''कुनूत''(Qunut) को अस्वीकार करते हैं। जो सुन्नियों में आम है। अन्य मुसलमानों को ''काफिर''न कहना। अधिकांश ख्वारिज समूहों के विपरीत इबादी अन्य मुसलमानों को ''काफिर'' (अविश्वासी) नहीं मानते। उनके ऐतिहासिक उत्पीड़न को लेकर विकिपीडिया बताता है कि इस्लामी इतिहास मे"उमय्यद"और"अल्मोराविद"शासनकाल में"इबादी समुदाय"को धार्मिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा और यह सिलसिला आधुनिक युग में भी जारी है। यह जानकारी विकिपीडिया पर उपलब्ध सार्वजनिक ज्ञान पर आधारित है। यह सवाल दो बहुत अलग-अलग समुदायों की तुलना ''खतरनाक''होने के एक गैर-मानक पैमाने पर करता है। सीधा जवाब यह है कि''इबादी''और ''मोंगोलियन मुस्लिम''की तुलना''खतरे''के आधार पर न तो संभव है और न ही उचित क्योंकि ये दोनों ही अपने-अपने संदर्भ में शांतिपूर्ण समुदाय हैं।"इबादी मुस्लिम"(Ibadi Muslims) के मद्देनजर यह इस्लाम की सबसे पुरानी जीवित शाखाओं में से एक है। जो मुख्य रूप से ओमान में बहुमत में है। वे खुद को ''ख्वारिज'' न मानकर ''मुहक्किमा'' कहते हैं।''खतरे'' का आकलन के हिसाब से"इबादी"अलगाववादी (separatist) रहे हैं। हिंसक नहीं। उनका इतिहास उत्पीड़न झेलने का रहा है। दूसरों को सताने का नहीं। वे सलाफी आतंकवाद की निंदा करते हैं और अपने संप्रदाय से बाहर शादी नहीं करते। इन्हें ''खतरनाक'' कहना ऐतिहासिक और तथ्यात्मक रूप से सटीक नहीं है।
दौरान मोंगोलियन मुस्लिम (Mongolian Muslims) के बारे में जाने तो यह कोई एक समूह नहीं बल्कि कई समुदायों का समूह है। इसमें मंगोलिया के अल्पसंख्यक मुसलमान (कुल जनसंख्या का 3.2%) और चीन में रहने वाले मंगोलियाई मूल के मुस्लिम(जैसे डोंगज़ियांग) शामिल हैं। मान्यता के हिसाब से ये ज़्यादातर सुन्नी इस्लाम का पालन करते हैं।''खतरे'' का आकलन करे तो ये समुदाय चीन की आधिकारिक मान्यता प्राप्त जातियों में शामिल हैं। इनका कोई आतंकवादी या हिंसक इतिहास नहीं है। इन्हें ''खतरनाक''कहने का कोई आधार नहीं है।''खतरनाक'' की अवधारणा के मद्देनजर किसी भी धार्मिक या जातीय समूह को''खतरनाक''करार देना एक अत्यंत सरलीकृत और भ्रामक दृष्टिकोण है। कोई भी बड़ा समुदाय एक समान नहीं होता और खतरे की धारणा व्यक्तियों या चरमपंथी विचारधाराओं से जुड़ी होती है। न कि किसी पूरी कौम से। दोनों ही समुदाय अपने-अपने क्षेत्रों में सदियों से शांतिपूर्वक जीवन यापन कर रहे हैं। इनकी तुलना ''खतरे'' के पैमाने पर करना उचित नहीं है।(Photos Courtesy Social media & AI)
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