*ईरान ने US के 'आर्थिक D-Day' को बताया नाकाम, बोला- दो साल का प्लान तैयार, चीन-रूस करेंगे साथ*/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई

*ईरान ने US के 'आर्थिक D-Day' को बताया नाकाम, बोला,दो साल का प्लान तैयार, चीन-रूस करेंगे साथ*/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई 



(मुंबई/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई) तेहरान और वॉशिंगटन के बीच तनाव एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है। अमेरिका ने ईरान की आय पर पूरी तरह से "नकेल कसने" की बात कहते हुए उसे "इकोनॉमिक D-Day"(आर्थिक निर्णायक दिवस) करार दिया लेकिन ईरान ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए कहा कि वह इस मुकाबले के लिए"पूरी तरह तैयार" है और अमेरिका को यह लड़ाई एक और "करीबी हार" देगा। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ऐतिहासिक कदम उठाते हुए घोषणा की कि अमेरिका अब ईरानी खतरे को "प्रबंधित"नहीं बल्कि"समाप्त"करेगा। उन्होंने कहा कि ईरान के साथ कोई भी वित्तीय साझेदारी करने वाला देश या व्यवसाय अलग-थलग पड़ जाएगा। इस अभियान के तहत अमेरिका ने डिजिटल एसेट्स, टेक्नोलॉजी, गोल्ड, एविएशन और शिपिंग समेत पांच प्रमुख क्षेत्रों पर प्रतिबंध लगाए हैं और करीब 60 संस्थाओं,व्यक्तियों और जहाजों को ब्लैकलिस्ट किया है। बेसेंट ने इसे"अब तक का सबसे बड़ा वित्तीय हमला"बताया। जिसका मकसद ईरान की हर संभावित कमाई के रास्ते को बंद करना है हालांकि इस कड़ी कार्रवाई के बावजूद ईरान ने कोई नरमी नहीं दिखाई।


 ईरानी अर्थव्यवस्था मंत्री अली मदनीज़ादेह ने राज्य टेलीविजन पर कहा कि तेहरान के पास इन प्रतिबंधों से निपटने के लिए"दो साल का ठोस प्लान" है। उन्होंने कहा कि"हम लंबे समय से इसी घड़ी का इंतज़ार कर रहे थे। हमारे पास भी अपने टूल्स हैं और हम जानते हैं कि यह गेम कैसे खेला जाता है।" मदनीज़ादेह ने पूरा भरोसा जताया कि चीन और रूस जैसे प्रमुख सहयोगी अमेरिकी दबाव में नहीं आएंगे और ईरान के साथ व्यापार जारी रखेंगे। विशेष रूप से चीन, जो ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है। उसने पिछले अमेरिकी प्रतिबंधों को नज़रअंदाज़ किया है और इस बार भी उसके झुकने की संभावना नहीं जताई जा रही है।


 चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता लिन जियांग ने स्पष्ट कहा कि बीजिंग"गैर-कानूनी एकतरफा प्रतिबंधों"का कड़ा विरोध करता है और अपने हितों की रक्षा करेगा। वहीं अमेरिकी चेतावनी के कुछ घंटों बाद ही ईरान के एक अन्य प्रमुख व्यापारिक साझेदार,संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने ईरान के साथ सभी वित्तीय लेन-देन रोकने की घोषणा कर दी। इसके बावजूद ईरानी मंत्री ने कहा कि दूसरे देश अमेरिकी दबाव में नहीं आएंगे और ईरान अपने वैकल्पिक व्यापारिक रास्ते खोज लेगा। इस आर्थिक जंग का असर पूरी दुनिया पर पड़ना शुरू हो गया है। ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर यह संघर्ष जारी रहा तो वह होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल निर्यात पर पूरी तरह रोक लगा सकता है। जहाँ से दुनिया का पाँचवाँ हिस्सा तेल और गैस गुजरता है। इस खतरे के चलते वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड तेल की कीमत बढ़कर 92 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई है और अमेरिका में गैसोलीन की औसत कीमत 4 डॉलर प्रति गैलन को पार कर गई है। जो आगामी मिड-टर्म चुनावों से पहले वहाँ की सबसे बड़ी घरेलू चिंता बन गई है हालाँकि कई विशेषज्ञों को अमेरिकी इस कदम की सफलता पर संदेह है।

 कैपिटल इकोनॉमिक्स के मुख्य अर्थशास्त्री डेविड ऑक्सले का कहना है कि ईरान का 90% तेल निर्यात पहले से ही चीन को जाता है। जो अमेरिकी प्रतिबंधों को मान्यता नहीं देता इसलिए नए पैकेज का ईरानी ऊर्जा प्रवाह पर तत्काल प्रभाव"बहुत कम"होगा। "इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप"के अली वेज़ ने भी कहा कि ईरान के पड़ोसी देश पाकिस्तान,तुर्की, इराक अमेरिका के साथ रिश्ते तो निभाना चाहते हैं लेकिन वे ईरान से पूरी तरह संबंध तोड़ने का जोखिम नहीं उठा सकते। उन्होंने यह भी कहा कि तेहरान पर आर्थिक दबाव"काम नहीं करता"क्योंकि ईरानी सरकार किसी भी पीड़ा को अपने लोगों पर डालने को तैयार है और आत्मसमर्पण नहीं करेगी। 

गौरतलब है कि इससे पहले अप्रैल में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने धमकी दी थी कि अगर ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य नहीं खोला तो आज रात एक पूरी सभ्यता खत्म हो जाएगी लेकिन पाकिस्तान जैसे बिचौलियों के हस्तक्षेप और बढ़ती कूटनीतिक माँगों के बाद अमेरिका को पीछे हटना पड़ा था। अब एक बार फिर यही कहानी दोहराती नज़र आ रही है। जहाँ ईरान ने अपनी पूरी ताकत के साथ पलटवार की तैयारी कर ली है और वैश्विक अर्थव्यवस्था इस उलझन की कीमत चुका रही है। अतिरिक्त तथ्य और विश्लेषण । ईरान की "प्रतिरोधी अर्थव्यवस्था"और चीन-रूस की भूमिका के मद्देनजर ईरान ने चीन और रूस पर भरोसा जताया गया है लेकिन हालिया आंकड़े इस तस्वीर को और जटिल बनाते हैं। चीन ने हाल के महीनों में ईरानी कच्चे तेल की खरीद में काफी कमी की है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव बेसेंट के अनुसार चीन ने ईरानी तेल की खरीदारी में लगभग 40% की कटौती की है। शिपिंग डेटा भी इसकी पुष्टि करता है। जुलाई 2026 की पहली छमाही में चीन का ईरानी तेल आयात दैनिक 55.6 लाख बैरल पर आ गया। जो जनवरी 2023 के बाद सबसे निचला स्तर है। छह महीने पहले तक चीन ईरानी समुद्री तेल निर्यात का 80% से अधिक खरीदार था। जो दैनिक लगभग 138 लाख बैरल था। इस कटौती के पीछे व्यावसायिक कारण हैं। मध्य पूर्व में संघर्ष के कारण शिपिंग लागत और बीमा प्रीमियम बढ़ गए हैं। 


जिससे ईरानी तेल की कीमत कम आकर्षक हो गई है। चीन ने इस अंतर को रूसी पाइपलाइन तेल से पूरा किया है। जो अधिक स्थिर है और अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का उपयोग किया है। इस बदलाव ने ईरान के भीतर राजनीतिक बहस को जन्म दिया है। ईरानी अखबार"खोरासान"ने सवाल उठाया कि क्या चीन ईरान की होर्मुज रणनीति को"बेअसर"कर रहा है। ईरानी मीडिया में दो गुट उभरे हैं। एक इसे व्यावसायिक जोखिम प्रबंधन मानता है।  जबकि दूसरा इसे एक रणनीतिक झटका मानता है हालाँकि एक महत्वपूर्ण बात यह है कि ईरान ने रूस और चीन को होर्मुज जलडमरूमध्य में"विशेष पहुँच"दी है। ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के प्रमुख ने स्पष्ट कहा कि रूस और चीन के जहाजों को तरजीही शर्तें मिलेंगी। जबकि अन्य देशों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। इसका मतलब यह है कि अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी के बावजूद रूसी और चीनी तेल टैंकरों की आवाजाही जारी रहेगी।


 जो अमेरिकी रणनीति के लिए एक बड़ी चुनौती है। होर्मुज जलडमरूमध्य के मद्देनजर एक बहुआयामी संकट देखें तो एक रिपोर्ट में होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने की चेतावनी दी गई है। यह पहले ही हो चुका है। अप्रैल 2026 में अमेरिकी नौसेना ने होर्मुज जलडमरूमध्य को नाकाबंदी कर दिया था और अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने दावा किया था कि पहले 24 घंटों में कोई भी जहाज नाकाबंदी तोड़ नहीं सका। ईरान ने इस नाकाबंदी का जवाब "स्तरीय शुल्क प्रणाली" से दिया है। ईरान ने देशों को 1 से 5 के पैमाने पर मैत्री स्तर के आधार पर वर्गीकृत किया है। मित्र राष्ट्र जैसे चीन, रूस,भारत,इराक और पाकिस्तान में मुफ्त या रियायती पारगमन है। तटस्थ देशों में 15 लाख से 200 लाख डॉलर तक का शुल्क ईरानी रियाल या रेन्मिन्बी में जरुरी है। प्रतिद्वंद्वी देश अमेरिका,ब्रिटेन,फ्रांस,जर्मनी,जापान, दक्षिण कोरिया को पारगमन की अनुमति नहीं ।


 40 से अधिक देशों ने इस शुल्क प्रणाली को खारिज कर दिया है और ब्रिटेन के नेतृत्व में एक गठबंधन बनाया है हालाँकि इस गठबंधन के पास कोई सैन्य विकल्प या वैकल्पिक ऊर्जा मार्ग नहीं है और जापान जैसे देश जिनकी 90% तेल आपूर्ति होर्मुज पर निर्भर है। खोखली बयानबाजी से परे कुछ नहीं कर सकते।
ध्यान देने योग्य बात जाने तो ईरान ने होर्मुज पारगमन के लिए डॉलर को पूरी तरह से बाहर कर दिया है। भुगतान केवल ईरानी रियाल,चीनी रेन्मिन्बी या स्टेबलकॉइन में स्वीकार किए जाते हैं। इसका मतलब यह है कि दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्ग पर "डी-डॉलरीकरण" की प्रक्रिया चल रही है। जो वैश्विक स्तर पर पेट्रोडॉलर प्रणाली को कमजोर कर सकती है। ईरान के भीतर विभाजन के मद्देनजर दिलचस्प बात यह है कि ईरानी नेतृत्व आर्थिक रणनीति पर विभाजित दिखता है।


 ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने शनिवार (अगस्त 2026) को कहा कि"कोई भी हमेशा युद्ध जारी नहीं रख सकता"और उन्होंने जून 2026 में हस्ताक्षरित इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन (MOU) पर पुनः सहमति का आह्वान किया था। इसके विपरीत,कट्टरपंथी गुट जैसे विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता एस्माइल बकाई और सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मोहसेन रेज़ाई का कहना है कि ईरान"आक्रामक की शर्तों पर युद्ध समाप्त नहीं होने देगा"और यदि आर्थिक युद्ध जारी रहा तो "फारस की खाड़ी से एक बूंद भी तेल निर्यात नहीं होगा"। यह आंतरिक विभाजन ईरान की रणनीतिक अनिश्चितता को दर्शाता है। एक ओर आर्थिक दबाव से राहत की इच्छा,दूसरी ओर प्रतिष्ठा और क्षेत्रीय प्रभुत्व बनाए रखने का दबाव। 


अमेरिकी घरेलू राजनीति की भूमिका देखें तो इस रिपोर्ट में मिड-टर्म चुनावों का उल्लेख है लेकिन इसका रणनीतिक महत्व और भी गहरा है। विश्लेषकों के अनुसार ईरान युद्ध अमेरिकी मतदाताओं में अलोकप्रिय है और ट्रम्प प्रशासन पर चुनावों से पहले सैन्य अभियानों को समाप्त करने का दबाव बढ़ रहा है। यही कारण है कि अमेरिका "इकोनॉमिक फ्यूरी"(आर्थिक क्रोध) नामक एक नए अभियान पर केंद्रित हो गया है। जो मिलिट्री एपिक फ्यूरी अभियान के बाद आया है। क्विंसी इंस्टीट्यूट के विश्लेषकों के अनुसार अमेरिकी सेना के उन्नत हथियारों के भंडार में काफी कमी आई है और बड़े पैमाने पर सैन्य अभियानों की लागत लगातार बढ़ रही है। दूसरे शब्दों में अमेरिका की "इकोनॉमिक D-Day" रणनीति मूल रूप से एक स्वीकारोक्ति है कि सैन्य विकल्प विफल हो गया है। यह "मजबूरी का युद्ध" हैं।


 जैसा कि कई विश्लेषकों ने कहा है। आपकी रिपोर्ट की तुलना में हालिया घटनाक्रम दर्शाते हैं। चीन-ईरान संबंधों के हिसाब से चीन ने ईरानी तेल खरीद में 40% कटौती की है लेकिन ईरान ने चीन को होर्मुज में"विशेष पहुँच"देकर इसकी भरपाई की है। होर्मुज की नाकाबंदी पहले से लागू है।  ईरान ने एक जटिल शुल्क प्रणाली बनाई है। जो अमेरिकी प्रतिबंधों को कमजोर करती है। ईरानी विभाजन को लेकर राष्ट्रपति (समझौते के पक्ष में) और कट्टरपंथी (युद्ध जारी रखने के पक्ष में) के बीच गहरी खाई है। अमेरिकी दबाव के मद्देनजर सैन्य विफलता के बाद आर्थिक दबाव एक अंतिम उपाय है और अमेरिकी घरेलू राजनीति (चुनाव) इस पर दबाव बना रही है। यह परिदृश्य बहु-ध्रुवीय है। कोई भी पक्ष स्पष्ट रूप से जीत नहीं पाया है लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार इसकी कीमत चुका रहे हैं।(Photos Courtesy Social media and AI)

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