*जब 4500 साल पुरानी सभ्यता को रेलवे ट्रैक समझ लिया गया: हड़प्पा की त्रासदी*/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई

*जब 4500 साल पुरानी सभ्यता को रेलवे ट्रैक समझ लिया गया: हड़प्पा की त्रासदी*/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई 



(मुंबई/रिपोर्ट स्पर्श देसाई) सन 1856 में ब्रिटिश इंजीनियरों का एक दल लाहौर- मुल्तान रेलवे लाइन के निर्माण के लिए हड़प्पा पहुंचा। उन्होंने यहां 4500 साल पुरानी एक उन्नत सभ्यता के अवशेष देखे लेकिन इसे पहचानने की बजाय उन्होंने वहां से हजारों ईंटें निकालकर रेलवे ट्रैक बना दिया। जो संरचनाएं चार हजार साल से अधिक समय से खड़ी थीं। वे कुछ ही सालों में खंडहर बन गईं थीं।  एलेक्जांडर कनिंघम की डायरी में भी यह स्वीकारोक्ति दर्ज है कि उस समय दुनिया में कहीं ऐसी नगर योजना नहीं थी।  हड़प्पा सभ्यता अपने ग्रिड पैटर्न में बसे शहरों,उन्नत जल निकासी प्रणाली और मानकीकृत ईंटों के निर्माण के लिए जानी जाती थी। मोहन-जो-दड़ो का विशाल स्नानागार,अन्न भंडार और व्यवस्थित सड़कें इस बात के प्रमाण हैं कि यह सभ्यता अपने समय में अत्यधिक विकसित थी।



 ब्रिटिश अधिकारियों ने इसे केवल निर्माण सामग्री समझा। कनिंघम ने कुछ कलाकृतियों को दस्तावेज किया लेकिन जो बचा था वह भी तोड़ा जा चुका था। 4500 सालों से खड़ी यह सभ्यता कुछ ही वर्षों में ध्वस्त हो गई।  हड़प्पा सभ्यता का परिचय देखें तो हड़प्पा सभ्यता, जिसे सिंधु घाटी सभ्यता भी कहा जाता है। विश्व की प्राचीनतम शहरी सभ्यताओं में से एक है। यह लगभग 2600 ईसा पूर्व से 1900 ईसा पूर्व तक फली-फूली थी।  इसका विस्तार वर्तमान पाकिस्तान,भारत और अफगानिस्तान के कुछ हिस्सों में था। इसकी मुख्य विशेषताएं जाने तो इसकीनगर योजना के मुताबिक शहर ग्रिड पैटर्न में बसे थे। सड़कें समकोण पर कटती थीं। इसकी जल निकासी व्यवस्था के मद्देनजर हर घर में स्नानागार और नालियां थीं। जो मुख्य जल निकासी से जुड़ी थीं। निर्माण के मद्देनजर पक्की ईंटों का उपयोग होता था। जो दो मानक आकारों में बनाई जाती थीं। व्यापार के हिसाब से मेसोपोटामिया और फारस की खाड़ी क्षेत्रों से व्यापार संबंध थे। कला एवं लिपि के मद्देनजर मुहरों पर पशुओं के चित्र और एक अज्ञात लिपि उकेरी गई थी। इसके प्रमुख स्थलों में हड़प्पा,मोहनजोदड़ो,लोथल बंदरगाह नगर,धोलावीरा और कालीबंगा है। क्या यह सच ब्रिटिश जानते थे?




यह सवाल उठता है । क्या ब्रिटिश जानते थे कि यह कितना पुराना हैं फिर भी इसे तोड़ा? क्या यह सिर्फ अज्ञानता थी?हालांकि कनिंघम ने सन 1875 में हड़प्पा का दौरा किया और इसके महत्व को समझा लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। साल1921 में सर जॉन मार्शल ने औपचारिक रूप से इस सभ्यता की खोज की घोषणा की। तब तक इसका अधिकांश हिस्सा नष्ट हो चुका था। आज हड़प्पा में सिर्फ खंडहर बचे हैं।  यह हमारी विरासत के प्रति लापरवाही की एक दु:खद कहानी है।(Photos Courtesy Social media and AI)

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