*मैसूर का शेर टीपू सुल्तान की अंतिम लड़ाई: 4 मई 1799 को श्रीरंगपट्टनम में वह क्या हुआ जिसने भारत का इतिहास बदल दिया?*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
(मुंबई/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई) चार मई सन् 1799। दक्षिण भारत की कावेरी नदी के बीचोबीच बसे श्रीरंगपट्टनम के किले के चारों ओर हजारों ब्रिटिश सैनिक और उनके सहायक सिपाही युद्ध-संन्नद्ध खड़े थे। तोपों की गर्जना से धरती काँप रही थी, और गोलों की बारिश किले की प्राचीरों को चूर-चूर कर रही थी। मैसूर सल्तनत अपने इतिहास की सबसे भीषण लड़ाई लड़ रही थी। ब्रिटिश सेना की अग्रिम टुकड़ियाँ किले की दीवारों तक पहुँच चुकी थीं लेकिन टीपू सुल्तान जिसे''मैसूर का शेर''कहा जाता था। उन्होंने पीछे हटने के बजाय अंतिम साँस तक संग्राम करने का निर्णय लिया। इसी दिन वह घटना घटी जिसने न केवल मैसूर राज्य को समाप्त कर दिया बल्कि पूरे हिंदुस्तान की राजनीतिक दिशा को भी मोड़ दिया। क्या टीपू की हार सिर्फ ब्रिटिश सैन्य शक्ति से हुई?इतिहासकार इस बात पर सहमत हैं कि टीपू सुल्तान की पराजय केवल ब्रिटिश तोपों और गोलियों का नतीजा नहीं थी। इसके पीछे गहरी सियासत,टूटते गठबंधन और मैसूर के भीतर की कमज़ोरियाँ भी जिम्मेदार थीं। सन 1792 में तीसरे आंग्ल-मैसूर युद्ध के बाद हुई ''संधि श्रीरंगपट्टनम''ने टीपू को अपनी आधी से अधिक रियासत,भारी युद्ध- क्षतिपूर्ति और अपने दो पुत्रों को ब्रिटिशों के पास बंधक के रूप में भेजने पर मजबूर कर दिया था। यह सिर्फ सैन्य हार नहीं बल्कि मैसूर की प्रतिष्ठा और आर्थिक रीढ़ पर गहरा आघात था। दौरान कूटनीतिक अलगाव के मद्देनजर जब कोई साथ नहीं आया। सन1798 में लॉर्ड रिचर्ड वेलेजली भारत का गवर्नर-जनरल बना। उस समय यूरोप में ब्रिटेन और क्रांतिकारी फ्रांस के बीच युद्ध छिड़ा था। ब्रिटिशों को भय था कि टीपू जो पहले से फ्रांस के संपर्क में था। नेपोलियन बोनापार्ट के साथ मिलकर भारत में ब्रिटिश हितों के लिए खतरा पैदा कर सकता है। वेलेजली ने टीपू को 'गंभीर खतरा' घोषित किया लेकिन इस बार टीपू अकेला पड़ गया था। हैदराबाद का निज़ाम ब्रिटिशों के साथ खड़ा था। मराठा सरदारों ने उसकी मदद से इनकार कर दिया और मैसूर कूटनीतिक रूप से पूरी तरह अलग-थलग पड़ गया था।
चौथा आंग्ल-मैसूर युद्ध और किले की घेराबंदी के हिसाब से सन 1799 में युद्ध शुरू हुआ। ब्रिटिश सेना जनरल जॉर्ज हैरिस के नेतृत्व में आगे बढ़ी। जिसमें निज़ाम के सैनिक भी शामिल थे। इस अभियान में आर्थर वेलेजली,जो बाद में वेलिंग्टन का ड्यूक बना और वाटरलू में नेपोलियन को हराया उसने भी हिस्सा लिया। मार्च 1799 में सिद्धासीर और मालवल्ली के पास झड़पें हुईं लेकिन ब्रिटिश सेना लगातार आगे बढ़ती रही। अप्रैल 1799 तक ब्रिटिश फ़ौज श्रीरंगपट्टनम के निकट पहुँच गई और किले की घेराबंदी शुरू कर दी। दिन-ब-दिन तोपों के गोलों से किले की दीवारें कमज़ोर पड़ती गईं। टीपू ने बातचीत की कोशिशें कीं लेकिन कोई समाधान नहीं निकला। 4 मई 1799 का वह दिन जब इतिहास थम गया। 4 मई को दोपहर के समय ब्रिटिशों ने हमले का समय चुना। जब प्रतिरोध कमज़ोर होने की संभावना थी। संकेत मिलते ही मेजर जनरल डेविड बेयर्ड के नेतृत्व में हमलावर टुकड़ियाँ खाइयों से निकलीं और कावेरी नदी पार की और किले की टूटी हुई दीवार पर धावा बोल दिया। गोलियाँ बरस रही थीं और मैसूर के रक्षक जान देकर लड़ रहे थे लेकिन हमलावर दीवार के अंदर घुस गए और किले के विभिन्न हिस्सों पर कब्ज़ा करने लगे। टीपू सुल्तान ने युद्धक्षेत्र नहीं छोड़ा। वह अपने सैनिकों के साथ किले के उत्तरी द्वार (नौधानी दरवाज़ा) के पास संघर्ष कर रहा था। जैसे-जैसे ब्रिटिश सैनिक अंदर बढ़ते गए तो टीपू और उसके रक्षक पीछे हटते गए। अंतिम संघर्ष वॉटर गेट (जलद्वार) के पास हुआ। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार टीपू पहले से घायल था। अफरा-तफरी के बीच उसे कई गोलियाँ लगीं। वहीं भीड़-भरी संकरी गलियों में गिरे हुए घायलों और शहीदों के बीच मैसूर का वह शेर जिसने वर्षों तक ईस्ट इंडिया कंपनी को चुनौती दी थी। अपने ही किले में धराशायी हो गया। ब्रिटिशों को पहले यक़ीन नहीं हुआ कि टीपू मारा गया है लेकिन जब उन्होंने उसके शव को पहचाना तो श्रीरंगपट्टनम पर पूरी तरह क़ब्ज़ा हो चुका था। ऐतिहासिक प्रभाव देखें तो एक सल्तनत का अंत, एक साम्राज्य का उदय । टीपू सुल्तान की मृत्यु ने मैसूर की स्वतंत्रता का अंत कर दिया। ब्रिटिशों ने वोडेयार वंश को पुनः सिंहासन पर बिठाया लेकिन वास्तविक सत्ता कंपनी के हाथों में रही। इस विजय ने दक्षिण भारत में ब्रिटिश प्रभुत्व को अजेय बना दिया और आने वाले दशकों में पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर कंपनी के शासन का मार्ग प्रशस्त किया। टीपू सुल्तान की आखिरी लड़ाई केवल एक सैन्य पराजय नहीं थी। यह सियासी अलगाव,सामरिक भूलों और बदलते वैश्विक संतुलन की कहानी है फिर भी अंतिम क्षणों में उसने जो साहस और अदम्य संकल्प दिखाया। वह आज भी इतिहास के पन्नों में अमर है। युद्ध से पहले की साजिश के मद्देनजर धोखेबाज़ी और अंदरूनी कमज़ोरी इसकी प्रमुख वजह थी। सन 1799 तक आते-आते टीपू सुल्तान की स्थिति पहले से कहीं अधिक नाजुक थी। सन 1792 की ''संधि श्रीरंगपट्टनम''ने मैसूर की आधी से अधिक रियासत छीन ली थी। भारी युद्ध-क्षतिपूर्ति का बोझ डाला था और उसके दो बेटों को ब्रिटिशों के पास बंधक बना दिया था। यह सिर्फ सैन्य हार नहीं थी। यह मैसूर की आर्थिक और राजनीतिक रीढ़ पर गहरा आघात था। इस बार टीपू अकेला था। उसने तुर्की के सुल्तान,अफगानिस्तान के ज़मान शाह,मुग़ल बादशाह और निज़ाम व मराठों को पत्र लिखे थे। सभी से मदद माँगी। फ्रांस से भी उसे 40,000 सैनिकों की उम्मीद थी लेकिन मिले केवल 100 फ्रांसीसी तकनीशियन और सैनिक। उसकी सारी कूटनीतिक कोशिशें नाकाम रहीं थीं। मराठों के लिए उसने''पूना के काफिर''जैसे शब्दों का प्रयोग किया था लेकिन इससे कोई मदद नहीं मिली थी। सबसे बड़ा धोखा उसे अपने ही शिविर से मिला। टीपू के प्रधानमंत्री और जनरल मीर सादिक को ब्रिटिशों ने खरीद लिया था। युद्ध के चरम क्षण में जब ब्रिटिश सेना किले की दीवार में बने छेद से अंदर घुस रही थी। मीर सादिक ने मैसूर की सेना को वेतन बाँटने के बहाने मोर्चे से हटा दिया। इस विश्वासघात ने किले के पतन को लगभग निश्चित कर दिया था। इसी दिन 4 मई 1799 को आखिरी हमला हुआ था और टीपू का अंतिम संघर्ष समाप्त हुआ था। 4 मई की दोपहर करीब 1 बजे ब्रिटिशों ने हमले का समय दिन का वह क्षण चुना। जब रक्षकों के प्रतिरोध के कमज़ोर होने की संभावना थी। 2,494 यूरोपीय और 1,887 भारतीय सैनिकों की हमलावर टुकड़ी मेजर जनरल डेविड बेयर्ड के नेतृत्व में खाइयों से निकली थी। बेयर्ड के लिए यह युद्ध व्यक्तिगत था। 20 साल पहले वह 44 महीने तक टीपू की कैद में रहा था। टीपू को हमले की सूचना मिली थी लेकिन उसने अनुमान लगाया कि हमला रात तक नहीं होगा और भोजन का आदेश दिया था। मुश्किल से खाना खत्म हुआ था कि हमले की खबर आई। वह तुरंत घोड़े पर सवार हुआ और उत्तरी प्राचीर की ओर बढ़ा था। कहानी का वह क्षण जब टीपू ने वॉटर गेट यानि जलद्वार के पास अपनी आखिरी साँस ली। इस दरवाज़े से किले के भीतर रहने वाले लोग कावेरी नदी से पानी लाने जाते थे। भागती हुई भीड़ और ब्रिटिश सैनिकों के बीच टीपू का घोड़ा मारा गया और वह मृतकों व घायलों के ढेर पर गिर पड़ा था। उसके एक वफादार सेवक राजा खान ने उसे पालकी में बैठने में मदद की थी।अंतिम क्षणों में भी टीपू ने आत्मसमर्पण नहीं किया था। जब एक ब्रिटिश सैनिक ने उसकी तलवार की जड़ी-जड़ाऊ पेटी छीनने की कोशिश की तो टीपू ने तलवार उठाकर वार किया था। इसके तुरंत बाद एक गोली उसके कनपटी में लगी और उसकी मृत्यु हो गई थी। राजा खान के अनुसार उन्होंने टीपू को ब्रिटिशों के सामने अपनी पहचान बताने की सलाह दी लेकिन टीपू ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया था। टीपू के शव की पहचान का मामला जाने तो कैसे मिला 'मैसूर का शेर'? ब्रिटिशों को पहले यक़ीन नहीं था कि टीपू मारा गया है। रात में मशालों की रोशनी में जनरल बेयर्ड, कर्नल वेलेजली बाद में वेलिंग्टन के ड्यूक और मेजर एलन ने वॉटर गेट पर पड़े शवों की जाँच की। राजा खान जो अकेला जीवित बचा था। उसने अपने स्वामी के शव की पहचान कराई थी। शव अभी भी गर्म था। पहचान की पुष्टि टीपू की दाहिनी भुजा पर बंधे एक चाँदी के ताबीज और अरबी-फ़ारसी लेखों वाले तावीज़ से हुई। सैकड़ों लाशों के बीच जिनमें एक खूबसूरत ब्राह्मण लड़की का शव भी शामिल था । जो भीड़ में कुचली गई थी। टीपू का शव पहचाना गया। मैसूर के मिसाइल हथियार जो एक क्रांति थी जो ब्रिटिशों को डरा गई थी। टीपू सुल्तान की सेना का सबसे अनोखा हथियार था। लोहे के खोल वाले रॉकेट। हैदर अली ने इसकी शुरुआत की थी लेकिन टीपू ने इसे युद्ध का अहम हिस्सा बनाया। मैसूर की सेना में 5,000 रॉकेटमैन थे। ये रॉकेट 1,000 गज यानि करीब 900 मीटर तक मार कर सकते थे। कुछ हवा में फटते थे तो कुछ ज़मीन पर गिरकर साँप की तरह लहराते हुए आगे बढ़ते थे और लंबे बाँसों से जुड़े होने के कारण भयानक चोटें पहुँचाते थे।एक ब्रिटिश अधिकारी ने लिखा कि रॉकेटों और मस्कटों की बारिश इतनी घनी थी कि ओले भी इससे मोटे नहीं हो सकते। रॉकेट कतार के आगे से पीछे तक घुस जाते थे । जिससे मौत, घाव और भयानक चीसें आतीं थी। यहाँ तक कि कर्नल आर्थर वेलेजली जो बाद में वाटरलू का नायक बना। उस को भी 5 अप्रैल 1799 की रात रॉकेटमैनों ने पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था। यह वही आर्थर वेलेजली था जिसने 16 साल बाद नेपोलियन को वाटरलू में हराया था। ये मैसूरी रॉकेट इतने प्रभावशाली थे कि ब्रिटिशों ने उनकी तकनीक सीखी और बाद में 'कॉन्ग्रिव रॉकेट' विकसित किया। श्रीरंगपट्टनम के पतन के बाद ब्रिटिशों को 600 लॉन्चर, 700 रॉकेट और 9,000 खाली रॉकेट मिले थे। वैश्विक साजिश के मद्देनजर नेपोलियन का सपना और ब्रिटिशों का डर । सन1798 में नेपोलियन बोनापार्ट ने मिस्र पर हमला किया था। उसका लक्ष्य भारत में ब्रिटिश साम्राज्य को निशाना बनाना था और इसके लिए टीपू सुल्तान उसकी चाबी था। ब्रिटिशों को गुप्तचरों के ज़रिए पता चला कि टीपू के राजदूत मॉरीशस में फ्रांसीसी सैनिक भर्ती कर रहे हैं। लंदन के निर्देशकों ने गवर्नर-जनरल वेलेजली को स्पष्ट आदेश दिया कि नेपोलियन के मिस्र छोड़ने से पहले टीपू को हराओ और इसके लिए 5 लाख रुपये मंज़ूर किए थे। ब्रिटिश प्रधानमंत्री विलियम पिट ने संसद में कहा कि टीपू ने भारत में ''जैकोबिन क्लब'' स्थापित किए । जहाँ राजाओं को नष्ट करने और स्वतंत्रता को प्यार करने की शपथ ली जाती थी। टीपू के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण था कि फ्रांसीसी क्रांति और नेपोलियन की महत्वाकांक्षा ने उसे ब्रिटिशों के लिए सबसे बड़ा खतरा बना दिया था। जबकि वास्तव में फ्रांस से मिलने वाली मदद नाममात्र की ही थी। क्या टीपू की हार सिर्फ ब्रिटिश ताकत से हुई? नहीं। इस हार के चार प्रमुख कारण थे। कूटनीतिक अलगाव के मद्देनजर मराठे और निज़ाम ब्रिटिशों के साथ खड़े थे। टीपू की अपीलों का कोई जवाब नहीं मिला था। अंदरूनी विश्वासघात को लेकर मीर सादिक जैसे सेनापति ने युद्ध के सबसे नाज़ुक वक़्त पर सेना को मोर्चे से हटाया गया था। संसाधनों की कमी को लेकर सन1792 की संधि के बाद मैसूर की सेना आधी रह गई थी । 30,000 मैसूरी सैनिकों के मुकाबले 50,000 से अधिक ब्रिटिश-निज़ाम सेना। चौथी और आखरी सामरिक भूल देखें तो टीपू ने हमले के समय का ग़लत अनुमान लगाया और भोजन करने बैठ गया।
इस ऐतिहासिक महत्व को लेकर एक युग का अंत हो गया था।4 मई 1799 को टीपू सुल्तान की मृत्यु ने दक्षिण भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का रास्ता साफ कर दिया था। ब्रिटिशों ने वोडेयार वंश को पुनः सिंहासन पर बिठाया लेकिन वास्तविक सत्ता कंपनी के हाथों में रही था। टीपू की मृत्यु की खबर लंदन तक 13 सितंबर 1799 को पहुँची थी। आज श्रीरंगपट्टनम में दो पट्टिकाएँ हैं। जो उस स्थान को चिह्नित करती हैं। जहाँ टीपू गिरा था। वहएक वॉटर गेट पर और दूसरी लगभग 200 मीटर दूर।''मैसूर के शेर''का वह अंतिम संघर्ष आज भी उस साहस और अदम्य संकल्प की गाथा कहता है जिसने इतिहास की धारा बदल दी थी।Tipu Sultan’s Last Stand: What Happened at Srirangapatna on 4 May 1799 That Changed Indian History?।( Photos Courtesy Social media and AI)
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