*चीनी संकट:चीनी की कीमत 70 रुपए पार,सरकार ने इथेनॉल से इनकार किया, लेकिन उत्पादन अनुमान में चूक ने बढ़ाई महंगाई*/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई

*चीनी संकट:चीनी की कीमत 70 रुपए पार,सरकार ने इथेनॉल से इनकार किया, लेकिन उत्पादन अनुमान में चूक ने बढ़ाई महंगाई*/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई


(मुंबई/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई) देश में चीनी की कीमतों ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। जुलाई में 48 रुपए किलो बिकने वाली चीनी अगस्त के अंत तक आते-आते 70 रुपए किलो के पार पहुंच गई है। आम जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर है और सोशल मीडिया पर एक ही सवाल गूंज रहा है। मोदी सरकार ने चीनी के दाम 70 रुपए किलो पर पहुंचाकर अपनी बची हुई शाख बचाने की कोशिश की है या अब वो भी बेच देंगे?क्योंकि जनता के मुताबिक जो लोग 40 रुपए में पेट्रोल बेचने के नाम पर सत्ता में आए थे। उन्होंने चीनी 70 रुपए पर पहुंचा दी। 


क्या इथेनॉल है चीनी महंगाई की असली वजह?वह समझे तो चीनी की बढ़ती कीमतों के पीछे सबसे बड़ा सवाल इथेनॉल नीति को लेकर उठ रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने तीन सवाल पूछकर सरकार को घेरा है। उन्होंने पूछा कि यह कैसा आत्मनिर्भर भारत है जहां एक तरफ विदेश से चीनी आयात की जा रही है?और दूसरी तरफ गन्ने को पेट्रोल में मिलाने के लिए इथेनॉल में झोंका जा रहा है?हालांकि केंद्र सरकार ने चीनी की बढ़ती कीमतों के लिए इथेनॉल उत्पादन को जिम्मेदार मानने से साफ इनकार कर दिया है। सरकार के मुताबिक इथेनॉल के लिए डायवर्ट की गई चीनी की हिस्सेदारी घटी हैं। साल 2022-23 में 12% से घटकर साल 2025-26 में 9% रह गई है। सरकार का दावा है कि देश में बनने वाले इथेनॉल का करीब तीन-चौथाई हिस्सा मक्का और चावल जैसे अनाजों से बनता है। 



असली वजहें क्या हैं?वह जाने तो सरकार और उद्योग विशेषज्ञ चीनी की बढ़ती कीमतों के लिए कई वजहें गिना रहे हैं। उत्पादन में भारी गिरावट को देखें तो चालू सीजन 2025-26 में चीनी उत्पादन 306 लाख टन रहने का अनुमान है। जबकि शुरुआती अनुमान 343 लाख टन का था यानि करीब 11% की कमी दिखाई दे रही है। इसकी वजह रेड रॉट और टॉप बोरर जैसी बीमारियां और अत्यधिक बारिश से गन्ने की फसल को नुकसान बताया जा रहा है। जमाखोरी और सट्टेबाजी का गणित समझे तो सरकार ने माना है कि कुछ व्यापारियों और कारोबारियों ने जमाखोरी और सट्टेबाजी की है। जिससे कीमतें कृत्रिम रूप से बढ़ी हैं।


 फूड सेक्रेटरी संजीव चोपड़ा ने कीमतों में बढ़ोतरी को''अनुचित''बताया और इसे सट्टेबाजी का नतीजा करार दिया। त्योहारी मांग में इजाफे के हिसाब से रक्षाबंधन, जन्माष्टमी,दशहरा और दिवाली के सीजन में मिठाइयों और मीठे उत्पादों की मांग बढ़ जाती है। जिससे कीमतों पर दबाव बनता है। वैश्विक कारक के मद्देनजर अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी चीनी की किल्लत है। साल 2026-27 के लिए वैश्विक चीनी घाटा 33 लाख टन होने का अनुमान है।




 अंतरराष्ट्रीय कीमतें भी 30 जून को 474 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 20 अगस्त तक 552 डॉलर प्रति टन हो गई हैं। जनता की जेब पर क्या असर? वह जाने तो महंगाई की मार से आम आदमी बुरी तरह परेशान है। चीनी 48 रुपए किलो से 70 रुपए किलो 3 महीने में 40% बढ़ोतरी । गुड़ 50 रुपए किलो से 65 रुपए किलो। टूटा चावल इथेनॉल के लिए इस्तेमाल के लिए 25 से 29 रुपए किलो। मक्के का आटा 36 से 40 रुपए किलो। इडली का आटा 38 से 42 रुपए किलो। पशु आहार 29 से 32 रुपए किलो और पोल्ट्री फीड 23 से 25 रुपए किलो। इसके लिए सरकार की तरफ से क्या कार्रवाई हुई? वह जाने तो ड्यूटी-फ्री आयात के हिसाब से सरकार ने 10 लाख टन कच्ची चीनी 31 अक्टूबर 2026 तक बिना ड्यूटी के आयात करने की मंजूरी दी है। करीब 10 साल बाद भारत को चीनी आयात करनी पड़ रही है। साल 2017 में आखिरी बार 24 लाख टन चीनी आयात की गई थी। स्टॉक लिमिट के हिसाब से डीलर्स के लिए 400 टन की स्टॉक सीमा लागू की गई है।1 सितंबर से बड़े थोक खरीदार 15 दिन से ज्यादा चीनी का स्टॉक नहीं रख सकेंगे। जांच टीमों के मद्देनजर 10 सरकारी टीमें अलग-अलग राज्यों में जाकर चीनी के स्टॉक की फिजिकल वेरिफिकेशन करेंगी। पेराई जल्दी शुरू हो सकती है। 


चीनी मिलों को 15 अक्टूबर से पेराई शुरू करने की सलाह दी गई है ताकि अक्टूबर में 10-12 लाख टन अतिरिक्त चीनी बाजार में आ सके। कब मिलेगी राहत? यह सोचें तो ब्राजील से कच्ची चीनी आयात करने में कम से कम 10 दिन का समय लगेगा। उसे रिफाइन करके बाजार में उतारने में और भी समय लगेगा। फिलहाल सरकार 15 अक्टूबर से नए सीजन की पेराई का इंतजार कर रही है। तब तक जनता को 70 रुपए किलो वाली चीनी खानी पड़ेगी। क्या है सच्चाई? वह जाने तो भारत ब्राजील के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक देश है। साल 2022 में 110 लाख टन चीनी एक्सपोर्ट करने वाला भारत आज चीनी आयात करने को मजबूर है। कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे का सवाल है कि जब चीनी की कमी है तो इथेनॉल नीति की समीक्षा क्यों नहीं की जा रही?यह कैसा आत्मनिर्भर भारत है?वहीं बीजेपी का कहना है कि इथेनॉल नीति से चीनी मिलों को लाभ हुआ है और किसानों को 97% गन्ना भुगतान हो चुका है लेकिन जनता के लिए राहत की कोई खबर नहीं है। सच तो यह है कि इथेनॉल के चक्कर में खाद्य सुरक्षा दांव पर लग गई है और महंगाई जानलेवा हो चुकी है। जहां आम जनता चीनी के 70 रुपए किलो तक पहुंचने पर सरकार को कोस रही है। वहीं सरकार ने इसके लिए इथेनॉल नीति को जिम्मेदार मानने से साफ इनकार कर दिया है। केंद्र सरकार के अनुसार चीनी की बढ़ती कीमतों की असली वजहें कहीं और हैं। उत्पादन में गिरावट,फसल को नुकसान,त्योहारी मांग,वैश्विक आपूर्ति दबाव और जमाखोरी। इथेनॉल का हिस्सा घटा और अनाज का बढ़ा। सरकार का प्रमुख तर्क यह है कि इथेनॉल के लिए डायवर्ट की गई चीनी की हिस्सेदारी पहले के मुकाबले घटी है। आंकड़ों के अनुसार साल 2022-23 में यह हिस्सेदारी करीब 12% थी। जो 2025-26 में घटकर लगभग 9% रह गई है। सरकार का यह भी दावा है कि देश में बनने वाले इथेनॉल का करीब तीन-चौथाई (76%) हिस्सा अब मक्का और चावल जैसे अनाजों से बनता है। यह आंकड़ा अकेले इथेनॉल को दोषी ठहराने को चुनौती देता है लेकिन क्या यह पूरी कहानी है? 


विशेषज्ञों का मानना है कि इथेनॉल नीति ने चीनी उद्योग की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया है। जब चीनी के दाम कम होते हैं और मिलों के पास अतिरिक्त गन्ना होता है तो उसे इथेनॉल में डायवर्ट करना मिलों और किसानों दोनों के लिए फायदेमंद रहा है। इसी का नतीजा है कि 2025-26 सीजन के लिए 97% गन्ना बकाया किसानों को चुका दिया गया है। जब अनुमान ही गलत निकले तो और कहां हुई चूक?वह जाने तो असली समस्या इथेनॉल से ज्यादा उत्पादन अनुमानों को लेकर लगती है। सरकार ने खुद स्वीकार किया है कि 2025-26 सीजन में चीनी उत्पादन 306 लाख टन रहने का अनुमान है। जबकि शुरुआती अनुमान 343 लाख टन का था यानि करीब 11% की गिरावट। इसकी वजह रेड रॉट और टॉप बोरर जैसी बीमारियां और अत्यधिक बारिश से गन्ने की फसल को नुकसान बताई गई है लेकिन सवाल यह है कि जब उद्योग निकाय ISMA ने 349 लाख टन और ऑल इंडिया शुगर ट्रेड एसोसिएशन ने बाद में घटाकर 283 लाख टन का अनुमान लगाया था तो सरकार ने निर्यात की इजाजत क्यों दी? यह सबसे बड़ा सवाल है। नवंबर 2025 में सरकार ने 15 लाख टन चीनी निर्यात की अनुमति दी।


 जिसे बाद में बढ़ाकर 20 लाख टन कर दिया गया। जब तक उत्पादन के सही आंकड़े स्पष्ट हुए तब तक करीब 8 लाख टन चीनी देश से बाहर जा चुकी थी। आयात की मजबूरी और ब्राजील पर निर्भरता को लेकर सवाल। करीब एक दशक बाद भारत को फिर से चीनी आयात करनी पड़ रही है। सरकार ने 31 अक्टूबर 2026 तक 10 लाख टन कच्ची चीनी बिना ड्यूटी के आयात करने की मंजूरी दी है लेकिन यहां भी एक बड़ी चुनौती है। ब्राजील से जहाज से चीनी आने में करीब 40-45 दिन लगते हैं। इसका मतलब है कि अक्टूबर के मध्य तक ही कुछ खेपें पहुंच पाएंगी। सबसे बड़ी बात यह है कि भारत ब्राजील के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक देश है। साल 2022 में 110 लाख टन चीनी निर्यात करने वाला भारत आज आयात करने को मजबूर है। खाद्य सचिव संजीव चोपड़ा ने खुद कारोबारियों पर जमाखोरी और सट्टेबाजी का आरोप लगाया है। क्या अब महंगाई कम होगी? वह समझे तो सरकार ने स्टॉक लिमिट (डीलर्स के लिए 400 टन) लागू की है। 

उड़न दस्तों को तैनात किया है और मिलों के स्टॉक की फिजिकल वेरिफिकेशन करवाई है। इन कदमों का असर भी दिखा है। एक्स-मिल चीनी की कीमतों में लगभग 5 रुपए प्रति किलो की गिरावट आई है लेकिन आम जनता को राहत मिलने में अभी समय लगेगा। ब्राजील से आने वाली कच्ची चीनी को मिलों में रिफाइन करके बाजार में उतारना होगा। और तब तक नया पेराई सीजन (15 अक्टूबर के आसपास) शुरू हो जाएगा। जिससे अक्टूबर अंत तक 10-12 लाख टन अतिरिक्त चीनी बाजार में आने की उम्मीद है। सवाल यह है कि जब चीनी संकट साफ दिख रहा था तो उत्पादन अनुमानों में इतनी बड़ी चूक क्यों हुई?और इथेनॉल के लिए खाद्य सुरक्षा को कितना दांव पर लगाया जा सकता है? जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते। जनता का गुस्सा और महंगाई दोनों बढ़ती रहेगी। (Photos Courtesy Social media and AI)

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