*सदी का सबसे बड़ा भू-राजनीतिक बदलाव: एक कमजोर नक्शे से दुनिया की महाशक्ति बनने तक की आधुनिक चीन की कहानी*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई

*सदी का सबसे बड़ा भू-राजनीतिक बदलाव: एक कमजोर नक्शे से दुनिया की महाशक्ति बनने तक की आधुनिक चीन की कहानी*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई


(मुंबई /रिपोर्ट स्पर्श देसाई )सन 1900 के दशक की शुरुआत का चीन देखें तो तब वो छोटा, कमज़ोर और बँटा हुआ था फिर साल 1947 में उत्तर में इनर मंगोलिया शामिल हुआ। दो साल बाद साल 1949 में मंचूरिया उत्तर-पूर्व में शामिल हुआ। उसी साल शिनजियांग जिसे कभी पूर्वी तुर्किस्तान कहा जाता था उसे पश्चिम में जोड़ा गया और दक्षिण में युन्नान को भी मिला दिया गया फिर साल 1950 में तिब्बत को दक्षिण-पश्चिम से लाया गया और साल 1997 में हांगकांग को ब्रिटेन से वापस कर दिया गया। इस तरह चीन मैप पर बढ़ा। दरअसल सन 1900 के दशक की शुरुआत का चीन आज के विशालकाय देश से बिल्कुल अलग था। उस समय का चीन आंतरिक संघर्षों में उलझा,कमजोर और कई हिस्सों में बंटा हुआ था लेकिन बीतते समय के साथ चीन ने न केवल अपनी भौगोलिक सीमाओं का विस्तार किया बल्कि आर्थिक,औद्योगिक और राजनीतिक मोर्चे पर भी पूरी दुनिया का रुख बदल दिया। आईए जानते हैं चीन के भौगोलिक विस्तार से लेकर उसके वैश्विक महाशक्ति बनने तक का पूरा विवरण। 



भौगोलिक विस्तार की कहानी (नक्शे का विकास) के मद्देनजर साल 1947 (इनर मंगोलिया) को उत्तर में इस बड़े क्षेत्र को शामिल कर चीन ने अपनी सीमाएं मजबूत कीं। साल 1949 मंचूरिया और शिनजियांग को उत्तर-पूर्व में संसाधन संपन्न मंचूरिया को जोड़ा गया। इसी साल पश्चिम में 'पूर्वी तुर्किस्तान' कहे जाने वाले शिनजियांग और दक्षिण में युन्नान को मिलाया गया। साल 1950 (तिब्बत) दक्षिण-पश्चिम के रणनीतिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण तिब्बत क्षेत्र को चीन के नियंत्रण में लाया गया। साल 1997 (हांगकांग) ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की समाप्ति के बाद हांगकांग की चीन में वापसी हुई। 














जिसने इसके वैश्विक व्यापार को नई उड़ान दी। इसी जनसंख्या का विस्फोट हुआ और नियंत्रण रखने की हिलचाल भी हुई। कामगारों की फौज के मद्देनजर 1.4 अरब से अधिक की आबादी के साथ चीन ने दशकों तक अपनी विशाल जनसंख्या को एक सस्ते और कुशल कार्यबल (Labor Force) के रूप में इस्तेमाल किया। जनसांख्यिकीय बदलाव को लेकर 'वन चाइल्ड पॉलिसी' के कड़े क्रियान्वयन के बाद चीन की आबादी अब स्थिरता और बुढ़ापे की ओर बढ़ रही है, जिससे निपटने के लिए अब सरकार तीन बच्चों की नीति को बढ़ावा दे रही है। ऐसे में दिखाया आर्थिक चमत्कार (जीडीपी और बिजनेस)। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया चीन। वर्तमान में चीन की जीडीपी (Nominal GDP) लगभग 18-19 ट्रिलियन डॉलर के पार है। 



जो अमेरिका के बाद दुनिया में दूसरे नंबर पर है। वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब भी बन गया। चीन को ''दुनिया की फैक्ट्री''कहा जाता है। इलेक्ट्रॉनिक्स,कपड़े,मशीनरी से लेकर स्मार्टफोन और ईवी (इलेक्ट्रिक व्हीकल्स) तक दुनिया का एक बड़ा व्यापार चीन के उत्पादन पर निर्भर है। सप्लाई चेन पर कब्जे के मद्देनजर शंघाई और शेन्ज़ेन जैसे शहर दुनिया के सबसे व्यस्त व्यापारिक और तकनीकी केंद्र बन चुके हैं। 



उनकी राजनीतिक और सैन्य शक्ति जाने तो
एकदलीय शासन व्यवस्था के हिसाब से चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के नियंत्रण में चीन की नीतियां बेहद केंद्रित और दीर्घकालिक होती हैं। जिससे देश में कड़े फैसले तुरंत लागू होते हैं। ग्लोबल इन्फ्रास्ट्रक्चर (BRI) के मद्देनजर ''बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव'' (BRI) के जरिए चीन एशिया,अफ्रीका और यूरोप के दर्जनों देशों में बुनियादी ढांचे का विकास कर अपना राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव बढ़ा रहा है। आधुनिक सैन्य ताकत के हिसाब से पीपल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) आज दुनिया की सबसे बड़ी और अत्याधुनिक सेनाओं में से एक है। जिसके पास परमाणु क्षमता और मजबूत नौसेना है।
अन्य महत्वपूर्ण जानकारियां (तकनीक और अंतरिक्ष) में जाने तो तकनीकी आत्मनिर्भरता को लेकर चीन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), 5G नेटवर्क और सुपरकंप्यूटर के मामले में अमेरिका को कड़ी टक्कर दे रहा है। 



अंतरिक्ष में भी धाक जमाई। चीन ने अपना खुद का अंतरिक्ष स्टेशन ''तिआंगोंग'' स्थापित किया है और चंद्रमा व मंगल अभियानों में बड़ी सफलताएं हासिल की हैं। चीन के विकास से जुड़े कुछ बेहद महत्वपूर्ण और खास पहलुओं पर नज़र डाले त़ो जो आज की तारीख में पूरी दुनिया की राजनीति और बाज़ार को प्रभावित कर रहे हैं। इसे समझने के लिए मुख्य रूप से उनके टेक और ईवी (EV) मार्केट और पड़ोसी देशों के साथ उनके संबंधों को देखते हैं तो टेक और इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) मार्केट में चीन का दबदबा है। चीन ने पिछले कुछ सालों में खुद को सिर्फ एक"मैन्युफैक्चरिंग हब"से बदलकर एक"इन्नोवेशन लीडर"बना लिया है। इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) की दुनिया का राजा है । BYD जैसी चीनी कंपनियों ने एलन मस्क की टेस्ला (Tesla) को कड़ा मुकाबला दिया है। दुनिया की लगभग 60% से अधिक इलेक्ट्रिक कारें अब चीन में बनती और बिकती हैं। बैटरी सप्लाई पर एकाधिकार को लेकर बात करें तो ईवी कारों की जान उसकी लिथियम-आयन बैटरी होती है। 



चीन की CATL जैसी कंपनियां पूरी दुनिया की आधी से ज्यादा ईवी बैटरी की सप्लाई को अकेले नियंत्रित करती हैं। सस्ता और एडवांस इंफ्रास्ट्रक्चर के मद्देनजर चीन में ईवी चार्जिंग स्टेशनों का इतना बड़ा जाल है कि वहां आम लोगों के लिए इलेक्ट्रिक गाड़ी रखना पेट्रोल गाड़ी से कहीं ज्यादा आसान और सस्ता हो चुका है। स्मार्टफोन और 5G/6G तकनीक के हिसाब से हुआवेई (Huawei) और शाओमी (Xiaomi) जैसी कंपनियों के दम पर चीन ने दूरसंचार और एडवांस्ड 5G/6G टेक्नोलॉजी में अमेरिका को पीछे छोड़ दिया है। अब देखें कि पड़ोसी देशों के साथ संबंध और सीमा विवाद के सवालों को। चीन का अपनी सीमाओं को लेकर रवैया हमेशा से आक्रामक रहा है। जिसके कारण उसके लगभग सभी पड़ोसियों के साथ रिश्ते तनावपूर्ण हैं। भारत के साथ संबंध के मद्देनजर भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर लंबे समय से तनाव है। लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश की सीमाओं पर दोनों सेनाएं आमने-सामने रहती हैं। आर्थिक रूप से भारत,चीन पर अपनी निर्भरता (विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मा सामग्री में) को कम करने की लगातार कोशिश कर रहा है। इसमें ताइवान का मुद्दा भी अहम है। चीन ताइवान को अपना एक अलग हिस्सा मानता है और इसे "एक चीन नीति"(One China Policy) के तहत मुख्य भूमि में मिलाने की बात करता है। यह इलाका इस समय दुनिया का सबसे बड़ा भू-राजनीतिक फ्लैशपॉइंट (तनाव का केंद्र) बना हुआ है। 



साउथ चाइना सी (दक्षिण चीन सागर) को लेकर चीन इस पूरे समुद्री क्षेत्र पर अपना दावा ठोकता है। जिससे वियतनाम,फिलीपींस, मलेशिया और ब्रुनेई जैसे छोटे देशों के साथ उसका सीधा टकराव है। इस समुद्री रास्ते से दुनिया का अरबों डॉलर का व्यापार गुजरता है। पाकिस्तान के साथ आर्थिक गलियारे (CPEC) के मद्देनजर पाकिस्तान के साथ चीन के संबंध बेहद मजबूत हैं।''चाइना- पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर''(CPEC) के जरिए चीन अरबों डॉलर का निवेश कर पाकिस्तान के रास्ते अरब सागर तक अपनी सीधी पहुंच बना रहा है।
दौरान विशेष वित्तीय रिपोर्ट के मुताबिक भारत-चीन व्यापार संतुलन और चीन का ऐतिहासिक रियल एस्टेट संकट जाने तो चीनी अर्थव्यवस्था के भू-राजनीतिक और तकनीकी विस्तार के पीछे दो ऐसे महत्वपूर्ण पहलू हैं, जो वर्तमान वैश्विक और क्षेत्रीय बाज़ारों की दिशा तय कर रहे हैं। पहला है भारत और चीन के बीच बढ़ता व्यापारिक असंतुलन और दूसरा है चीन के घरेलू बाज़ार को अंदर से खोखला कर रहा उसका रियल एस्टेट संकट। इन दोनों गंभीर विषयों का विस्तृत और डेटा-आधारित विश्लेषण के हिसाब से भारत-चीन आर्थिक संबंध को देखते हुए बढ़ता व्यापार घाटा (Trade Deficit)। भारत सरकार के आत्म-निर्भरता के प्रयासों और सीमाओं पर चल रहे भारी सैन्य गतिरोध के बावजूद आर्थिक मोर्चे पर भारत की चीनी आयात पर निर्भरता लगातार बनी हुई है।



 रिकॉर्ड तोड़ आयात के हिसाब से वित्त वर्ष 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार भारत ने चीन से लगभग 131.7 अरब डॉलर मूल्य के सामान का आयात किया है। यह भारत के कुल वैश्विक आयात का लगभग 17% हिस्सा है। 155% उछाल और व्यापार घाटे पर एक नजर डालें तो पिछले पांच वर्षों में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा (Trade Deficit) 155% से अधिक बढ़ चुका है। भारत,चीन को मुख्य रूप से कच्चा माल जैसे पेट्रोलियम उत्पाद और लौह अयस्क निर्यात करता है। जबकि बदले में वहां से भारी मात्रा में फिनिश्ड गुड्स (तैयार माल) खरीदता है।  अब देखें कि किन क्षेत्रों में है भारत की निर्भरता? इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी को लेकर भारत के कुल चीनी आयात का 55% से अधिक हिस्सा केवल इलेक्ट्रिकल मशीनरी,मोबाइल/टेलीकॉम कंपोनेंट्स और मैकेनिकल उपकरणों का है (~$75.9 अरब)। फार्मास्युटिकल्स (दवाइयाँ) के मद्देनजर भारतीय दवा उद्योग की जान कहे जाने वाले''एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स'' (APIs या कच्चा माल) के लिए भारत आज भी पूरी तरह चीनी ऑर्गेनिक केमिकल्स पर निर्भर है। ईवी और ऑटो कंपोनेंट्स के हिसाब से भारत में तेजी से बढ़ते इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) बाज़ार के कारण ऑटो पार्ट्स के आयात में चीन की हिस्सेदारी बढ़कर 36% हो गई है क्योंकि बैटरी और एडवांस इलेक्ट्रॉनिक्स का उत्पादन बड़े पैमाने पर चीन में ही होता है।


चीन के रियल एस्टेट संकट को लेकर अर्थव्यवस्था की सबसे कमजोर नस (Property Crisis) है। चीन की कुल घरेलू संपत्ति का लगभग 70% हिस्सा वहां के लोगों ने जमीन और मकानों (रियल एस्टेट) में निवेश कर रखा था। लेकिन आज यही सेक्टर चीनी अर्थव्यवस्था के लिए ''टाइम बम'' बन चुका है। संकट की शुरुआत (Evergrande और ''थ्री रेड लाइन्स'') साल 2020-21 में चीनी सरकार ने रियल एस्टेट कंपनियों के अत्यधिक कर्ज लेने पर रोक लगाने के लिए कड़े नियम ('थ्री रेड लाइन्स' नीति) लागू किए। इसके तुरंत बाद देश की सबसे बड़ी बिल्डर कंपनी एवरग्रैंड (Evergrande) और उसके बाद कंट्री गार्डन (Country Garden) खरबों डॉलर के कर्ज में डूब गईं और डिफ़ॉल्ट कर गईं। लाखों अधूरे घर और ''घोस्ट टाउन्स''के मद्देनजर चीन के टियर-3 और टियर-4 शहरों में बिल्डरों ने पैसे लेकर काम बीच में ही छोड़ दिया। एक अनुमान के मुताबिक चीन में इस समय लगभग 8 करोड़ (80 मिलियन) घर खाली या अधूरे पड़े हैं। जिन्हें खरीदने वाला कोई नहीं है। 40% से 50% तक गिरी कीमतों के हिसाब से लगातार पांचवें साल भी प्रॉपर्टी की कीमतें लगातार गिर रही हैं। कई शहरों में रीसेल होम की कीमतें साल 2016 के स्तर से भी नीचे जा चुकी हैं। जिससे चीनी नागरिकों की जीवन भर की जमा-पूंजी और वेल्थ (Household Wealth) लगभग खत्म हो गई है। स्थानीय सरकारों के कर्ज संकट को लेकर चीन में स्थानीय प्रांतीय सरकारें अपनी कमाई के लिए सरकारी जमीनों की नीलामी (Land Auctions) पर निर्भर थीं। रियल एस्टेट ठप होने से ये स्थानीय सरकारें अब खरबों डॉलर के कर्ज में डूब चुकी हैं और वहां की अर्थव्यवस्था मंदी (Deflation) और भारी बेरोजगारी के चक्रव्यूह में फंस गई है इसलिए बदलते हुए मॉडल को लेकर अब चीनी सरकार इस डूबते सेक्टर को पूरी तरह बेल-आउट (पैसा देकर बचाने) करने के बजाय इसके पुराने ''हाई-डेट, हाई-टर्नओवर''मॉडल को खत्म कर रही है ताकि अर्थव्यवस्था को प्रॉपर्टी के बजाय हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग और ईवी सेक्टर की तरफ मोड़ा जा सके।
(Photos Courtesy Social media and AI)

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