*आइसोब्यूटेनॉल:डीज़ल का नया विकल्प,जिसे अपनाने की तैयारी में भारत सरकार*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई

*आइसोब्यूटेनॉल:डीज़ल का नया विकल्प,जिसे अपनाने की तैयारी में भारत सरकार*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई 


( मुंबई/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई)पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने (E20) के बाद अब सरकार डीज़ल में बड़ा बदलाव करने की योजना बना रही है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने हाल ही में घोषणा की है कि सरकार डीज़ल में 15% तक आइसोब्यूटेनॉल (Isobutanol) मिलाने की अनुमति देने की दिशा में काम कर रही है। इस कदम का उद्देश्य कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना और स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देना है। क्या है आइसोब्यूटेनॉल? उसे रासायनिक भाषा में जाने तो आइसोब्यूटेनॉल (Isobutanol), जिसे रासायनिक भाषा में 2-मिथाइलप्रोपेन-1-ऑल (2-methylpropan-1-ol) भी कहा जाता है। 


एक कार्बनिक यौगिक है। इसका रासायनिक सूत्र (CH₃)₂ CHCH₂OH है। यह एक रंगहीन, ज्वलनशील तरल है जिसमें एक विशिष्ट गंध होती है। यह ब्यूटेनॉल (ब्यूटाइल अल्कोहल) की चार संरचनात्मक समावयवी (isomers) अवस्थाओं में से एक है। आमतौर पर इसका उपयोग विलायक (solvent) के रूप में किया जाता है लेकिन अब इसकी उच्च ऊर्जा क्षमता और बेहतर ईंधन गुणों के कारण इसे अगली पीढ़ी के बायोफ्यूल के रूप में देखा जा रहा है। कैसे बनता है आइसोब्यूटेनॉल? वह देखें तो आइसोब्यूटेनॉल को एथेनॉल (इथाइल अल्कोहल) से बनाया जा सकता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि एथेनॉल को सीधे डीज़ल में नहीं मिलाया जा सकता लेकिन आइसोब्यूटेनॉल को डीज़ल के साथ आसानी से मिलाया जा सकता है। इसे बनाने की प्रक्रिया जाने तो यह जैव- आधारित उत्पादन हैं । 


इसे बायोमास (कृषि अवशेष,लिग्नोसेल्युलोसिक पदार्थ) या एथेनॉल से किण्वन (fermentation) प्रक्रिया के माध्यम से बनाया जाता है। उन्नत तकनीक के मद्देनजर वैज्ञानिक एथेनॉल को आइसोब्यूटेनॉल में बदलने की तकनीक पर काम कर रहे हैं ताकि इसे डीज़ल के साथ प्रभावी रूप से मिलाया जा सके। नितिन गडकरी ने बताया कि मंत्रालय ने 100% एथेनॉल और 100% आइसोब्यूटेनॉल पर दो जनरेटर सेट सफलतापूर्वक चलाए हैं। जिससे यह साबित होता है कि इन ईंधनों पर चलने वाले इंजन बनाए जा सकते हैं। डीज़ल में मिलाने के फायदे व लाभ विवरण जाने तो उच्च ऊर्जा घनत्व एथेनॉल की तुलना में अधिक ऊर्जा क्षमता, जिससे बेहतर माइलेज मिलता है। कम उत्सर्जन पारंपरिक जीवाश्म ईंधन की तुलना में कम कार्बन उत्सर्जन। कम जल अवशोषण एथेनॉल की तुलना में कम पानी सोखता है। जिससे भंडारण और परिवहन आसान है। कम वाष्पशीलता एथेनॉल की तुलना में कम अस्थिर,अधिक सुरक्षित। सीधा मिश्रण डीज़ल में आसानी से मिल जाता है। अलग इंजन की आवश्यकता नहीं। ऊर्जा सुरक्षा कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करता है।

 पर्यावरण अनुकूल नवीकरणीय स्रोतों से बनता है। पर्यावरण पर कम बोझ। नुकसान व चुनौती का विवरण देखें तो उत्पादन लागत वर्तमान में पारंपरिक डीज़ल की तुलना में महंगा हो सकता हैं। जल की खपत उत्पादन प्रक्रिया में पानी की खपत होती है। बुनियादी ढाँचा बड़े पैमाने पर उत्पादन और वितरण के लिए नई व्यवस्था की आवश्यकता होती है। इंजन अनुकूलता पुराने डीज़ल इंजनों पर प्रभाव का अध्ययन जारी है। किण्वन प्रक्रिया फर्मेंटेशन ब्रोथ में 98% से अधिक पानी होता है। जिससे निष्कर्षण जटिल है। पानी की खपत यानि कितना पानी चाहिए? उस पर ध्यान दें तो आइसोब्यूटेनॉल के उत्पादन में पानी की खपत एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। एक अध्ययन के अनुसार गौर करें तो ईंधन जल खपत (गैलन प्रति GGE),एथेनॉल 8.19 gal/GGE,आइसोब्यूटेनॉल 8.98 gal/GGE औरn-ब्यूटेनॉल 10.84 gal/GGE। GGE = गैसोलीन गैलन समतुल्य (Gasoline Gallon Equivalent) हालाँकि वैज्ञानिक पानी की माँग कम करने के लिए नई तकनीकों पर काम कर रहे हैं। एक आशाजनक विकल्प समुद्री जल का उपयोग है। जो उत्पादन में ताजे पानी और ट्रेस खनिजों की आवश्यकता को कम कर सकता है। इसको लेकर विकिपीडिया क्या कहता है? वह जाने तो विकिपीडिया के अनुसार देखें तो आइसोब्यूटेनॉल यानि IUPAC नाम 2-मिथाइलप्रोपेन-1-ऑल। एक कार्बनिक यौगिक है। जिसका सूत्र (CH₃)₂ CHCH₂ OH है। यह एक रंगहीन,ज्वलनशील तरल है। जिसमें एक विशिष्ट गंध होती है। इसका मुख्य उपयोग विलायक के रूप में होता है। इसके समावयवी 1-ब्यूटेनॉल, 2-ब्यूटेनॉल और टर्ट-ब्यूटेनॉल हैं। जो सभी औद्योगिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। विकिपीडिया इसके ईंधन योजक (fuel additive) के रूप में उपयोग का भी उल्लेख करता है। सरकार की योजना के मुताबिक क्या है पूरा प्लान? केंद्र सरकार डीज़ल में 15% आइसोब्यूटेनॉल मिश्रण की अनुमति देने की योजना बना रही है। इस योजना की प्रमुख बातें देखें तो पायलट ट्रायल के हिसाब से टाटा मोटर्स 2% आइसोब्यूटेनॉल मिश्रण के साथ वाणिज्यिक वाहनों का पायलट ट्रायल शुरू करेगी। यह ट्रायल वित्त वर्ष 2027 की दूसरी तिमाही में शुरू होने की उम्मीद है। 


इसकी अनिवार्यता के मद्देनजर सड़क परिवहन सचिव वी उमाशंकर ने कहा कि डीज़ल में आइसोब्यूटेनॉल मिश्रण को अनिवार्य करने का आदेश इसी साल आ सकता है। उद्देश्य के मद्देनजर भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता बढ़ाना और कार्बन उत्सर्जन कम करना। इसका प्रभाव भारत पेट्रोल की तुलना में लगभग दोगुना डीज़ल की खपत करता है इसलिए डीज़ल में मिश्रण का अधिक प्रभाव होगा। आगे की राह के मद्देनजर उसकी चुनौतियाँ और संभावनाएँ देखें तो सबसे पहले उसका सकारात्मक पहलू पर नजर डालें जनरेटर पर सफल परीक्षण। पायलट प्रोजेक्ट के उत्साहजनक परिणाम और E20 पेट्रोल की सफलता के बाद मिला अनुभव। इसके लिए चुनौतियाँ देखें तो बड़े पैमाने पर उत्पादन की लागत। जल संसाधनों पर दबाव। मौजूदा डीज़ल इंजनों के साथ अनुकूलता और वितरण बुनियादी ढाँचे का विकास। आइसोब्यूटेनॉल भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है हालाँकि इसके बड़े पैमाने पर कार्यान्वयन से पहले उत्पादन लागत,जल खपत और बुनियादी ढाँचे से जुड़ी चुनौतियों का समाधान करना होगा। सरकार और उद्योग जगत के सहयोग से यह तकनीक आने वाले वर्षों में भारत के ईंधन परिदृश्य को बदल सकती है।(Photos Courtesy Social media and AI)

~ब्यूरो रिपोर्ट स्पर्श देसाई √•Metro City Post• Digital World• #Isobutanol #DieselBlending #NitinGadkari #Biofuel #CleanEnergy #EnergySecurity #IndiaEnergy #GreenFuel #AlternativeFuel #SustainableIndia

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