*ब्रह्मांड की शैशवावस्था में झाँकता यूक्लिड: 67 करोड़ वर्ष पुराने दो 'दानव' क्वासरों की खोज ने ब्लैक होल निर्माण के सिद्धांतों को किया चुनौतीपूर्ण*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
*ब्रह्मांड की शैशवावस्था में झाँकता यूक्लिड: 67 करोड़ वर्ष पुराने दो 'दानव' क्वासरों की खोज ने ब्लैक होल निर्माण के सिद्धांतों को किया चुनौतीपूर्ण*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
(मुंबई/रिपोर्ट स्पर्श देसाई)वैज्ञानिकों ने सबसे पुराने क्वासर खोजे। जिससे स्पेस का एक और बड़ा रहस्य गहरा गया। यूरोपियन स्पेस एजेंसी के यूक्लिड टेलिस्कोप ने अब तक खोजे गए सबसे पुराने 31 क्वासर खोजे हैं। जिनमें से दो ऐसे हैं जो उस समय के हैं जब यूनिवर्स सिर्फ़ 670 मिलियन साल पुराना था। इस खोज ने यह सवाल और खड़ा कर दिया है कि सुपरमैसिव ब्लैक होल इतनी तेज़ी से कैसे बने!?यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) के अत्याधुनिक यूक्लिड स्पेस टेलिस्कोप ने एक ऐसी खोज की है जिसने खगोल भौतिकीविदों को एक साथ उत्साहित और हैरान कर दिया है। टेलिस्कोप ने अपने प्रथम गहन अंतरिक्ष सर्वेक्षण में अब तक ज्ञात 31 सबसे प्राचीन क्वासरों का पता लगाया है।
्यहां "क्वासर" (Quasar) शब्द का अर्थ है''अर्ध-तारकीय रेडियो स्रोत''(Quasi-Stellar Radio Source) होता हैं। यह नाम साल 1960 के दशक में इन वस्तुओं की खोज के समय दिया गया था क्योंकि दूरबीन में देखने पर ये सामान्य तारों (सितारों) की तरह एक बिंदु जैसे दिखते थे लेकिन वास्तव में ये तारे नहीं बल्कि अत्यंत चमकीले खगोलीय पिंड हैं। इसमें क्वासर की मुख्य विशेषताएं देखें तो अत्यधिक चमक। ये ब्रह्मांड की सबसे चमकीली वस्तुओं में से हैं। एक क्वासर पूरी मिल्की वे आकाशगंगा से हज़ारों गुना अधिक प्रकाश उत्सर्जित कर सकता है। इसमें ऊर्जा का स्रोत देखें तो इसकी ऊर्जा एक अतिविशालकाय ब्लैक होल (Supermassive Black Hole) से आती है। जो आकाशगंगा के केंद्र में स्थित होता है। इस ब्लैक होल पर गैस और धूल गिरती है। जिससे भारी मात्रा में ऊर्जा निकलती है। अब दूरस्थ पिंड के बारे में जाने तो क्वासर अत्यंत दूर स्थित होते हैं और इन्हें ब्रह्मांड के शुरुआती दौर का अध्ययन करने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। अब यूक्लिड ने 67 करोड़ साल पुराने दो क्वासर खोजे गए हैं। ये इतने दूर हैं कि हम उन्हें उस समय की स्थिति में देख रहे हैं। जब ब्रह्मांड बहुत छोटा था। इनकी खोज ब्लैक होल के निर्माण के मौजूदा सिद्धांतों को चुनौती देती है क्योंकि इतने कम समय में इतने विशाल ब्लैक होल का बनना मुश्किल माना जाता था। इनमें से दो क्वासर इतने दूर हैं कि उनका प्रकाश हम तक उस समय से आ रहा है। जब ब्रह्मांड मात्र 67 करोड़ वर्ष का एक शिशु था। यह खोज ब्रह्मांड विज्ञान के एक केंद्रीय प्रश्न को और पेचीदा बना देती है।
इतने विशालकाय ब्लैक होल इतनी जल्दी कैसे बन गए?क्वासर और ब्रह्मांडीय समय की पहेली को समझे तो क्वासर जिन्हें''अर्ध-तारकीय रेडियो स्रोत''भी कहा जाता है। सुदूर आकाशगंगाओं के अत्यंत चमकीले और ऊर्जावान केंद्रक हैं। ये किसी आम तारे की तरह दिखते हैं लेकिन इनकी चमक पूरी आकाशगंगा के सैकड़ों अरबों तारों की संयुक्त चमक से भी हजारों गुना अधिक होती है। इस ऊर्जा का स्रोत एक सुपरमैसिव ब्लैक होल है जो भारी मात्रा में गैस और धूल को निगल रहा होता है, जिससे एक अभिवृद्धि चक्र (accretion disk) बनता है। इस चक्र में पदार्थ के प्रचंड घर्षण और गुरुत्वाकर्षण से वह अकल्पनीय तापमान तक गर्म हो जाता है। जिससे प्रकाश और विकिरण का प्रस्फुटन होता है। अब समस्या यह है कि खोजे गए ये दो नए क्वासर ब्रह्मांड के''कॉस्मिक डॉन''(ब्रह्मांडीय प्रभात) के अंतिम चरण के हैं। जब पहली आकाशगंगाएँ और तारे बन रहे थे। इनके केंद्र में मौजूद ब्लैक होल का द्रव्यमान सूर्य से लगभग एक अरब गुना तक आंका गया है। शास्त्रीय भौतिकी कहती है कि ब्लैक होल को एक सीमित दर से ही पदार्थ खाकर बढ़ना चाहिए। जिसे ''एडिंगटन सीमा''कहते हैं। इस हिसाब से एक तारकीय-द्रव्यमान वाले ब्लैक होल जो किसी विशाल तारे की मृत्यु से बनता है। उसको एक अरब सौर द्रव्यमान तक पहुंचने में अरबों वर्ष लग जाने चाहिए थे लेकिन ये क्वासर तब ही अस्तित्व में थे। जब ब्रह्मांड को बने हुए 67 करोड़ वर्ष भी नहीं हुए थे। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे किसी नवजात शिशु को दस फुट लंबा और साढ़े तीन सौ किलो वजनी पाया जाए। यूक्लिड का अनूठा योगदान और विस्तारित रहस्य को लेकर यूक्लिड टेलिस्कोप को मुख्य रूप से ब्रह्मांड के अदृश्य 95% हिस्से"डार्क मैटर और डार्क एनर्जी"का त्रि-आयामी मानचित्र बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया है लेकिन इसका विशाल दृश्य क्षेत्र और बेजोड़ संवेदनशीलता इसे दुर्लभ और धुंधली खगोलीय वस्तुओं का एक कुशल खोजी बनाती है।
जहाँ जेम्स वेब स्पेस टेलिस्कोप (JWST) एक अति-सूक्ष्मदर्शी की भाँति अंतरिक्ष के एक सूक्ष्म बिंदु का गहन अध्ययन करता है। वहीं यूक्लिड एक चौड़े-कोण लेंस की तरह विशाल आकाशीय पट्टियों का सर्वेक्षण कर ब्रह्मांडीय जनसंख्या का एक व्यापक चित्र प्रस्तुत करता है। यही क्षमता इसे प्राचीन क्वासरों जैसी दुर्लभ वस्तुओं की खोज के लिए आदर्श बनाती है। यहाँ एक और पहेली जुड़ जाती है। ये क्वासर जिस तीव्रता से चमक रहे हैं। इसका अर्थ है कि उनके ब्लैक होल बहुत ही कम समय में असाधारण दक्षता के साथ पदार्थ का भक्षण कर रहे थे। इस प्रक्रिया की व्याख्या के लिए वैज्ञानिक अब पारंपरिक सिद्धांतों से हटकर सोचने को मजबूर हैं। तीन मुख्य संभावित समाधान उभर कर आते हैं। प्रत्यक्ष पतन ब्लैक होल (Direct Collapse Black Hole) पर एक नजर डालें तो यह सिद्धांत कहता है कि प्रारंभिक ब्रह्मांड में हाइड्रोजन और हीलियम के विशालकाय,आदिम गैस बादल बिना तारों में टूटे,सीधे अपने ही गुरुत्वाकर्षण से ढहकर लाखों सौर द्रव्यमान वाले''बीज''ब्लैक होल बना सकते थे। यह एक तारकीय ब्लैक होल से शुरू होने की तुलना में काफी तेज़ प्रक्रिया हो सकती थी। जनसंख्या- III के अतिविशाल तारे (Population III Stars) के मद्देनजर ब्रह्मांड के सबसे पहले तारे जो पूर्णतः हाइड्रोजन-हीलियम से बने थे। आज के तारों की तुलना में सैकड़ों गुना अधिक विशाल रहे होंगे। इनकी मृत्यु के बाद बने ब्लैक होल भी कहीं अधिक बड़े होते और फिर वे तेज़ी से विलय कर सकते थे। अति- एडिंगटन अभिवृद्धि (Super-Eddington Accretion) को लेकर ऐसे भौतिक परिदृश्य भी संभव हैं जिनमें एक ब्लैक होल अस्थायी रूप से अपनी एडिंगटन सीमा से कई गुना अधिक तेज़ी से पदार्थ निगल सकता है।
जिससे उसका विकास अप्रत्याशित रूप से तीव्र हो जाता है। यह खोज एक बात तो स्पष्ट करती है कि ब्रह्मांड के शुरुआती युग जिसे ''पुनःआयनीकरण का युग''(Epoch of Reionization) कहते हैं। उसके बारे में हमारी वर्तमान समझ अधूरी है। यूक्लिड और JWST का मिलाजुला डेटा अब वैज्ञानिकों को इन क्वासरों के आस-पास की गैस का स्पेक्ट्रोस्कोपी द्वारा विश्लेषण करने की अनुमति देगा। जिससे उनके निर्माण की परिस्थितियों और मेजबान आकाशगंगाओं पर उनके प्रभाव का सीधे पता चल सकेगा। इस खोज ने अंतरिक्ष के सबसे बड़े रहस्य को गहराने के बजाय उसे सुलझाने की दिशा में एक शक्तिशाली और केंद्रित मार्ग प्रशस्त कर दिया है।( Photos Courtesy Social media and AI)
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