*दिल्ली का कुतुब मीनार: 800 सालों का इतिहास,जो एक राजा नहीं बल्कि कई शासकों की देन है*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई

*दिल्ली का कुतुब मीनार: 800 सालों का इतिहास,जो एक राजा नहीं बल्कि कई शासकों की देन है*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई 


(मुंबई /रिपोर्ट स्पर्श देसाई)दिल्ली की शान कहे जाने वाले कुतुब मीनार को लेकर एक दिलचस्प तथ्य सामने आया है। यह विश्व धरोहर स्थल न सिर्फ अपनी बेहतरीन इंजीनियरिंग के लिए जाना जाता है बल्कि इसके निर्माण से जुड़ी कहानी भी काफी रोचक है।आम धारणा के विपरीत, इस विशाल मीनार को किसी एक राजा ने नहीं बनवाया बल्कि अलग-अलग शासकों ने मिलकर इसे आज का स्वरूप दिया। 



ताजमहल से भी छोटा है कुतुब मीनार। सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि 72.5 मीटर (लगभग 238 फीट) ऊंचा यह मीनार ताजमहल (73 मीटर) से पांच फीट छोटा है हालांकि यह दुनिया की सबसे ऊंची ईंटों से बनी मीनार है। निर्माण की कहानी में तीन शासक और पांच मंजिल। इस मीनार की नींव 1199 ईस्वी में दिल्ली सल्तनत के पहले सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक ने रखी थी। उन्होंने कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद के पास अपनी जीत का प्रतीक विजय स्तंभ बनाने की कल्पना की थी हालांकि ऐबक केवल पहली मंजिल ही बना पाए थे। 


उनके उत्तराधिकारी और दामाद इल्तुतमिश ने तीन और मंजिलें जोड़कर इसकी ऊंचाई बढ़ाई। इतिहास में एक भयानक मोड़ सन 1326 और फिर 1368 ईस्वी में आया। जब आसमान से बिजली गिरने से मीनार की चौथी मंजिल पूरी तरह तबाह हो गई। तब दिल्ली के तत्कालीन सुल्तान फिरोज शाह तुगलक ने इसकी मरम्मत कराई और पांचवीं मंजिल जोड़ी। उन्होंने इस मरम्मत में सफेद संगमरमर का इस्तेमाल किया। जो उस समय एक अनोखा प्रयोग था। अद्भुत इंजीनियरिंग और वास्तुकला का नमूना है। 328 फीट ऊंची और 379 सीढ़ियों वाली इस मीनार की वास्तुकला अद्भुत है। इसके पत्थरों पर लहराकार, वक्राकार घुमाव और जटिल नक्काशी है। 



विशेष बात यह है कि हर मंजिल की बनावट अलग है। पहली मंजिल पर गोल और तिकोने आकार दोनों के स्तंभ हैं। दूसरी मंजिल पर गोलाकार नक्काशी है। तीसरी मंजिल पर तिकोने आकार की बनावट है। इतिहास में एक और दिलचस्प प्रसंग तब आया जब अलाउद्दीन खिलजी ने कुतुब मीनार से भी ऊंची मीनार बनाने का सपना देखा। उन्होंने"अलाई मीनार"का निर्माण शुरू किया। जो इससे दोगुनी ऊंची होनी थी लेकिन सन 1316 में उनकी मृत्यु के बाद यह अधूरी रह गई।आज भी सीना ताने खड़ा है। कई भूकंपों और बिजली गिरने की घटनाओं को झेलने वाला यह मीनार आज भी हर पत्थर पर अपना इतिहास समेटे दिल्ली में सीना ताने खड़ा है। साल 1993 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया।( Photos Courtesy Social media and AI)

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