*भारत से 50 किमी दूर चीन का मेगा डैम:क्यों बढ़ गई वैज्ञानिकों की चिंता?*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
*भारत से 50 किमी दूर चीन का मेगा डैम:क्यों बढ़ गई वैज्ञानिकों की चिंता?*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
(मुंबई/रिपोर्ट स्पर्श देसाई) भारत से 50 किलोमीटर दूर बन रहे मेगा डैम को लेकर चीन के वैज्ञानिक क्यों हैं चिंतित? उसकी वजह जाने तो चाइना जियोलॉजिकल सर्वे के अध्ययन के मुताबिक भारत-चीन सीमा से 50-किलोमीटर दूर ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन सक्रिय पैझेन फॉल्ट लाइन के ऊपर"मेदोग डैम"बना रहा है। साल 2017 में तिब्बत में 6.9 तीव्रता का जो भूकंप आया था वह इसी फॉल्ट लाइन से आया था। डैम में पानी भरने पर धरती के अंदर उसका रिसाव होगा तो पकड़ ढीली होगी। भूकंप आने पर भूस्खलन और पहाड़ों के ढहने से डैम के टूटने का खतरा पैदा होगा जिससे भारत को नुकसान होगा। दरअसल चीन द्वारा ब्रह्मपुत्र नदी तिब्बत में जिसे "यारलुंग सांगपो नदी" कहते हैं उस पर दुनिया का सबसे बड़ा जलविद्युत परियोजना शुरू करने के बाद वैज्ञानिक समुदाय में चिंता की लहर दौड़ गई है। यह विशाल डैम जिसकी क्षमता 60 गीगावॉट होगी और जो तीन गुना अधिक बिजली पैदा करेगा। भारत-चीन सीमा से मात्र 50 किलोमीटर दूर सक्रिय पैझेन फॉल्ट लाइन के ऊपर बन रहा है। चाइना जियोलॉजिकल सर्वे के अध्ययनों ने इस परियोजना को लेकर गंभीर चेतावनियाँ जारी की हैं। जिनका संबंध सीधे तौर पर भारत की सुरक्षा से जुड़ा है।
क्यों हैं वैज्ञानिक चिंतित? उस बात को समझे तो वैज्ञानिक चिंता के केंद्र में भूगर्भीय अस्थिरता और डैम की विशालता का खतरनाक संगम है। साल 2017 में तिब्बत में आए 6.9 तीव्रता के भूकंप का स्रोत यही पैझेन फॉल्ट लाइन थी। अब इसी सक्रिय भ्रंश रेखा पर बन रहे इस डैम में जब पानी भरा जाएगा तो उसका रिसाव धरती के अंदर होकर भूगर्भीय परतों को ढीला कर सकता है। जिससे बड़े भूकंप का खतरा और बढ़ जाएगा। भूकंप के साथ संभावित भूस्खलन और पहाड़ों के ढहने से डैम के टूटने की आशंका पैदा हो सकती है। जिसका सीधा खतरा भारत के असम और पूर्वोत्तर राज्यों पर होगा। यह क्षेत्र दुनिया के सबसे गतिशील नदी-तलछट प्रणालियों में से एक है। जहाँ प्रतिवर्ष 300-400 मिलियन टन तलछट बहती है। पर्यावरणीय और भू-राजनीतिक चुनौतियाँ के मद्देनजर यह परियोजना केवल भूकंपीय खतरे तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिकों को डर है कि नदी के प्रवाह को मोड़ने और तलछट को रोकने से ब्रह्मपुत्र की निचली धारा में पारिस्थितिकी तंत्र और लाखों लोगों की आजीविका पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।"रन-ऑफ-द-रिवर"कहे जाने वाले इस डैम में कम से कम एक बड़ा जलाशय शामिल है। जो नदी के 200 किलोमीटर लंबे हिस्से को आंशिक रूप से सूखा देगा।
भारत सरकार ने इस मुद्दे को चीन के साथ उठाया है और साल 2006 में स्थापित विशेषज्ञ स्तर की तंत्र के माध्यम से पारदर्शिता और हाइड्रोलॉजिकल डेटा साझा करने की मांग की है। साल 2019 के बाद से इस मुद्दे पर कोई औपचारिक बातचीत नहीं हुई है हालांकि जनवरी 2025 में दोनों देशों के बीच फिर से वार्ता शुरू करने पर सहमति बनी है । मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार चीन इस परियोजना पर लगभग 1.2 ट्रिलियन युआन यानि लगभग 167.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर खर्च करेगा । विशेषज्ञों का मानना है कि चीन को इस परियोजना की पर्यावरणीय आकलन रिपोर्ट और इंजीनियरिंग योजनाओं को सार्वजनिक करना चाहिए और डाउनस्ट्रीम देशों के साथ सहयोगात्मक शासन स्थापित करना चाहिए अन्यथा यह विशाल बाँध क्षेत्रीय तनाव और अविश्वास का एक बड़ा कारण बन सकता है।(Photos Courtesy Social media and AI)
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