*सल्तनत-ए-उस्मानिया का उत्थान और पतन: इतिहास का वो मोड़ जिसने बदल दी दुनिया की सियासत*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई

*सल्तनत-ए-उस्मानिया का उत्थान और पतन: इतिहास का वो मोड़ जिसने बदल दी दुनिया की सियासत*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई


( मुंबई/रिपोर्ट स्पर्श देसाई) इतिहास के पन्नों में कई साम्राज्यों का जिक्र मिलता है लेकिन ''ऑटोमन एम्पायर''यानि सल्तनत-ए-उस्मानिया का जिक्र आते ही एक ऐसे दौर की तस्वीर सामने आती है। जिसने सदियों तक दुनिया के नक्शे और सियासत को अपने इशारों पर नचाया। लगभग 623 सालों (सन 1299 से 1922) तक कायम रही। इस महान सल्तनत का प्रभाव इतना व्यापक था कि इसकी सीमाएं तीन महाद्वीपों यूरोप, एशिया और अफ्रीका के बड़े हिस्सों तक फैली हुई थीं। आज के आधुनिक दौर में जब मध्य पूर्व (मिडल ईस्ट) और वैश्विक राजनीति में उथल-पुथल दिखती है तो इतिहासकार अक्सर यह सवाल उठाते हैं कि अगर आज उस्मानिया साम्राज्य वजूद में होता तो दुनिया कैसी होती?तीन महाद्वीपों पर बादशाहत और सुल्तान अब्दुल हमीद का दौर। 



सल्तनत-ए-उस्मानिया के चरम काल में आज का तुर्की,सीरिया,इराक,फिलिस्तीन,जॉर्डन,सऊदी अरब,मिस्र (इजिप्त) और बाल्कन क्षेत्र (यूनान, बुल्गारिया आदि । ) इसके सीधे नियंत्रण या प्रभाव में थे। इसकी राजधानी इस्तांबुल यानि भूतपूर्व कॉन्स्टेंटिनोपल या कुस्तुनतुनिया वैश्विक व्यापार, संस्कृति और राजनीति का मुख्य केंद्र थी। 19वीं सदी के अंत में जब यह साम्राज्य आंतरिक और बाहरी मोर्चों पर कमजोर होने लगा। तब इसके आखिरी सबसे शक्तिशाली और कूटनीतिक शासकों में से एक सुल्तान अब्दुल हमीद द्वितीय  ने कमान संभाली। उन्होंने सन 1876 से  सन 1909 तक यानी 33 साल शासन किया। सुल्तान अब्दुल हमीद ने पश्चिमी ताकतों की साजिशों और आंतरिक विद्रोहों के बीच 'पैन-इस्लामवाद' की नीति अपनाकर साम्राज्य को एकजुट रखने की हर संभव कोशिश की। उन्होंने "हिजाज रेलवे"जैसी रणनीतिक परियोजनाएं शुरू कीं ताकि मुस्लिम जगत को जोड़ा जा सके लेकिन यूरोपीय शक्तियों की गिद्ध दृष्टि इस साम्राज्य के समृद्ध इलाकों पर टिकी हुई थी। प्रथम विश्व युद्ध और साम्राज्य का बिखरना प्रारंभ हुआ। सल्तनत को कमजोर करने के लिए यूरोपीय शक्तियों ने लगातार कूटनीतिक और सैन्य दबाव बनाए रखा। अंततः प्रथम विश्व युद्ध (साल 1914-1918) में ऑटोमन साम्राज्य ने एक रणनीतिक भूल करते हुए जर्मनी का साथ देने का फैसला किया। इस महायुद्ध में मित्र राष्ट्रों (ब्रिटेन, फ्रांस आदि) की जीत हुई और जर्मनी के साथ-साथ ऑटोमन साम्राज्य को भी करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। युद्ध के बाद सन 1920 की ''सेवर की संधि'' (Treaty of Sèvres) और बाद में ''लोसान की संधि'' के तहत इस विशाल साम्राज्य को पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर दिया गया। इसके क्षेत्रों को आपस में बांटकर मध्य पूर्व में नए देशों की कृत्रिम सीमाएं खींच दी गईं। जिसने आज के आधुनिक विवादों की नींव रखी। साल 1922 में सुल्तान का पद और साल 1924 में खिलाफत को आधिकारिक रूप से समाप्त कर दिया गया। जिसे मुस्लिम इतिहास का सबसे बड़ा राजनीतिक नुकसान माना जाता है। यदि आज जिंदा होती ''उस्मानिया सल्तनत'' तो कैसा होता विश्व का नक्शा?भू-राजनीतिक विश्लेषकों और इतिहासकारों का एक वर्ग यह मानता है कि अगर "सल्तनत-ए-उस्मानिया" का पतन न हुआ होता तो आज वैश्विक परिदृश्य बिल्कुल अलग होता। स्थिर मध्य पूर्व और फिलिस्तीन के मद्देनजर "उस्मानिया काल" में "यरूशलेम"और "फिलिस्तीन"के इलाके में विभिन्न धर्मों के लोग शांति से रहते थे। 



सुल्तान अब्दुल हमीद ने अपने दौर में फिलिस्तीन की जमीन को किसी भी बाहरी औपनिवेशिक ताकत को सौंपने से साफ इनकार कर दिया था। यदि यह साम्राज्य होता तो आज "फिलिस्तीन"  का वजूद पूरी तरह सुरक्षित होता और मध्य पूर्व को लहूलुहान करने वाले कई बड़े युद्ध और विवाद कभी पैदा ही नहीं होते। इस्तांबुल बनता वैश्विक केंद्र । आज जो हैसियत न्यूयॉर्क,लंदन या जिनेवा की है। वह इस्तांबुल की होती। यह दुनिया का सबसे बड़ा सियासी और व्यापारिक मरकज (Hub) बनकर उभरता। सुपरपावर के रूप में उभार के तौर पर देखें तो तीन महाद्वीपों के प्राकृतिक संसाधनोंविशेषकर तेल और प्रमुख समुद्री व्यापारिक मार्गों जैसे स्वेज नहर और बोस्फोरस जलडमरूमुध्य पर नियंत्रण होने के कारण यह साम्राज्य आज दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्तियों (Superpowers) में शुमार होता। जो पश्चिमी ताकतों के एकतरफा वर्चस्व को कड़ी चुनौती देता। (Photos Courtesy Social media)

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