*भारत के लिए सुरक्षा का बड़ा खतरा:कोको आइलैंड्स पर चीन की 'डिजिटल जासूसी'और कूटनीतिक भूल का सच*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
*भारत के लिए सुरक्षा का बड़ा खतरा:कोको आइलैंड्स पर चीन की 'डिजिटल जासूसी'और कूटनीतिक भूल का सच*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
(मुंबई/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई)बंगाल की खाड़ी के शांत नीले पानी के बीच स्थित''कोको आइलैंड्स'' (Coco Islands) आज भारत की सुरक्षा के लिए एक बड़े सिरदर्द बन चुके हैं। महज 55 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह टापू म्यांमार का हिस्सा है लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह चीन की ''जासूसी का अड्डा'' बनकर उभरा है। आइए समझते हैं कि कैसे एक कूटनीतिक निर्णय भारत के लिए रणनीतिक चिंता का कारण बन गया। एक ऐतिहासिक भूल देखें तो "कोको आइलैंड्स" म्यांमार के पास कैसे गए? वर्ष 1947 में भारत की आजादी के बाद "कोको आइलैंड्स" का प्रशासन ब्रिटिश औपनिवेशिक विरासत के तहत म्यांमार (तब बर्मा) को सौंप दिया गया था। तत्कालीन भारतीय नेतृत्व ने म्यांमार के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों को प्राथमिकता दी और इस भौगोलिक रूप से महत्वपूर्ण भू-भाग पर अपना दावा नहीं किया। उस समय शायद यह नहीं सोचा गया था कि भविष्य में यह स्थान भारत के खिलाफ''स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स'' (String of Pearls) रणनीति का एक महत्वपूर्ण मोहरा बन जाएगा।
चीन का सर्विलांस और मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर, सैटेलाइट तस्वीरों और रक्षा विशेषज्ञों के विश्लेषणों से पता चला है कि चीन ने "कोको आइलैंड्स"पर एक अत्याधुनिक सैन्य और खुफिया केंद्र विकसित किया है। उसका विस्तार और बुनियादी ढांचा देखें तो चीन ने इस द्वीप पर लगभग 2,300 मीटर लंबी रनवे का विस्तार किया है। जो भारी परिवहन विमानों और संभवतः लड़ाकू विमानों के संचालन में सक्षम है। इसके अलावा यहाँ बड़े रडार स्टेशन,संचार टॉवर और निगरानी उपकरण लगाए गए हैं। इसी दौरान निगरानी का दायरा जाने तो इस टापू से चीन भारत की सबसे संवेदनशील गतिविधियों पर नज़र रखता है। जैसे डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप ओड़िशा तट से होने वाले भारत के सभी मिसाइल परीक्षण (जैसे अग्नि,पृथ्वी सीरीज़) सीधे चीन की निगरानी में हैं व इसरो के रॉकेट लॉन्च के मद्देनजर सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (श्रीहरिकोटा) से होने वाले प्रक्षेपणों की सटीक ट्रैकिंग पर नजर और विशाखापट्टनम नेवी बेस पर भारतीय नौसेना की पूर्वी कमान की हर हलचल,जहाजों और पनडुब्बियों की आवाजाही को "कोको आइलैंड्स"से आसानी से कैप्चर किया जाता है।
इसके साथ साथ चीन की अन्य गतिविधियाँ देखें तो चीन का उद्देश्य केवल निगरानी तक सीमित नहीं है। सिग्नल इंटेलिजेंस (SIGINT) को लेकर चीन यहाँ से भारत के सैन्य संचार (Communication) को इंटरसेप्ट करने और इलेक्ट्रॉनिक डेटा इकट्ठा करने का काम कर रहा है। समुद्री वर्चस्व के मद्देनजर यह "टापू मलक्का जलडमरूमध्य (Malacca Strait)"के प्रवेश द्वार के करीब है। यहाँ उपस्थिति दर्ज कराकर चीन हिंद महासागर में भारत की नौसैनिक श्रेष्ठता को चुनौती देने की कोशिश कर रहा है और लॉजिस्टिक हब के मद्देनजर "कोको आइलैंड्स" का उपयोग चीनी युद्धपोतों और पनडुब्बियों के लिए एक ''री-फ्यूलिंग''और लॉजिस्टिक सपोर्ट बेस के रूप में किया जा रहा है। "कोको आइलैंड्स"का मुद्दा यह दर्शाता है कि कैसे कूटनीतिक नरम रुख का लाभ उठाकर चीन ने भारत की दहलीज पर अपनी आंखें और कान लगा दिए हैं।
भारत अब इस स्थिति को लेकर सतर्क है और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में अपनी खुद की सैन्य तैयारियों को तेजी से मजबूत कर रहा है। यह द्वीप अब केवल एक भू-भाग नहीं बल्कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ते शक्ति संतुलन का एक मुख्य केंद्र है। विकिपीडिया के अनुसार म्यांमार के कोको आइलैंड (Coco Islands) बंगाल की खाड़ी के पूर्वोत्तर में स्थित द्वीपों का एक समूह है। ये 1937 से म्यांमार के यांगोन क्षेत्र का हिस्सा हैं। कोको आइलैंड के बारे में विकिपीडिया पर दी गई मुख्य जानकारियां इस प्रकार हैं।
भौगोलिक स्थिति: यह द्वीप समूह म्यांमार के मुख्य शहर यांगोन से लगभग 414 किमी दक्षिण में स्थित है। यह समूह पांच द्वीपों (बड़ा कोको, छोटा कोको और टेबल द्वीप आदि) से मिलकर बना है।
भारत से समीपता: यह द्वीप समूह भारत के रणनीतिक अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (विशेषकर लैंडफॉल द्वीप) के उत्तर में केवल 55 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इनके बीच का समुद्री मार्ग कोको चैनल कहलाता है।
स्वामित्व विवाद: अक्सर यह राजनीतिक और ऐतिहासिक चर्चा का विषय रहता है कि क्या यह द्वीप कभी भारत का हिस्सा था हालाँकि स्पष्ट किया गया है कि ये द्वीप कभी स्वतंत्र भारत का हिस्सा नहीं रहे। 1937 में ब्रिटिश शासन के दौरान इन्हें बर्मा के प्रशासनिक नियंत्रण में रखा गया था।
रणनीतिक महत्व: विकिपीडिया और रक्षा मामलों के दस्तावेज़ों (जैसे चैथम हाउस की रिपोर्ट) में यह उल्लेख है कि ग्रेट कोको द्वीप पर म्यांमार की सैन्य गतिविधि और हवाई पट्टी का विस्तार देखा गया है। अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों को अंदेशा रहता है कि इन द्वीपों का उपयोग विदेशी ताकतों (विशेषकर चीन) द्वारा भारत की नौसैनिक गतिविधियों की निगरानी और जासूसी के लिए किया जा सकता है। (Photos Courtesy Social media)
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