*मानव हस्तक्षेप का बड़ा असर:अत्यधिक भूजल दोहन से बदली पृथ्वी की धुरी,शोध में हुआ खुलासा*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
*मानव हस्तक्षेप का बड़ा असर:अत्यधिक भूजल दोहन से बदली पृथ्वी की धुरी,शोध में हुआ खुलासा*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
(मुंबई/रिपोर्ट स्पर्श देसाई)सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर की-वेओन सियो के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने पता चला है कि मनुष्यों ने साल 1993 और साल 2010 के बीच 2,150 गीगाटन से अधिक भूजल निकाला । जो पृथ्वी के घूर्णन को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त है। मानो या न मानो मनुष्यों ने इतना अधिक भूजल निकाला है कि पृथ्वी की धुरी 30 इंच से अधिक खिसक गई है। यह जानकारी वैज्ञानिक रूप से पूरी तरह से सत्य है। सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी के भूभौतिकीविद् (geophysicist) की-वेओन सियो (Ki-Weon Seo) और उनकी टीम ने साल 2023 में ''जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स''जर्नल में एक शोध प्रकाशित किया था। यह अध्ययन इस बात की पुष्टि करता है कि मानव गतिविधियों द्वारा भूमिगत जल के अत्यधिक दोहन ने पृथ्वी के घूर्णन ध्रुव (rotational pole) को प्रभावित किया है। जाने यह कैसे काम करता है?(वैज्ञानिक स्पष्टीकरण) पृथ्वी एक लट्टू की तरह घूमती है। जब कोई वस्तु घूमती है तो उसका द्रव्यमान (mass) कैसे वितरित है ?यह उसके घूमने के तरीके को प्रभावित करता है। द्रव्यमान का पुनर्वितरण के मद्देनजर जब हम भारी मात्रा में भूजल (groundwater) पंप करते हैं तो वह पानी अंततः समुद्र में जाकर मिल जाता है। इससे पानी का द्रव्यमान भूमि के नीचे से हटकर समुद्रों में स्थानांतरित हो जाता है। इसका अक्ष पर प्रभाव देखें तो पृथ्वी की सतह पर द्रव्यमान का यह बड़ा बदलाव इसके घूमने के ''संतुलन'' को थोड़ा बदल देता है। जिससे पृथ्वी का घूर्णन अक्ष (axis of rotation) अपनी जगह से खिसक जाता है। इसके परिणाम देखें तो शोध के अनुसार साल 1993 से साल 2010 के बीच निकाले गए 2,150 गीगाटन पानी के कारण पृथ्वी का ध्रुव लगभग 80 सेंटीमीटर (लगभग 31.5 इंच) पूर्व की ओर खिसक गया है। क्या आपने कभी सोचा है कि जमीन के नीचे से निकाला गया पानी हमारे ग्रह की धुरी को हिला सकता है? सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने हाल ही में एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। शोध के अनुसार साल 1993 से 2010 के बीच इंसानों ने 2,150 गीगाटन से अधिक भूजल निकाला है। इस बड़े पैमाने पर जल दोहन के कारण पृथ्वी के द्रव्यमान के वितरण में बदलाव आया है। जिसका सीधा असर इसके घूर्णन (rotation) पर पड़ा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके परिणाम स्वरूप पृथ्वी का घूर्णन अक्ष अपनी सामान्य स्थिति से 30 इंच (लगभग 80 सेंटीमीटर) से अधिक विस्थापित हो गया है हालांकि यह बदलाव हमारे दैनिक जीवन या मौसम के मिजाज को तत्काल बदलने के लिए पर्याप्त नहीं है लेकिन यह इस बात का गंभीर संकेत है कि मानव गतिविधियाँ पृथ्वी के प्राकृतिक संतुलन को किस हद तक प्रभावित कर रही हैं। जल संरक्षण आज केवल संसाधनों को बचाने का सवाल नहीं बल्कि ग्रह के भौगोलिक संतुलन को बनाए रखने की भी आवश्यकता है। पृथ्वी के घूर्णन अक्ष (rotational axis) में बदलाव और भूजल दोहन का सीधा संबंध भविष्य के लिए कई पर्यावरणीय चिंताएं पैदा करता है। इस विषय पर कुछ महत्वपूर्ण बिंदु देखें तोसमुद्र के स्तर में वृद्धि (Sea Level Rise) के मद्देनजर शोधकर्ताओं के अनुसार जमीन से निकाला गया भूजल अंततःनदियों के माध्यम से महासागरों में पहुँच जाता है। भूजल का यह बड़े पैमाने पर समुद्र में पहुँचना,वैश्विक समुद्र के स्तर में वृद्धि में सीधे योगदान देता है। जलवायु पैटर्न पर प्रभाव देखें तो यद्यपि पृथ्वी की धुरी में 30 इंच का बदलाव मानव जीवन के लिए तत्काल खतरा नहीं है लेकिन यह दर्शाता है कि मानव गतिविधियाँ ग्रह के प्राकृतिक संतुलन को किस हद तक बदल रही हैं। लंबे समय में द्रव्यमान के इस प्रकार के वितरण से पृथ्वी के घूमने की गति और जलवायु के प्राकृतिक चक्रों पर सूक्ष्म प्रभाव पड़ सकते हैं। संसाधन प्रबंधन को लेकर शोध का मुख्य निष्कर्ष यह है कि पृथ्वी की धुरी में यह बदलाव केवल एक वैज्ञानिक जिज्ञासा नहीं है बल्कि यह इंसानों द्वारा भूजल के अत्यधिक दोहन का एक गंभीर परिणाम है। इससे स्पष्ट होता है कि जल का सतत प्रबंधन (sustainable management) न केवल जल सुरक्षा के लिए बल्कि पृथ्वी के भौतिक संतुलन को बनाए रखने के लिए भी अनिवार्य है। (Photos Courtesy Social media)
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