*इस्लाम पर हर हिंसा का ठीकरा क्यों? जानें इतिहास के वे पन्ने जो बताते हैं असली खलनायक कौन?*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
*इस्लाम पर हर हिंसा का ठीकरा क्यों? जानें इतिहास के वे पन्ने जो बताते हैं असली खलनायक कौन?*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
(मुंबई/रिपोर्ट स्पर्श देसाई) सदियों से हर हिंसा का ठीकरा इस्लाम पर फोड़ा जा रहा है? इतिहास के तथ्य बताते हैं कि असली खलनायक कोई और है। 2 करोड़ से 10 करोड़ तक... इन नरसंहारों में कहाँ था इस्लामी शासन? सवाल जो दुनिया को चुप करा दे। इस्लाम विलन नहीं,सत्ता का खेल है! ऐतिहासिक तथ्य जो बदल देंगे आपकी सोच। जब इतिहास खुद बोलता है। जब भी दुनिया में हिंसा की बात होती है तो सबसे पहले शक किस पर जाता है? मुसलमानों पर लेकिन क्या इतिहास इस आरोप को सही ठहराता है?आइए,भावनाओं से हटकर इतिहास के सूखे आंकड़ों पर नज़र डालते हैं। थोडी असलियत जानते हैं। विश्व युद्ध में जब इंसानियत खुद से लड़ी थी। प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) इतिहासकारों के अनुसार इस युद्ध में लगभग 1.7 से 2 करोड़ लोग मारे गए थे। यूरोपीय शक्तियों की आपसी महत्वाकांक्षा ने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया था। जबकि द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) की इस भयानक जंग में 6 से 7 करोड़ लोगों की जान गई। यह संख्या दुनिया की तत्कालीन आबादी का करीब 3 प्रतिशत थी। अब देखें जापान की त्रासदी यानि हिरोशिमा और नागासाकी पर डालें गेंद सिर्फ दो परमाणु बमों ने 1.18 लाख से अधिक लोगों को उसी वक्त मौत के घाट उतार दिया था। यह तय किया गया कि दो शहर,दो बम और दो लाख मौतें इतिहास के सबसे काले अध्यायों में दर्ज हैं। आगे देखें तो अमेरिका का मूल निवासी"अपाचे इंडियन"का संहार का चितार। उत्तरी अमेरिका के मूल निवासियों की आबादी में भारी गिरावट आई है। अनुमान है कि 5 से 10 करोड़ मूल निवासी अपनी जान गंवा बैठे है। दक्षिण अमेरिका में उपनिवेशवाद के दौरान 9-10 करोड़ मूल निवासियों को मिटा दिया गया है। कोलंबस के आगमन (1492) के बाद सिर्फ एक सदी में अमेरिका की 90% मूल आबादी का सफाया हो गया है।
बीमारी, अकाल,नरसंहार और विस्थापन ये वो हथियार थे। जिन्होंने एक पूरे महाद्वीप को तबाह कर दिया। वियेटनाम की जंग और इसी दौरान अफ्रीका का गुलामी का काला इतिहास देखें तो अफ्रीका से 1.25 करोड़ से अधिक लोगों को जबरन गुलाम बनाकर अमेरिका और यूरोप ले जाया गया था। 10.7 करोड़ से अधिक लोगों ने ''मिडिल पैसेज''की यातना झेली थी। यह मानव इतिहास का सबसे बड़ा जबरन प्रवासन था।अब सवाल उठता है कि इनमें से कौन सी तबाही "इस्लामी शासन"के नाम पर हुई?जवाब है कि कोई नहीं फिर भी हर हिंसा का ठीकरा इस्लाम पर क्यों फोड़ा जाता है? इसकी असली वजह देखें तो दुनिया को एक ''विलन'' की ज़रूरत थी। इतिहास गवाह है कि इस्लामी शासन ने अपने राज में शांति कायम की थी। गरीबों के हक की बात की थी और प्राकृतिक संसाधनों पर लालचियों की नज़र नहीं पड़ने दी थी लेकिन सत्ता,लालच और राजनीति के लिए इस्लाम के''खलनायक''बनाया गया है ताकि ''मॉडर्नाइजेशन'' के नाम पर सब कुछ हथिया लिया जाए ताकि संसाधनों की लूट को सही ठहराया जा सके ताकि एकतरफा नैरेटिव के ज़रिए जनता को गुमराह किया जा सके। इसके अतिरिक्त जानकारी के मुताबिक संसार में "इस्लामोफोबिया"का राजनीतिक खेल खेला जा रहा है। हाल के अध्ययनों से पता चलता है कि मीडिया और फिल्म उद्योग में इस्लाम को ''विलन''के रूप में चित्रित करने की सोची-समझी रणनीतिक रणनीति है। ''मुस्लिम विलन स्टीरियोटाइप'' को बार-बार दोहराकर एक पूरे समुदाय को खतरे के रूप में पेश किया जाता है।
सवाल ये नहीं है कि इस्लाम में हिंसा है या नहीं?सवाल ये है कि हिंसा को इस्लाम से जोड़कर क्यों पेश किया जाता है? जबकि इतिहास में गैर-इस्लामी शासनों ने कहीं अधिक बड़े नरसंहार किए हैं? समस्या इस्लाम नहीं है । समस्या है झूठे प्रोपागंडे की। समस्या है उन लोगों की जो सत्ता और लालच के लिए इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं। सच बिल्कुल सीधा है कि ये बात किसी धर्म के खिलाफ नहीं है बल्कि एकतरफा नैरेटिव के खिलाफ है। जब तक हम इतिहास को उसके पूरे संदर्भ में नहीं देखेंगे। तब तक सत्ता के खेल में हम ऐसे ही गुमराह होते रहेंगे। इस्लाम को ''विलन'' बनाने की यह सोची- समझी रणनीति नहीं है। यह राजनीतिक स्वार्थ है। आर्थिक लालच है और साम्राज्यवादी मानसिकता है। यह रिपोर्ट एक अत्यंत संवेदनशील और विचारोत्तेजक विषय पर आधारित है। यह ऐतिहासिक आंकड़ों के माध्यम से एक व्यापक विमर्श खड़ा करने का प्रयास करती है। यह रिपोर्ट के प्रभाव और गहराई को और अधिक बढ़ाने के लिए इसमें कुछ अतिरिक्त तार्किक और विश्लेषणात्मक बिंदु जोड़ें है।
जैसे "सॉफ्ट पावर'' और "प्रोपेगैंडा" का विश्लेषण कि कैसे आधुनिक दौर में ''सिनेमा'' और ''न्यूज़ एल्गोरिदम'' का उपयोग ''पुष्टिकरण पूर्वाग्रह'' (Confirmation Bias) पैदा करने के लिए किया जाता है? दर्शक अक्सर वही देखना पसंद करते हैं जो उनके पहले से बने पूर्वाग्रहों की पुष्टि करता हो और सोशल मीडिया के ''इको-चैंबर'' इस प्रवृत्ति को और गहरा करते हैं।''वेस्टफेलियन''संप्रभुता और औपनिवेशिक मानसिकता का संदर्भ के हिसाब से इतिहास में होने वाली बड़ी हिंसा के पीछे मुख्य रूप से ''नेशन-स्टेट'' (Nation-State) की अवधारणा और संसाधनों पर कब्जे की भूख रही है। यह स्पष्ट हैं कि साम्राज्यवाद (Imperialism) और उपनिवेशवाद (Colonialism) ने धर्म के बजाय ''क्षेत्रीय प्रभुत्व'' को मुख्य आधार बनाया था। हिंसा अक्सर धर्म के चोगे में राजनीति की भूख है। तुलनात्मक धर्मशास्त्र और शांति का परिप्रेक्ष्य में जाने तो विश्व के अधिकांश धर्मों का मूल दर्शन शांति और मानवता ही रहा है और यदि किसी धर्म को हिंसा से जोड़ा जाता है तो यह उस धर्म की शिक्षाओं का नहीं बल्कि उसके अनुयायियों या राजनीतिक नेतृत्व द्वारा किए गए गलत अर्थों (Misinterpretations) का परिणाम होता है। इस्लाम को ''विलन'' बनाने का प्रयास कोई संयोग नहीं बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक स्वार्थ है। जिसे साम्राज्यवादी मानसिकता ने खाद-पानी दिया है। (Photos Courtesy Social media)
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