*सुप्रीम कोर्ट का स्पष्टीकरण:सिर्फ रजिस्ट्री से नहीं मिलता प्रॉपर्टी का कानूनी स्वामित्व,ये तीन दस्तावेज हैं जरूरी*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
*सुप्रीम कोर्ट का स्पष्टीकरण:सिर्फ रजिस्ट्री से नहीं मिलता प्रॉपर्टी का कानूनी स्वामित्व,ये तीन दस्तावेज हैं जरूरी*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
(मुंबई /रिपोर्ट स्पर्श देसाई) अक्सर लोग यह मान लेते हैं कि संपत्ति की रजिस्ट्री करा लेने के बाद वे उसके कानूनी मालिक बन गए हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हाल के ऐतिहासिक फैसलों में यह साफ किया है कि रजिस्ट्री मात्र एक "लेन-देन का रिकॉर्ड" है। स्वामित्व का अंतिम प्रमाण नहीं। चाहे वह अभिनेता सलमान खान हों या अमिताभ बच्चन कानून सबके लिए एक समान है। सिर्फ रजिस्ट्री करा लेने से संपत्ति पर आपका कानूनी अधिकार साबित नहीं होता। दौरान सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? वह देखें तो सुप्रीम कोर्ट ने महनूर फातिमा इमरान बनाम विश्वेश्वर इंफ्रास्ट्रक्चर मामले में स्पष्ट किया कि रजिस्ट्री एक प्रक्रियागत औपचारिकता (procedural formality) मात्र है। कोर्ट ने कहा कि रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत दस्तावेजों का पंजीकरण होता है। टाइटल (शीर्षक) का नहीं। रजिस्ट्री सरकारी रिकॉर्ड में एक लेन-देन का सार्वजनिक विवरण मात्र है। ऐसे में कोर्ट के मुख्य निष्कर्ष समझे तो रजिस्ट्री स्वामित्व का निर्णायक प्रमाण नहीं है । स्वामित्व वैध टाइटल, कब्जा और कानूनी अधिकारों पर निर्भर करता है। पंजीकृत विलेख भी अमान्य हो सकता है यदि विक्रेता के पास बेचने का कानूनी अधिकार नहीं था। रजिस्ट्री करने वाला अधिकारी स्वामित्व विवाद का फैसला नहीं कर सकता। इसके लिए कानून क्या कहता है? वह जाने तो ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882 की धारा 54 के अनुसार 100 रुपये से अधिक मूल्य की अचल संपत्ति का स्थानांतरण केवल पंजीकृत साधन (registered instrument) द्वारा ही किया जा सकता है लेकिन यह जरूरी शर्त है। पर्याप्त नहीं। खरीदार को यह भी साबित करना होता है कि उसने पूरी कीमत चुकाई है। संपत्ति पर कब्जा लिया है और मूल दस्तावेज उसके पास हैं। कानूनी स्वामित्व साबित करने के लिए तीन जरूरी दस्तावेज। उसमें सबसे पहले "मदर डीड" (Mother Deed) पूर्व स्वामित्व का इतिहास। "मदर डीड" वह दस्तावेज है जो संपत्ति के पूरे स्वामित्व इतिहास को दर्शाता है। यह बताता है कि संपत्ति मूल रूप से किसके पास थी और फिर यह किस-किस के हाथों से गुज़री। यह दस्तावेज सब-रजिस्ट्रार कार्यालय से प्राप्त किया जा सकता है। बैंक संपत्ति के खिलाफ ऋण देते समय "मदर डीड" को अनिवार्य रूप से देखते हैं।
दूसरा "एनकम्ब्रेंस सर्टिफिकेट"(Encumbrance Certificate) भारमुक्त प्रमाणपत्र। इसे "क्लीन चिट सर्टिफिकेट" भी कहा जाता है। यह प्रमाणित करता है कि संपत्ति पर कोई बकाया ऋण,मॉर्गेज या कानूनी दावा नहीं है। यह सर्टिफिकेट भी सब-रजिस्ट्रार कार्यालय से जारी किया जाता है। आमतौर पर यह पिछले 10 से 30 वर्षों के रिकॉर्ड को कवर करता है। इसके बिना संपत्ति पर किसी भी तरह का दावा या विवाद हो सकता है और आखिर में तिसरा "म्यूटेशन" (Mutation) राजस्व रिकॉर्ड में नामांतरण। "म्यूटेशन" वह प्रक्रिया है जिसमें सरकारी रिकॉर्ड (राजस्व विभाग,नगर निगम) में संपत्ति के मालिक का नाम अपडेट किया जाता है। यह सेल डीड से अलग प्रक्रिया है। सेल डीड से रजिस्ट्री होती है। "म्यूटेशन"से नामांतरण। "म्यूटेशन"के बाद नगर निगम और टैक्स रिकॉर्ड में आपका नाम आ जाता है। बैंक से कोलैटरल लोन लिया जा सकता है। संपत्ति बेचना आसान हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि "म्यूटेशन" स्वामित्व का पालन करता है। न कि स्वामित्व म्यूटेशन का यानि पहले कानूनी स्वामित्व होना चाहिए फिर रिकॉर्ड में उसका अपडेट होता है।
इसकेअतिरिक्त जरूरी सावधानियां के मद्देनजर सोसाइटी से NOC को लेकर यदि आप किसी सोसाइटी में घर खरीद रहे हैं तो सोसाइटी से "नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट"(NOC) लेना अनिवार्य है। यह पुष्टि करता है कि सोसाइटी को आपके नाम पर संपत्ति ट्रांसफर करने में कोई आपत्ति नहीं है। इसके अलावा अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेज जरूरी जैसे बिल्डिंग अप्रूवल प्लान,पॉसेसन लेटर,कम्प्लीशन सर्टिफिकेट, खाता सर्टिफिकेट और RERA के तहत अनुपालन। कब हो सकती है रजिस्टर्ड संपत्ति अमान्य? वह जाने तो सुप्रीम कोर्ट के अनुसार पंजीकृत बिक्री भी निम्न स्थितियों में रद्द हो सकती है अगर खरीदार ने पूरी कीमत नहीं चुकाई है तो। धोखाधड़ी, जबरदस्ती या गलत पहचान का मामला है तो। विक्रेता के पास संपत्ति बेचने का कानूनी अधिकार नहीं था या नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट के इन फैसलों ने एक बार फिर स्थापित किया है कि रजिस्ट्री प्रक्रियागत है। स्वामित्व मूलभूत। संपत्ति खरीदते समय केवल रजिस्ट्री पर निर्भर न रहें। "मदर डीड" ,"एनकम्ब्रेंस सर्टिफिकेट" और "म्यूटेशन" तीनों दस्तावेजों को पूरा करना ही वास्तविक कानूनी स्वामित्व की गारंटी देता है। किसी भी संपत्ति लेन-देन से पहले पूरी "ड्यू डिलिजेंस" (due diligence) करना न भूलें।(Photos Courtesy Social media)
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