*भारतीय भोजन संकट:चावल,मसाले,फल-सब्जियों में कीटनाशक,भारी धातु,बैक्टीरिया का जहर,दोहरे मानकों और खाद्य असुरक्षा की कड़वी सच्चाई*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई

*भारतीय भोजन संकट:चावल,मसाले,फल-सब्जियों में कीटनाशक,भारी धातु,बैक्टीरिया का जहर,दोहरे मानकों और खाद्य असुरक्षा की कड़वी सच्चाई*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई 


(मुंबई/रिपोर्ट स्पर्श देसाई)भारतीय खाद्य सुरक्षा और वैश्विक मानकों जैसे यूरोपीय संघ या जापान की हालिया रिपोर्ट्स के आंकड़ों के अनुसार हमारे दैनिक भोजन में मिलने वाले हानिकारक पदार्थों और कीटनाशकों की श्रेणीवार सूची तथा सरकार द्वारा इन्हें पूरी तरह बंद न कर पाने के जटिल कारणों का पूरा विवरण देखें तो खाद्य पदार्थ और उनमें पाए जाने वाले हानिकारक तत्व की पूरी लिस्ट देखें। हाल के सरकारी और अंतरराष्ट्रीय लैब टेस्ट्स जैसे यूरोपीय संघ के रैपिड अलर्ट सिस्टम RASFF में भारतीय खाद्य पदार्थों में निम्नलिखित विषैले तत्व मुख्य रूप से पाए गए हैं। खाद्य पदार्थ (Food Items) पाए जाने वाले कीटनाशक / रसायन / बैक्टीरिया,स्वास्थ्य पर प्रभाव चावल (बासमती व अन्य) क्लोरपायरीफॉस (Chlorpyrifos),ट्राईसाइक्लाजोल (Tricyclazole), बुप्रोफेज़िन, फोर्टे (Phorate) यह तंत्रिका तंत्र (Nervous System) को नुकसान पहुंचाता है और बच्चों के मानसिक विकास को रोकता है। मसाले जैसे जीरा, मिर्च, सांभर मसाला, हल्दी आदी एथिलीन ऑक्साइड (Ethylene Oxide), क्लोरपायरीफॉस एथिलीन ऑक्साइड एक गैस है। जिसका उपयोग भंडारण में कीड़े मारने के लिए होता है। यह सीधे तौर पर कैंसर (कार्सिनोजेनिक) का कारण बन सकता है। फल और सब्जियां जैसे आम,अंगूर, टमाटर सैलमोनेला बैक्टीरिया (Salmonella), फंगीसाइड्स (फफूंदनाशक),मैलाथियान गंभीर फूड पॉइजनिंग,उल्टी,दस्त,पेट में इन्फेक्शन और लिवर को नुकसान होता हैं। मछली और समुद्री भोजन (Sea Food) मर्क्यूरी (पारा), लेड (शीशा), कैडमियम, नाइट्रोफ्यूरन,ये भारी धातुएं (Heavy Metals) किडनी खराब कर सकती हैं और मानसिक संतुलन बिगाड़ सकती हैं।


 पैकेज्ड स्नैक्स और हर्बल सप्लीमेंट्स विजिबल फिल्थ (प्रत्यक्ष गंदगी/कीड़े),अनधिकृत फूड एडिटिव्स,आंतों का संक्रमण और एलर्जी। सरकार इन हानिकारक पदार्थों को पूरी तरह बंद क्यों नहीं करवाती? उसे देखें तो यह सवाल हर आम नागरिक के मन में आता है कि जब यह चीजें इतनी खतरनाक हैं तो सरकार एक झटके में इन पर पूरी तरह प्रतिबंध (Ban) क्यों नहीं लगा देती? इसके पीछे कई गहरे आर्थिक, व्यावहारिक और तकनीकी कारण होते हैं। जैसे कि उत्पादन घटने और भुखमरी का डर (Food Security) भारत की विशाल जनसंख्या का पेट भरने के लिए बड़े पैमाने पर कृषि उत्पादन जरूरी है। यदि सरकार अचानक सभी रासायनिक कीटनाशकों (Pesticides) को बैन कर देगी तो कीड़ों और बीमारियों के कारण फसलें 40% से 50% तक बर्बाद हो सकती हैं। देश में अनाज की कमी और भुखमरी न फैले इसलिए सरकार इन्हें पूरी तरह बंद करने के बजाय इनकी एक ''सीमित मात्रा'' (Maximum Residue Limit - MRL) तय करती है। नियमों का होना लेकिन ज़मीनी स्तर पर निगरानी (Monitoring) की कमी भारत में FSSAI और कृषि मंत्रालय ने कई खतरनाक पेस्टिसाइड्स जैसे एंडोसल्फान, मोनोक्रोटोफॉस का सब्जियों पर उपयोग आदि को या तो पूरी तरह बैन किया हुआ है या प्रतिबंधित (Restricted) किया है।


असली समस्या कानून की नहीं बल्कि ''लागू करने'' (Enforcement) की है। भारत में करोड़ों छोटे किसान हैं। वे खेतों में कितनी मात्रा में पेस्टिसाइड" डाल रहे हैं, इसे हर खेत पर जाकर ट्रैक करने का कोई बुनियादी ढांचा (Infrastructure) हमारे पास नहीं है। कृषि जागरूकता की कमी (Unregulated Usage) ज़्यादातर मामलों में किसान" पेस्टिसाइड" की डिब्बी पर लिखे निर्देशों को पढ़े बिना फसल को जल्दी और सुंदर दिखाने के लिए तय सीमा से 4-5 गुना ज्यादा दवा छिड़क देते हैं। इसके अलावा फसल काटने (Harvesting) के तुरंत बाद उसे बाजार में बेच दिया जाता है, जिससे केमिकल को बेअसर होने का समय ही नहीं मिलता। सप्लाई चेन और कोल्ड स्टोरेज की खराब व्यवस्था एथिलीन ऑक्साइड जैसी गैसें किसान खेत में नहीं डालते। जब अनाजों और मसालों को बड़े-बड़े गोदामों या कोल्ड स्टोरेज में महीनों तक रखा जाता है तो उन्हें चूहों और कीड़ों से बचाने के लिए इन रसायनों का धुआं दिया जाता है। सप्लाई चेन में पारदर्शिता और फूड ट्रेसेबिलिटी यानि यह पता लगाना कि माल कहाँ से आया और कहाँ प्रोसेस हुआ? न होने के कारण कंपनियों पर नकेल कसना मुश्किल हो जाता है।


 इसका आर्थिक और कॉरपोरेट लॉबिंग मुख्य कारण है। "पेस्टिसाइड"  बनाने वाली कंपनियां बहुत बड़ी अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं। जब भी सरकार कुछ रसायनों को बैन करने का ड्राफ्ट नोटिफिकेशन लाती है । जैसे हाल के वर्षों में 27 घातक पेस्टिसाइड्स को बैन करने का प्रस्ताव आया था तो कंपनियों और कुछ किसान संगठनों द्वारा तर्क दिया जाता है कि इनके बिना खेती की लागत बहुत बढ़ जाएगी। इस दबाव के चलते कई बार कड़े फैसले टल जाते हैं। सरकार अब ऐसे में क्या कदम उठा रही है? वैश्विक स्तर पर भारत के प्रीमियम प्रोडक्ट्स के रिजेक्ट होने और घरेलू स्तर पर बढ़ते जन-आक्रोश के बाद सरकार अब ऑर्गेनिक फार्मिंग जैविक खेती को बढ़ावा दे रही है। FSSAI अब ई-कॉमर्स और क्विक डिलीवरी ऐप्स के लिए भी सख्त नियम ला रहा है ताकि हर उत्पाद की लैब टेस्टिंग रिपोर्ट और क्यूआर कोड (QR Code) पैकेजिंग पर देना अनिवार्य किया जा सके। उपभोक्ता के तौर पर फिलहाल हमारी सुरक्षा इस बात पर निर्भर करती है कि हम पैकेज्ड फूड्स के लेबल्स को ध्यान से पढ़ें। स्थानीय स्तर पर जैविक (Organic) विकल्पों को चुनें और कच्चे खाद्यान्नों को पकाने से पहले बहुत अच्छी तरह धोएं। (Photos Courtesy Social media)

~ब्यूरो रिपोर्ट स्पर्श देसाई √•Metro City Post•Digital World• #FoodSafetyIndia #PesticidesInRice #IndianFoodCrisis #FSSAIFails #HeavyMetalsInFood #खाद्य_सुरक्षा_खतरा #ExportRejection #DoubleStandardsExposed #कीटनाशक_मुक्त_भारत #HealthyIndiaSafeFood

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