*दुनिया के 60 से ज्यादा देशों में चलते हैं प्लास्टिक नोट,अब भारत में भी तैयारी;जानें क्या कहा RBI गवर्नर ने?*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई

*दुनिया के 60 से ज्यादा देशों में चलते हैं प्लास्टिक नोट,अब भारत में भी तैयारी;जानें क्या कहा RBI गवर्नर ने?*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई 

(मुंबई/रिपोर्ट स्पर्श देसाई)दुनिया का पहला प्लास्टिक नोट सन 1988 में ही आ गया था। अब भारत में भी तैयारी हो रही है। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने दिए इसके संकेत। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) देश की मुद्रा प्रणाली में एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव करने पर विचार कर रहा है। आने वाले समय में आपको अपनी जेब में कागज के नोटों की जगह प्लास्टिक (पॉलिमर) के नोट देखने को मिल सकते हैं। आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने हाल ही में पुष्टि की है कि सरकार और केंद्रीय बैंक देश में प्लास्टिक नोट चलाने के प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं ​हालांकि गवर्नर ने यह भी साफ किया कि यह योजना अभी अपने शुरुआती चरण (Initial Stage) में है और इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है। सन ​1988 में ऑस्ट्रेलिया ने की थी शुरुआत और आज 60 से ज्यादा देशों में चलन में हैं। ​प्लास्टिक नोटों का इतिहास करीब38 साल पुराना है। साल 1988 में ऑस्ट्रेलिया ने दुनिया का पहला पॉलिमर (प्लास्टिक) नोट जारी किया था। ऑस्ट्रेलिया ने यह कदम मुख्य रूप से नकली नोटों की समस्या से निपटने और नोटों की उम्र बढ़ाने के लिए उठाया था। ​आज के समय में दुनिया के 60 से अधिक देश अपनी करेंसी के लिए प्लास्टिक नोटों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इनमें ऑस्ट्रेलिया के अलावा न्यूजीलैंड, यूनाइटेड किंगडम (UK),कनाडा, वियतनाम,मॉरीशस और रोमानिया जैसे देश शामिल हैं। जिन्होंने अपनी पूरी कागजी मुद्रा को धीरे-धीरे पॉलिमर में बदल दिया है। ​कागज के मुकाबले प्लास्टिक नोट क्यों हैं बेहतर?वो समझे तो ​दुनियाभर के केंद्रीय बैंकों का प्लास्टिक नोटों की तरफ झुकाव होने के पीछे कई ठोस वजहें हैं। जैसे ​लंबी उम्र (Durability) होती है ऐसी नोटों की। कागजी नोट बहुत जल्दी फट जाते हैं। गल जाते हैं या गंदे हो जाते हैं। इसके विपरीत प्लास्टिक नोट सिंथेटिक पॉलिमर से बने होते हैं। जिनकी उम्र कागजी नोटों की तुलना में 4 से 5 गुना ज्यादा होती है। ​सुरक्षा के मद्देनजर नकली नोटों पर लगाम लग सकती हैं। पॉलिमर नोटों में सुरक्षा के ऐसे हाई-टेक फीचर्स जैसे पारदर्शी विंडो,होलोग्राम और बदलते रंग शामिल किए जा सकते हैं। जिनकी नकल करना जालसाजों के लिए लगभग असंभव होता है। ​वॉटरप्रूफ होने से साफ-सफाई में आसान होता है। ये नोट पानी,तेल या पसीने से खराब नहीं होते अगर इन पर कोई दाग लग जाए तो इन्हें आसानी से पोंछकर साफ किया जा सकता है। ​पर्यावरण के अनुकूल (Recyclable) भी होता है। जब प्लास्टिक नोट पुराने या इस्तेमाल के लायक नहीं रह जाते तो उन्हें नष्ट करने के बजाय रीसायकल करके अन्य प्लास्टिक उत्पाद बनाए जा सकते हैं। ​भारत के लिए राह इतनी आसान नहीं है और चुनौतियां भी हैं बड़ी है। ​आरबीआई लंबे समय से भारत की जलवायु और परिस्थितियों में प्लास्टिक नोटों के ट्रायल पर काम कर रहा है (पूर्व में कोच्चि,मैसूर, जयपुर,शिमला और भुवनेश्वर जैसे शहरों में ₹10 के प्लास्टिक नोटों के फील्ड ट्रायल की योजना बनी थी) हालांकि भारत जैसे विशाल देश में इसे पूरी तरह लागू करने में कुछ बड़ी चुनौतियां हैं। जैसे कि एटीएम (ATM) मशीनों में बदलाव का भारी खर्च विभिन्न होता है। भारत में मौजूद लाखों एटीएम मशीनों के कैलिब्रेशन (Calibration) को बदलना होगा क्योंकि प्लास्टिक नोटों का वजन,मोटाई और टेक्सचर कागजी नोटों से बिल्कुल अलग होता है। शुरुआती लागत देखें तो प्लास्टिक नोटों को छापने की शुरुआती लागत सामान्य कागजी नोटों की तुलना में काफी अधिक होती है हालांकि लंबे समय में अपनी लंबी उम्र के कारण यह लागत वसूल हो जाती है। अत्यधिक तापमान के मद्देनजर भारत के कुछ हिस्सों में तापमान 45 से 50 डिग्री सेल्सियस तक चला जाता है। ऐसे में यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि ये नोट अत्यधिक गर्मी में आपस में चिपके या सिकुड़े नहीं। भविष्य की ओर बढ़ते कदम का आसार। ​आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा का यह बयान साफ करता है कि भारत अपनी अर्थव्यवस्था को डिजिटल बनाने (जैसे ई-रुपया या CBDC) के साथ-साथ फिजिकल करेंसी को भी आधुनिक और सुरक्षित बनाने की दिशा में काम कर रहा है। भले ही यह प्रपोजल अभी शुरुआती लेवल पर है लेकिन अगर यह अमलीजामा पहनता है तो भारतीय मुद्रा के इतिहास में यह एक बहुत बड़ा मील का पत्थर साबित होगा। (Photos Courtesy Social media)

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