*क्या 12 साल रहने पर किराएदार बन जाता है मकान का मालिक?जानिए सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला और 'एडवर्स पजेशन' का पूरा सच*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई

*क्या 12 साल रहने पर किराएदार बन जाता है मकान का मालिक?जानिए सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला और 'एडवर्स पजेशन' का पूरा सच*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई 


(मुंबई/रिपोर्ट स्पर्श देसाई)सोशल मीडिया और सार्वजनिक विमर्श में अक्सर एक भ्रामक दावा वायरल होता रहता है कि "अगर कोई किराएदार किसी संपत्ति पर 12 या 15 साल लगातार रह लेता है तो वह उस मकान या जमीन का कानूनी मालिक बन जाता है।"इस अधूरी और गलत व्याख्या के कारण न सिर्फ मकान मालिकों में अपनी संपत्ति खोने का डर बना रहता है बल्कि समाज में बेवजह के कानूनी विवाद और मुकदमेबाजी भी बढ़ जातीहै। 


यदि आप भी इस बात को सच मानते हैं तो कानून की सही स्थिति जानना आपके लिए बेहद जरूरी है। देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court of India) ने इस भ्रामक प्रचार को पूरी तरह से खारिज करते हुए मकान मालिक और किराएदार के अधिकारों को लेकर स्थिति बिल्कुल शीशे की तरह साफ कर दी है। आइए विस्तार से समझते हैं कि इस विषय पर कानून और सुप्रीम कोर्ट का हालिया रुख क्या है?''ज्योति शर्मा बनाम विष्णु गोयल'' मामला समझे तो सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक रुख इस भ्रम और विवाद का हमेशा के लिए अंत करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने"ज्योति शर्मा वर्सेस विष्णु गोयल" के महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के दौरान किराएदारी कानून (Tenancy Laws) और संपत्ति अधिकारों (Property Rights) पर एक बड़ा और स्पष्ट फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा है कि यदि कोई किराएदार अपने मकान मालिक की सहमति,अनुमति या किसी वैध समझौते के तहत किसी संपत्ति में रह रहा है तो वह वहां चाहे 15 साल रहे,30 साल रहे या 50 साल,वह कभी भी उस संपत्ति का कानूनी मालिक (Owner) नहीं बन सकता। संपत्ति पर अंतिम,वास्तविक और वैधानिक अधिकार हमेशा मूल मकान मालिक का ही रहेगा। 


अदालत ने यह भी साफ किया कि समय बीतने के साथ किराएदार का दर्जा कभी भी खुद-ब-खुद ''मालिक''में तब्दील नहीं हो सकता। लोग कहां भ्रमित होते हैं?क्या है ''प्रतिकूल कब्जा'' (Adverse Possession)?इस पूरे विवाद की जड़ ''एडवर्स पजेशन'' (Adverse Possession या प्रतिकूल कब्जा) के कानूनी सिद्धांत की गलत और अधूरी समझ है। भारतीय कानून में संपत्ति के अधिकार को लेकर दो बेहद अलग पहलू हैं। जिन्हें लोग अक्सर आपस में मिला देते हैं। लिमिटेशन एक्ट,1963 (Limitation Act, 1963) का नियम समझे तो इस कानून की धारा 65 (Article 65) के तहत यदि कोई व्यक्ति किसी निजी अचल संपत्ति पर लगातार 12 वर्षों तक अवैध,बिना किसी समझौते के और प्रतिकूल (Adverse) रूप से कब्जा बनाए रखता है और असली मालिक को इसकी पूरी जानकारी होने के बावजूद वह (मालिक) इस पूरी अवधि के भीतर उसे हटाने के लिए कोई कानूनी कदम या मुकदमा दर्ज नहीं करता तो असली मालिक का अपनी संपत्ति से दावा खत्म हो सकता है। अधिकार सिर्फ ''पजेशन'' का ''मालिकाना हक'' का नहीं। यहां यह समझना सबसे जरूरी है कि एडवर्स पजेशन की स्थिति में भी कोर्ट कब्जेधारी को संपत्ति की ''रजिस्ट्री'' या ''मालिकाना हक''(Ownership) नहीं सौंपता। कोर्ट केवल उसे ''प्रोटेक्टेड पजेशन'' (Protected Possession) यानी वहां रहने या कब्जा बनाए रखने का एक सुरक्षात्मक अधिकार देता है ताकि उसे बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के अचानक बेदखल न किया जा सके। 


किराएदार और मकान मालिक के रिश्ते में क्यों लागू नहीं होता यह नियम? सुप्रीम कोर्ट ने अपने विभिन्न फैसलों में यह स्थापित किया है कि मकान मालिक और किराएदार का आपसी रिश्ता कभी भी ''एडवर्स पजेशन'' के दायरे में आ ही नहीं सकता। इसके पीछे कानून ने ठोस वजहें बताई हैं। सहमति की शुरुआत (Permissive Possession) किराएदारी की शुरुआत हमेशा मकान मालिक की मर्जी या अनुमति से होती है। कानून का एक स्थापित सिद्धांत है। Once a Tenant,Always a Tenant"जो एक बार किराएदार के रूप में आया, वह हमेशा किराएदार ही रहेगा)। जब तक वह कानूनी रूप से बेदखल नहीं होता।उसका कब्जा ''अनुमत'' (Permissive) माना जाता है।''प्रतिकूल'' (Adverse) नहीं। यहां रेंट एग्रीमेंट (Rent Agreement) दोनों पक्षों के बीच लिखित या मौखिक अनुबंध होता है। यदि रेंट एग्रीमेंट की अवधि समाप्त भी हो जाए और किराएदार वहीं टिका रहे तब भी वह कानून की नजर में ''टैनेंट एट सफरेंस''(Tenant at Sufferance) कहलाता है। न कि अवैध कब्जाधारी इसी दौरान किराए का भुगतान होना आवश्यक है। किराएदार द्वारा हर महीने या तय समय पर दिया जाने वाला किराया इस बात का सबसे बड़ा और अकाट्य कानूनी सबूत है कि वह खुद सामने वाले व्यक्ति को संपत्ति का असली मालिक स्वीकार कर रहा है। जहां पावती या किराए का लेन-देन है। वहां एडवर्स पजेशन का दावा कानूनी रूप से तुरंत दम तोड़ देता है। मकान मालिकों के लिए कानूनी एक्सपर्ट्स की जरूरी सलाह दी जाती है। भले ही कानून मकान मालिक के पक्ष में है लेकिन किसी भी प्रकार के विवाद और लंबी अदालती प्रक्रियाओं से बचने के लिए विशेषज्ञों द्वारा निम्नलिखित सावधानियां बरतने की सलाह दी जाती है। हमेशा लिखित और रजिस्टर्ड एग्रीमेंट बनाएं। कभी भी केवल मौखिक भरोसे पर मकान किराए पर न दें। हमेशा 11 महीने का लिखित रेंट एग्रीमेंट बनवाएं और लंबी अवधि के लिए इसे सब- रजिस्ट्रार दफ्तर में रजिस्टर्ड जरूर करवाएं।


 समय पर एग्रीमेंट का नवीनीकरण (Renewal) का तकाजा जरुरी है। एग्रीमेंट की अवधि समाप्त होने से पहले ही नया एग्रीमेंट तैयार करवा लें। किराएदारी की अवधि में निरंतरता और बदलाव के कागजात आपके पास होने चाहिए इसमें किराए की रसीद या बैंक ट्रांसफर अहम है । किराए का लेन-देन हमेशा बैंक ट्रांसफर (UPI/Net Banking) के जरिए करें या फिर लिखित रसीद जरूर दें ताकि ऑन-रिकॉर्ड सबूत रहे कि सामने वाला व्यक्ति बतौर किराएदार ही वहां रह रहा है। लापरवाही से बचने के लिए यदि किराएदार एग्रीमेंट खत्म होने के बाद मकान खाली करने में आनाकानी करे या किराया देना बंद कर दे तो बिना समय गंवाए तुरंत कानूनी नोटिस भेजें। कानून के मुताबिक सतर्क मालिक की संपत्ति हमेशा सुरक्षित रहती है। इस प्रकार यह पूरी तरह स्पष्ट है कि 12,15 या 50 साल रहने से कोई भी किराएदार मकान का मालिक नहीं बन सकता। सोशल मीडिया के भ्रामक दावों और आधी-अधूरी जानकारियों के कारण किसी भी विवाद में पड़ने से बचें और हमेशा सही कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करें।(Photos Courtesy Social media)

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