*रुपए पर दबाव के बावजूद RBI फिलहाल नहीं बढ़ाएगा ब्याज दरः रिपोर्ट*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई

*रुपए पर दबाव के बावजूद RBI फिलहाल नहीं बढ़ाएगा ब्याज दरः रिपोर्ट*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई 


(मुंबई/ रिपोर्ट स्पर्श देसाई)एक बिजनेस चैनल की रिपोर्ट के मुताबिक रुपये पर पड़ रहे दबाव के बावजूद आरबीआई ब्याज दरों में 'ऑफ-साइकिल' (तय समय से अलग हटकर) बढ़ोतरी नहीं करने वाला है। रिपोर्ट के अनुसार आरबीआई अपने फ्लेक्सिबल इन्फ्लेशन-टारगेटिंग फ्रेमवर्क के तहत महंगाई और ग्रोथ के बीच संतुलन बनाने पर ध्यान दे रहा है। बकौल रिपोर्ट रिटेल महंगाई आरबीआई की तय सीमा में है। अप्रैल में रिटेल महंगाई दर 3.48% रही। यह रिपोर्ट स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) बाहरी दबावों के बजाय घरेलू आर्थिक आंकड़ों और अपने मूल लक्ष्यों को प्राथमिकता दे रहा है। इस फैसले के मुख्य कारण और उनके प्रभाव देखें तो फैसला न बदलने के मुख्य कारण अहम रहा है। जिसमें महंगाई नियंत्रण में होना। अप्रैल में खुदरा महंगाई दर (Retail Inflation Rate) 3.48% रही है। जो RBI के 4% के आदर्श लक्ष्य से नीचे है। दौरान संतुलन बनाएं रखना केंद्रीय बैंक आर्थिक विकास (Growth) की रफ्तार को रोके बिना महंगाई को काबू में रखना चाहता है। इसके फ्रेमवर्क का पालन होना जरूरी है। RBI ''फ्लेक्सिबल इन्फ्लेशन-टारगेटिंग फ्रेमवर्क'' के तहत काम कर रहा है। जिसके कारण वह केवल रुपये की कमजोरी देखकर जल्दबाजी में दरें नहीं बढ़ाएगा। अब इसके संभावित प्रभाव देखें तो लोन लेने वालों को राहत मिलेगी ।''ऑफ-साइकिल'' बढ़ोतरी न होने से होम लोन,कार लोन या पर्सनल लोन की EMI फिलहाल स्थिर रहेगी। 


रुपये पर उतार-चढ़ाव भी अहम भूमिका रहेगा। ब्याज दरें न बढ़ने से अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये पर कुछ समय के लिए दबाव बना रह सकता है। इससे बाजार में भरोसा बरकरार रह सकता है। इस फैसले से घरेलू शेयर बाजार और निवेशकों को यह संकेत मिलता है कि देश की आर्थिक बुनियाद मजबूत है। दौरान भारतीय रुपये पर दबाव के कई वैश्विक और घरेलू कारण हैं। जिसका सीधा असर आपकी बचत,खर्च और निवेश पर पड़ता है। रुपये पर दबाव के मुख्य कारण हो सकता है। ब्याज दरों में अंतर देखें तो अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें ऊंची रखने से निवेशक भारत से पैसा निकालकर अमेरिका में लगाते हैं। कच्चे तेल की कीमतों की भी असर रहती हैं। भारत अपनी जरूरत का 80% से अधिक क्रूड ऑयल आयात करता है। तेल महंगा होने से डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है साथ में विदेशी निवेशकों की बिकवाली (FII Outflow) भी देखनी पड़ती है। वैश्विक अनिश्चितता के कारण विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय बाजार से पैसे निकालते हैं। इसके दौरान व्यापार घाटा (Trade Deficit) देखें तो भारत का निर्यात (Export) कम और आयात (Import) ज्यादा होने से देश से डॉलर बाहर जाता है। हो सकता है कि आपके पर्सनल फाइनेंस पर असर हो क्योंकि देश में महंगे आयात से विदेशों से आने वाली चीजें जैसे मोबाइल,इलेक्ट्रॉनिक्स,कार और दवाइयां और महंगी हो जाती हैं। महंगी विदेशी पढ़ाई और यात्रा पर भी असर हो सकता है अगर आपका बच्चा विदेश में पढ़ रहा है या आप घूमने जा रहे हैं तो आपको फीस और खर्च के लिए अधिक रुपये देने होंगे और घरेलू महंगाई मार अलग से। कच्चे तेल के महंगे होने से माल ढुलाई (Transport) महंगी होती है । जिससे फल, सब्जी और रोजमर्रा का सामान महंगा हो जाता है तो आपके निवेश पर असर पड़ता है। शेयर बाजार (Stock Market) आईटी (IT) और फार्मा जैसी निर्यात करने वाली कंपनियों को फायदा होता है क्योंकि उनकी कमाई डॉलर में होती है। पेंट,ऑटो और ऑयल कंपनियों को नुकसान होता है क्योंकि इनका इनपुट कॉस्ट बढ़ जाता है। म्यूचुअल फंड (Mutual Funds) जो फंड अंतरराष्ट्रीय बाजारों में निवेश करते हैं। उनका रिटर्न रुपया कमजोर होने पर बढ़ जाता है। आखिर में सोना (Gold) भारत बड़े पैमाने पर सोने का आयात करता है। रुपया गिरने से घरेलू बाजार में सोने की कीमतें बढ़ जाती हैं। जिससे मौजूदा निवेशकों को फायदा होता है। ( Photos Courtesy Social media)

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