*RBI Profit FY26: क्यों डॉलर बेचता है भारतीय रिजर्व बैंक और कैसे होती है इससे मोटी कमाई? समझें पूरा गणित*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
*RBI Profit FY26: क्यों डॉलर बेचता है भारतीय रिजर्व बैंक और कैसे होती है इससे मोटी कमाई? समझें पूरा गणित*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
(मुंबई/रिपोर्ट स्पर्श देसाई)आरबीआई का ‘डॉलर गेम’समजे,रुपये को संभालने की कवायद में रिकॉर्ड ₹1.69 लाख करोड़ की कमाई,जानें कैसे काम करता है रिजर्व बैंक का यह चक्र?भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने वित्त वर्ष 2025-26 में अपनी विदेशी मुद्रा रणनीतियों और अन्य वित्तीय ऑपरेशन्स के जरिए एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। रिजर्व बैंक ने डॉलर की बिक्री और अन्य विदेशी मुद्रा लेनदेन (Forex Transactions) से ₹1.69 लाख करोड़ का बंपर मुनाफा कमाया है। जो पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 52% अधिक है। इस भारी-भरकम मुनाफे के पीछे आरबीआई की मुख्य रणनीति और उसके अन्य महत्वपूर्ण कार्यों का विस्तृत विश्लेषण देखें तो RBI विदेशी मुद्रा (विशेषकर डॉलर) क्यों बेचता है? आम जनता में अक्सर यह भ्रम होता है कि आरबीआई मुनाफा कमाने के लिए डॉलर बेचता हैं लेकिन ऐसा नहीं है। आरबीआई का मुख्य उद्देश्य रुपये की कीमत में आने वाले उतार-चढ़ाव (Volatility) को रोकना होता है।
रुपये को टूटने से बचाना। जब वैश्विक कारणों (जैसे कच्चे तेल की कीमतों में उछाल,अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी या भू-राजनीतिक तनाव) से विदेशी निवेशक भारत से अपना पैसा निकालने लगते हैं तो बाजार में डॉलर की कमी हो जाती है और रुपये की कीमत गिरने लगती है। दौरान बाजार में संतुलन बनाना अहम होता है। रुपये की गिरावट को थामने के लिए आरबीआई अपने विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserve) से डॉलर बाजार में उतारता है (बेचता है)। डॉलर की सप्लाई बढ़ते ही रुपया संभल जाता है।
रिकॉर्ड तोड़ हस्तक्षेप देखें तो वित्त वर्ष 2025-26 में आरबीआई ने रुपये को स्थिरता देने के लिए स्पॉट मार्केट (Spot Market) में रिकॉर्ड $53.13 बिलियन (53.13 अरब डॉलर) बेचे। डॉलर बेचने से कैसे होती है RBI को कमाई? वो देखें तो आरबीआई डॉलर की ट्रेडिंग किसी आम व्यापारी की तरह मुनाफे के लिए नहीं करता, बल्कि यह मुनाफा उसकी बाय लो, सेल हाई' (कम पर खरीदना, महंगे पर बेचना) की स्थिति के कारण खुद-ब-खुद हो जाता है। यह ऐतिहासिक खरीद होती है। आरबीआई समय-समय पर तब डॉलर खरीदता है । जब भारत में विदेशी निवेश (FDI/FII) बहुत ज्यादा आ रहा होता है और रुपया बहुत मजबूत होने लगता है। उस समय डॉलर की कीमत कम (मान लीजिए ₹75 या ₹80) होती है। महंगे दाम पर बिक्री अहम होती है।जब बाजार में संकट आता है और डॉलर की मांग बढ़ती है (मान लीजिए कीमत ₹85 या उससे ऊपर चली गई), तब आरबीआई अपने भंडार से वही डॉलर बाजार में बेचता है। इसका फायदे का गणित देखें तो कम कीमत पर खरीदे गए डॉलर को मौजूदा उच्च बाजार दर पर बेचने से जो अंतर पैदा होता है। वही आरबीआई का मुनाफा बनता है। इसी कारण इस साल आरबीआई की विदेशी स्रोतों से कुल आय बढ़कर ₹3.28 लाख करोड़ हो गई। सिर्फ डॉलर ही नहीं दूसरी भी अहम भूमिका निभानी होती है। RBI की अन्य महत्वपूर्ण कामगिरियां (Functions)
विदेशी मुद्रा प्रबंधन के अलावा आरबीआई देश की अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए कई अन्य मोर्चों पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मौद्रिक नीति और महंगाई नियंत्रण (Monetary Policy)
आरबीआई का सबसे प्रमुख काम देश में महंगाई (Inflation) को काबू में रखना और आर्थिक विकास (GDP Growth) को गति देना है। इसके लिए आरबीआई 'मौद्रिक नीति समिति' (MPC) के माध्यम से रेपो रेट (Repo Rate) और रिवर्स रेपो रेट तय करता है। जब बाजार में महंगाई बढ़ती है तो आरबीआई ब्याज दरें बढ़ा देता है ताकि नकदी का प्रवाह कम हो सके। बैंकिंग प्रणाली का नियमन और पर्यवेक्षण देखें तो (Regulation of Banks) आरबीआई को "बैंकों का बैंक" कहा जाता है। देश के सभी सरकारी, प्राइवेट, विदेशी और को-ऑपरेटिव बैंक आरबीआई के नियमों के तहत ही काम करते हैं। यह बैंकों के लिए CRR (कैश रिजर्व रेशियो) और SLR (स्टैच्यूटरी लिक्विडिटी रेशियो) तय करता है ताकि बैंक दिवालिया न हों और ग्राहकों का पैसा सुरक्षित रहे। सरकार का बैंकर और कर्ज प्रबंधक (Government's Banker) रोल जाने तो आरबीआई केंद्र और राज्य सरकारों के बैंकर के रूप में कार्य करता है। जब सरकार को अपनी योजनाओं के लिए फंड की जरूरत होती है तो आरबीआई सरकार की तरफ से बॉन्ड्स और ट्रेजरी बिल्स (T-Bills) जारी करके बाजार से कर्ज जुटाता है। करेंसी नोटों की छपाई और प्रबंधन (Currency Issuance) के बारे में जाने तो भारत में ₹2 और उससे ऊपर के सभी मूल्यवर्ग के नोटों को छापने और उन्हें पूरे देश में वितरित करने का एकाधिकार केवल आरबीआई के पास है। जाली नोटों पर लगाम लगाना और फटे-पुराने नोटों को सिस्टम से बाहर करना भी इसी की जिम्मेदारी है।
डिजिटल भुगतान प्रणाली का विकास (Digital Payments Push) के बारे में भी जाने। आरबीआई ने भारत को डिजिटल पेमेंट के मामले में वैश्विक लीडर बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है। UPI (यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस) की सफलता के बाद आरबीआई अब अपनी डिजिटल करेंसी CBDC (सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी या ई-रुपया) को तेजी से बढ़ावा दे रहा है। जिससे नोटों की छपाई का खर्च कम हो सके। वित्त वर्ष 2025-26 के आंकड़े यह दर्शाते हैं कि आरबीआई ने न केवल भारतीय रुपये को वैश्विक उथल-पुथल से बचाकर रखा बल्कि अपने कुशल वित्तीय प्रबंधन से देश के खजाने (Income from Foreign Sources) को भी रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचा दिया। इस बंपर कमाई का एक बड़ा हिस्सा आरबीआई 'लाभांश' (Dividend) के रूप में भारत सरकार को ट्रांसफर करता है, जिसका उपयोग देश के बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के विकास में होता है। (Photos Courtesy Social media)
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