*द डॉलर शॉक: कैसे यूएस ने सोने से डॉलर को अलग करके सऊदी के साथ मिलकर दुनिया को पेट्रोडॉलर के जाल में फंसाया, एक ऐतिहासिक खुलासा*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
*द डॉलर शॉक: कैसे यूएस ने सोने से डॉलर को अलग करके सऊदी के साथ मिलकर दुनिया को पेट्रोडॉलर के जाल में फंसाया, एक ऐतिहासिक खुलासा*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
(मुंबई/रिपोर्ट स्पर्श देसाई)एक वक़्त अमरीका को लगा उसके डॉलर जो पूरी दुनिया में फैले हुए हैं । सारी की सारी कंट्रीज एक साथ तो गोल्ड को कन्वर्ट करवाने आएंगी नहीं । तब यूएस ने क्या किया जितना गोल्ड उसके पास था? उससे ज्यादा डॉलर करेंसी छापना शुरू कर दिया और इंटरनेशनल मार्केट में अमरीका के पास जितना गोल्ड था। उससे ज्यादा "यूएस डॉलर"फ्लोट करने लगे। जब ये हो सकता था कि सब लोग एक साथ यूएस डॉलर देके गोल्ड लेने की डिमांड करें और वो सिचुएशन ये थी कि अगर बाहर जो गोल्ड मार्केट है। उसमें अगर गोल्ड के प्राइस बढ़ जाए तो ये चीज हो सकती है । तब जो अमरीका ने इसके लिए एक प्लान बना के रखा था । उसने आठ देशों जो उसके बहुत करीब थे । जिन्होंने बहुत उससे डेट ले रखा था । अमेरिका ने उन 8 देशों के साथ एक पूल बनाया और उसके बाद लंदन की जो सबसे बड़ी दुनिया की जो सबसे बड़ी गोल्ड मार्केट थी। उसकी डिमांड एंड सप्लाई को मैनिपुलेट करने लगती थी लेकिन साल 1967 आते-आते ये जो अमरीका ने "गोल्ड पूल "बनाया था ।
इसमें जो देश थे उनका थोड़ा नुकसान होने लगा तो ये देश फ्रस्ट्रेट होकर इस पूल से बाहर निकल गए । इस घटना के बाद अमरीका इतना ज्यादा बौखला गया था कि अमेरिका ने इंग्लैंड को एक फोन किया और लंदन में बैठी महारानी एलिजाबेथ को कन्विंस कर लिया और महारानी से प्रोक्लेमेशन लेके पूरा जो लंदन का गोल्ड एक्सचेंज का जो मार्केट था। उसे बंद करवा दिया मतलब कि डिमांड एंड सप्लाई का पूरा किस्सा ही खत्म कर दिया। अब वहां पर ना तो कोई गोल्ड खरीद सकता और ना ही कोई बेच सकता। उसी वक़्त पर अमरीका का जो गोल्ड रिजर्व था। वो भी कम होने लगा था। अमेरिका का जो "गोल्ड रिजर्व"था। वो साल 1960 आते-आते बेहद नीचली तह तक पहुंच गया था। तब अमरीका प्रेसिडेंट रिचर्ड निक्सन थे। वह बाकी देशों को थोड़ा सा बुली करने लगे थे कि डॉलर को गोल्ड में मत कन्वर्ट कराओ तो ये जो सारे इंसिडेंट हो रहे थे कि जैसे लंदन का मार्केट बंद करा दिया गया था। उसके बाद निक्सन जो थे वो थोड़ा सा दबाव बना रहे थे । वह कह रहे थे कि कन्वर्ट ना करो । ये बात इनके ऊपर उल्टा बैक फायर कर गई और बाकी जो देश थे वो असुरक्षित महसूस करने लगे। उन 8 देशों ने क्या किया कि वह डॉलर देके गोल्ड खरीदने लगे। ये सारी चीजें अमरीका के लिए एक डिजास्टर की तरह निकल के सामने आई और जब बाजी हाथ से निकल ने लगी तो अगस्त 15 1971 को प्रेसिडेंट निक्सन एग्जीक्यूटिव ऑर्डर नंबर 11615 रिलीज करते हैं और इंटरनेशनल स्पेकुलेशन को ब्लेम करते हुए कहा था कि अब से ये यूएस डॉलर की जो गोल्ड में कनवर्टिबिलिटी हो रही है उसका मतलब यह था कि आज की डेट से डॉलर जो है उसके बदले गोल्ड नहीं मिलेगा। पूरी दुनिया शॉक्ड हो गई। सारे जो ट्रेड थे वो डॉलर के अंदर हो रहे थे । जो डेट लिए गए थे वो डॉलर में रिटर्न करने थे। ऑयल डॉलर में बिक रहा था । सब के रिजर्व डॉलर में थे ऐसे वक़्त पर ऐसा बोला जाना दुनिया के लिए एक शॉक था इसीलिए इस घटना को "निक्सन शॉक"बोला जाता है। इस घटना के बाद देशों असमंजस मे थे कि अब करें तो करें क्या? उदाहरण के तौर पर इस बात को ऐसे समझ लीजिए जैसे किसी ने पूरी दुनिया को चेक साइन कर-करके बांट दिए हैं। किसी में 10 लाख,किसी में 5 लाख,ऐसे लिख-लिख के चेक साइन करके बांट दिए हैं और बाद में पता चलता है कि चेक तो है लेकिन उसको एनकैश नहीं करवा सकते तो लोग क्या करें ?उसी चेक को एक दूसरे को देके सामान ले और दे रहे हैं और सारे जो देश थे । उनके सामने सबसे बड़ी दिक्कत ये थी कि अगर वो गुस्सा भी हो जाएं कि कहे कि हम डॉलर नहीं यूज़ करेंगे तो डॉलर नहीं यूज़ करेंगे तो उसके बदले में अल्टरनेटिव क्या है? उसका सोल्यूशन उनके पास नहीं था ।अब इधर सऊदी जो था । वो भी अमरीका के पास पहुंचता है। कहता है कि हम यहां ऑयल बेच-बेच के डॉलर इकट्ठे कर रहे हैं और अब आपने तो अदला बदली रुकवा दी?अब हम खरीदारी ही नहीं करा सकते तो गोल्ड में डॉलर की अब वैल्यू ही क्या बची? तब अमेरिका ने सऊदी से कहा कि आपको टेंशन लेने की कोई जरूरत नहीं है । आप जो ऑयल हमें बेच रहे हो उसको डॉलर में ही बेचते रहो। एज इट इज और जो डॉलर आपको ऑयल बेचने से मिल रहा है। उस डॉलर को आप अमरीका के अंदर निवेश करो। हमारी जो रिसोर्सेज हैं। उनको उसी डॉलर से आप खरीद कर अपने देश में मंगवाओ । हमारे जो बॉन्ड्स हैं,हमारी जो कंपनीज़ हैं,उसके अंदर आप इन्वेस्ट करो। हम आपको हर तरीके से मदद करेंगे। ऑयल बेच के जो आपके पास यूएस डॉलर तो आ रहा है। आप बिल्कुल बेफिक्र हो के ऐसे करते रहो और ऑयल को यूएस डॉलर में ही बेंचों। सऊदी अरब की भी मजबूरी थी। उसके पास कोई दूसरा हल तो था नहीं। इस चीज का तो वो मान जाता है तो ऑयल बेचने से जो डॉलर ही उसके पास आता है और सारा खर्चा निकाल के जो बचा हुआ वह डॉलर ही है इसलिए अरब देशों अमेरिका के अंदर निवेश करती हैं। उसको कहते हैं "पेट्रो डॉलर"। आपने ये शब्द ज़रूर सुना होगा। समाचार में तो ये सौदा अमरीका के लिए एक बहुत ही बड़ी जीत थी क्योंकि बाकी देशों को अगर ऑयल चाहिए तो उसे भी यूएस डॉलर मेंटेन करना पड़ेगा और "यूएस डॉलर" जो है,वो मार्केट के अंदर रेलेवेंट रहेगा । बाकी कोई अल्टरनेटिव था नहीं। अब ये जो निर्णय लिया गया कि ऑयल को सिर्फ और सिर्फ यूएस डॉलर में ही बेचा जाएगा। कुछ "अरब लीडर्स"थे उन्होंने खुलकर विरोध किया कि ऑयल को सिर्फ और सिर्फ डॉलर में बेचना है उस बात को हम नहीं मानेंगे और ऐसे जब-जब केस आए हैं यूएस ने अपने मिलिट्री "सुपर पावर" होने का फायदा उठाया है और उन पर सैन्य हमला करके उन आवाजों को अलग-अलग तरीके से शांत करवा दिया है मतलब खाड़ी देशों पर अमरीका इसलिए हमने करता रहा है। जिन्होंने पेट्रो डॉलर का रुल नहीं माना। मुख्यतः साल 1971 के "निक्सन शॉक"और साल 1970 के दशक के "पेट्रोडॉलर" समझौते की घटनाओं पर केंद्रित होने से प्रमुख दावों की तुलना ऐतिहासिक तथ्यों को ध्यान लाते हुए से एक सटीक और प्रामाणिक दृष्टिकोण मिल सकेगा। "गोल्ड पूल"की विफलता साल 1960 के दशक के अंत मे हुई थी। अमेरिका के पास मौजूद सोने से अधिक डॉलर छपने से विदेशी सरकारों द्वारा डॉलर को सोने में बदलने की मांग बढ़ी थी। विशेष रूप से फ्रांस के विरोध के कारण साल 1968 तक यह व्यवस्था लगभग ध्वस्त हो गई। इस "निक्सन शॉक"15 अगस्त 1971 को बढ़ते दबाव को देखते हुए राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने अमेरिकी डॉलर को सोने में बदलने की सुविधा को समाप्त कर दिया था ।जिससे "ब्रेटन वुड्स प्रणाली"का अंत हुआ था। दौरान "पेट्रोडॉलर" प्रणाली की स्थापना साल 1974-1975 में हुई थी। तब अमेरिका ने सऊदी अरब के साथ एक समझौता किया था। जिसमें सऊदी अरब ने तेल की बिक्री केवल डॉलर में करने का वादा किया और बदले में अमेरिका ने उसे सैन्य सुरक्षा प्रदान की थी। इससे डॉलर वैश्विक व्यापार की मुख्य मुद्रा बना रहा था। इसमें चुनौतियाँ और विवाद भी बना रहा था।डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देने वालों जैसे इराक या लीबिया के नेता के साथ कठोर व्यवहार किये जाने का दावा किया जाता है हालाँकि इन चुनौतियों का कारण जटिल भू-राजनीतिक कारक भी थे। इसमें मुख्य ऐतिहासिक दावों का तथ्यात्मक विश्लेषण व ऐतिहासिक सटीकता का आकलन किया गया है।"निक्सन शॉक"15 अगस्त 1971 को निक्सन ने एग्जीक्यूटिव ऑर्डर 11615 जारी कर डॉलर की गोल्ड कन्वर्टिबिलिटी समाप्त की। ऐतिहासिक रूप से सटीक यह आदेश "निक्सन शॉक" का केंद्रबिंदु है। जिसने डॉलर और सोने के बीच संबंध समाप्त कर दिया था। गोल्ड पूल का निर्माण और विफलता के मद्देनजर अमेरिका ने 8 देशों का एक पूल बनाया था। जो साल 1967-68 में फ्रांस के विरोध के कारण टूट गया था। ऐतिहासिक रूप से सटीक इस पूल का गठन साल 1961 में हुआ था। जिसमें 8 देश शामिल थे। साल 1967 में फ्रांस के बाहर निकलने के बाद यह साल 1968 में यह पूल समाप्त हो गया था पर इसके बाद डॉलर के विकल्प पर सैन्य कार्रवाई ही हुई है। "कुछ अरब लीडर्स" ने डॉलर में तेल बेचने का विरोध किया था। जिसे अमेरिका ने अपनी सैन्य ताकत से शांत कराया था। आंशिक रूप से विवादित सरलीकृत इराक (2000) और लीबिया के लिडर गद्दाफी के उदाहरण हैं लेकिन इनके परिणामों के लिए कई भू-राजनीतिक कारण थे। न कि केवल डॉलर की चुनौती थी।
"पेट्रोडॉलर" प्रणाली के सऊदी अरब के साथ एक गुप्त समझौते के तहत तेल सिर्फ डॉलर में बेचा गया और पैसा अमेरिकी बॉन्ड में लगाया गया था। यह जटिल -गलत मान्यता या व्याख्या है कि जैसे साल 1974 में सहयोग समझौता हुआ लेकिन कोई औपचारिक संधि नहीं थी। "पेट्रोडॉलर रीसाइक्लिंग"तेल की आय का अमेरिकी प्रतिभूतियों में पुनर्निवेश एक स्थापित प्रथा हैं लेकिन यह कोई अनिवार्य शर्त नहीं थी। "निक्सन शॉक" और "पेट्रोडॉलर" के मूल ऐतिहासिक आख्यान से पूरी तरह मेल खाती है। यह सही है कि डॉलर का सोने से संबंध तोड़ना और उसे तेल व्यापार से जोड़ना अमेरिकी आर्थिक वर्चस्व का एक महत्वपूर्ण मोड़ था हालाँकि इन घटनाओं की व्याख्या में कथा कई जटिलताओं को सरल बना देती है। गौरतलब है कि यह कोई "औपचारिक संधि" नहीं थी। जिसे हम "पेट्रोडॉलर सिस्टम" कहते हैं। वह एक अनौपचारिक या व्यावहारिक समझ थी न कि कोई हस्ताक्षरित और समय-सीमा वाली संधि थी। उसके कारण और प्रभाव का सरलीकरण देखें तो हालाँकि डॉलर के विकल्प की मांग एक कारक थी लेकिन इराक और लीबिया में अमरीकी सैन्य का हस्तक्षेप के पीछे तेल संसाधनों पर नियंत्रण और भू-राजनीतिक प्रभुत्व जैसे अधिक जटिल कारण थे। डॉलर का भविष्य भी जाने डॉलर का वर्चस्व अभी भी मजबूत है। वैश्विक भंडार का ~59% लेकिन उसे चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ब्रिक्स विशेषकर सऊदी अरब के शामिल होने के बाद स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ा रहा है और चीन अपने युआन को बढ़ावा दे रहा है हालाँक डॉलर से दूर जाने की यह प्रक्रिया धीमी और जटिल है और इसके स्थान पर कोई तत्काल विकल्प नहीं दिखता।( Photos Courtesy Social media)
~ब्यूरो रिपोर्ट स्पर्श देसाई √•Metro City Post•Digital World•
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