*रूस-भारत तेल डील:अमेरिकी टैरिफ और प्रतिबंधों के बावजूद भारत की रणनीतिक और आर्थिक कूटनीति*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
*रूस-भारत तेल डील:अमेरिकी टैरिफ और प्रतिबंधों के बावजूद भारत की रणनीतिक और आर्थिक कूटनीति*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
(मुंबई/रिपोर्ट स्पर्श देसाई ) भारत वर्तमान में रूस से औसतन 20 लाख से 23 लाख बैरल प्रतिदिन ( 2-2.3 Million Barrels Per Day) कच्चे तेल का आयात कर रहा है। रूस से मिलने वाले सस्ते तेल के कारण भारत के कुल तेल आयात में रूसी तेल की हिस्सेदारी लगभग 35% से 40% तक बनी हुई है। हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार भारत ने मई महीने में रूस से रिकॉर्ड 23 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चे तेल का आयात किया है। वैश्विक प्रतिबंधों और अमेरिकी दबाव के बावजूद भारत सरकार का स्पष्ट रुख है कि तेल खरीद का फैसला किसी राजनीतिक दबाव के बजाय विशुद्ध रूप से भारत के आर्थिक हितों और ऊर्जा सुरक्षा पर आधारित है। भारत को रूस से यह तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार की तुलना में रियायती (सस्ती) दरों पर मिल रहा है। जिससे देश के राजस्व की बचत होती है। निश्चित रूप से भारत का रूस से कच्चे तेल का आयात एक बहुआयामी मुद्दा है। जो अर्थव्यवस्था, भू-राजनीति और ऊर्जा नीति को आपस में जोड़ता है। यह विश्लेषण इस मामले की गहन समझ प्रदान करता है।
आयात के आंकड़े और संरचना (Import Figures & Composition) के बारे में जाने तो मई 2025 में रूस से भारत को लगभग 19.6 लाख बैरल प्रतिदिन का रिकॉर्ड आयात हुआ। वहीं जून 2025 में यह आंकड़ा 20.8 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया था। जिससे रूसी तेल की हिस्सेदारी 43.2% हो गई थी। वर्ष 2024-25 के दौरान यह हिस्सेदारी औसतन 35% से 40% के बीच रही थी। जो यूक्रेन युद्ध से पहले 2% से भी कम थी। इसका आर्थिक लाभ जाने तो छूट और बचत (Economic Benefits: Discounts & Savings)। भारत के इस रणनीतिक निर्णय के केंद्र में स्पष्ट आर्थिक लाभ है। रूस ने यूरोपीय बाजार बंद होने के कारण भारत जैसे देशों को भारी छूट दी। छूट के लिए विभिन्न आयाम देखें तो शुरुआत में सऊदी अरब की तुलना में यह छूट $18-20 प्रति बैरल तक थी हालाँकि यह छूट घटकर $2-3 प्रति बैरल पर आ गई थी लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद यह फिर से बढ़कर $5-$7 प्रति बैरल पर पहुंच गई है। अब इसकी कुल बचत और प्रभाव देखें तो पिछले 39 महीनों में भारत ने रूसी तेल आयात से लगभग $12.6 बिलियन की बचत की है। वित्त वर्ष 2024 में यह बचत $8.2 बिलियन थी। जो 2025 में घटकर $3.8 बिलियन रह गई फिर भी यह एक महत्वपूर्ण आर्थिक राहत है। सीएलएसए रिपोर्ट के अनुसार जीडीपी के 0.6% के बराबर यह बचत कम से कम 1 लाख करोड़ रुपये (≈$12 बिलियन) से अधिक आंकी गई है।
रणनीतिक स्थिति को लेकर ऊर्जा सुरक्षा और ''राष्ट्र-प्रथम'' नीति (Strategic Stance)। आर्थिक लाभ भारत की सोच का केवल एक हिस्सा है। मुख्य प्रेरणा ऊर्जा सुरक्षा है क्योंकि भारत अपनी 88% से अधिक जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है। रूस से सस्ता तेल भारी विदेशी मुद्रा खर्च को नियंत्रित करने का एक साधन है। सरकार का स्पष्ट रुख है कि यह निर्णय पूर्ण रूप से ''राष्ट्रीय हित'' और व्यापारिक तर्क पर आधारित है। रूस केवल एक आपूर्तिकर्ता नहीं, बल्कि परमाणु ऊर्जा (कुडनकुलम प्लांट) और उर्वरक क्षेत्रों में एक रणनीतिक भागीदार है। भू-राजनीतिक दबाव और चुनौतियाँ (Geopolitical Pressure & Challenges) देखें तो भारत के इस रुख को अमेरिका और उसके सहयोगियों की ओर से गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। अमेरिकी दबाव और टैरिफ के मद्देनजर रूसी तेल न खरीदने के दबाव के लिए अमेरिका ने भारत पर 25% से 50% तक का टैरिफ लगा दिया है साथ में प्रतिबंधों का प्रभाव भी जाने तो अमेरिकी प्रतिबंधों (जैसे रोसनेफ्ट,ल्यूकोइल पर) के कारण भारत ने अपनी आपूर्ति में विविधता लाना शुरू कर दिया है। अक्टूबर 2025 तक भारत का रूसी तेल आयात 17.8% कम हुआ। जबकि उसी अवधि में अमेरिकी तेल आयात में 83.3% की भारी वृद्धि हुई।
भविष्य का परिदृश्य के मद्देनजर अनिश्चितता और संभावनाएँ (Future Outlook) देखें तो भारत-रूस संबंध के मद्देनजर रूस ने भारत को एलएनजी और उर्वरक की आपूर्ति बढ़ाने की पेशकश की है। भारत-अमेरिका व्यापार समझौता के तहत एक संभावित समझौते के तहत रूसी तेल आयात बंद करने पर भारत पर टैरिफ घटकर 18% किया जा सकता है। निजी क्षेत्र की भूमिका देखें तो नायरा और रिलायंस जैसी कंपनियां रूसी तेल खरीदना जारी रख सकती हैं। जो नीतियों में लचीलापन दिखाती हैं। भारत ने रूसी तेल आयात के ज़रिए ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक बचत के लिए एक कुशल कूटनीतिक दांव खेला है। अमेरिकी दबाव ने निश्चित रूप से भारत को आपूर्ति स्रोतों में विविधता लाने के लिए मजबूर किया है लेकिन भारत ने अपने ''राष्ट्र-प्रथम'' रुख से समझौता नहीं किया है। आने वाले समय में भारत एक संतुलित रणनीति अपनाता रहेगा। जिसमें सस्ता रूसी तेल उसके ऊर्जा मिश्रण का हिस्सा बना रहेगा लेकिन वैश्विक बदलावों के साथ वह अपनी आपूर्ति को लगातार अनुकूलित करता रहेगा। यह गतिशीलता भारत की विदेश और आर्थिक नीति की बढ़ती परिपक्वता को दर्शाती है।(Photos Courtesy Social media)
~ब्यूरो रिपोर्ट स्पर्श देसाई√•Metro City Post•Digital World•
#IndiaRussiaOilTrade#EnergySecurity
#NationFirstPolicy#RussianCrudeOil
#IndianEconomy#Geopolitics
#OilImportSavings#IndoUSRelations
#StrategicAutonomy#BusinessNews




Comments