*उत्तर भारत में 40 डिग्री पर 46 जैसी गर्मी क्यों? हीट इंडेक्स और उमस ने बढ़ाई मुसीबत*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
*उत्तर भारत में 40 डिग्री पर 46 जैसी गर्मी क्यों? हीट इंडेक्स और उमस ने बढ़ाई मुसीबत*/रिपोर्ट स्पर्श देसाई
(मुंबई/रिपोर्ट स्पर्श देसाई)अप्रैल 2026 में उत्तर भारत का औसत तापमान 40-42 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, लेकिन हीट इंडेक्स (तापमान+नमी) के कारण यह 45-46 डिग्री जैसा महसूस हो रहा है। हवा में नमी अधिक होने से पसीना नहीं सूखता,शरीर ठंडा नहीं हो पाता। अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट,कंक्रीट जंगल,वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन भी बड़े कारण। 40°C तापमान पर अहसास 46°C जैसा होता है।आखिर क्यों पसीने से तर-बतर हो रहा है शरीर? उत्तर भारत में अप्रैल के महीने में ही सूरज के तेवर तल्ख हो गए हैं। मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार तापमान 40-42°C के आसपास दर्ज किया जा रहा है लेकिन आम जनमानस को यह गर्मी 45-46°C जैसी महसूस हो रही है। लोग परेशान हैं कि अगर अप्रैल का यह हाल है तो मई-जून की तपिश क्या रंग दिखाएगी?विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल वहम नहीं बल्कि इसके पीछे ठोस वैज्ञानिक कारण और बिगड़ता पर्यावरण संतुलन है। क्यों ज्यादा लगती है गर्मी?जाने'हीट इंडेक्स' का गणित। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार गर्मी के अहसास का सबसे बड़ा कारण हीट इंडेक्स' (Heat Index) है। यह वास्तविक तापमान और हवा में मौजूद नमी (ह्यूमिडिटी) का मिला-जुला असर होता है। क्यों पसीने का न सूखना?जब हवा में नमी अधिक होती है तो शरीर से निकलने वाला पसीना जल्दी नहीं सूखता। वैज्ञानिक तौर पर पसीने का वाष्पीकरण ही शरीर को ठंडा रखता है। जब यह प्रक्रिया रुक जाती है तो शरीर का तापमान बढ़ने लगता है और हमें वास्तविक डिग्री से कहीं ज्यादा गर्मी महसूस होती है। वातावरण में हवा की कमी,शहरों में ऊंची इमारतें हवा के प्राकृतिक बहाव को रोक देती हैं। जिससे पसीना सूखने की प्रक्रिया और धीमी हो जाती है। कंक्रीट के जंगल और 'अर्बन हीट आइलैंड'बढ़ती गर्मी के लिए हमारा शहरी ढांचा भी जिम्मेदार है। इसे विज्ञान की भाषा में अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट कहा जाता है। सड़कों और इमारतों में इस्तेमाल होने वाला कंक्रीट दिनभर सूरज की गर्मी सोखता है और रात में उसे धीरे-धीरे छोड़ता है। यही कारण है कि शहरों में रातें भी अब ठंडी नहीं रहतीं। जिस तेजी से पेड़ काटे जा रहे हैं । उस अनुपात में नए पौधे नहीं लगाए जा रहे। छाया की कमी और कम होते वन क्षेत्र ने वातावरण को भट्टी बना दिया है। एसी, वाहनों के इंजन और फैक्ट्रियों से निकलने वाली गर्म हवा स्थानीय तापमान को कई गुना बढ़ा देती है हालांकि व्यक्तिगत कारण भी हैं जिम्मेदार हैं। गर्मी का अहसास केवल बाहरी वातावरण पर ही नहीं बल्कि हमारी जीवनशैली पर भी निर्भर करता है। शरीर में पानी की कमी होने पर तापमान नियंत्रण की प्रणाली बिगड़ जाती है। गहरे रंग के और टाइट कपड़े गर्मी को ज्यादा सोखते हैं। जिससे शरीर जल्दी गर्म होता है। हवा में मौजूद धूल के कण गर्मी को वातावरण में ही रोक (Trap) लेते हैं। बचाव के एक्सपर्ट टिप्स देखें तो पूर्व मौसम विज्ञानी डॉ. आनंद शर्मा के अनुसार "केवल तापमान ही गर्मी का सही पैमाना नहीं है। नमी और हवा की स्थिति इसमें बड़ी भूमिका निभाती है।" उन्होंने बचाव के लिए निम्नलिखित उपाय सुझाए हैं । दिनभर पर्याप्त पानी, छाछ या नींबू पानी का सेवन करें। सही कपड़े हल्के रंग के और ढीले सूती कपड़े पहनें। दोपहर 12 से 4 बजे के बीच सीधी धूप में निकलने से बचें। हल्का और सुपाच्य भोजन लें ताकि शरीर पर अतिरिक्त दबाव न पड़े। विकास की अंधी दौड़ में पेड़ों की कटाई और बढ़ता प्रदूषण हमें वह कीमत चुकाने पर मजबूर कर रहा है। जिसे हम 'हीटवेव' के रूप में देख रहे हैं। यदि हम अब भी सचेत नहीं हुए तो आने वाले साल और भी चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। (Photos Courtesy Social media)
~ब्यूरो रिपोर्ट स्पर्श देसाई √•Metro City Post•Digital World•#HeatIndex #FeelsLikeTemperature #गर्मीकागणित #UrbanHeatIsland #हीटवेव2026 #HumidityHeat #NorthIndiaHeatwave #जलवायुपरिवर्तन #HeatStressAwareness #SummerSafetyTips
Comments